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'सास-ससुर को पालने की जिम्मेदारी बहू पर नहीं', हाईकोर्ट ने साफ कर दिया

माता-पिता ने यह दलील दी कि वे बुजुर्ग, अनपढ़ और गरीब हैं. वो अपने दिवंगत बेटे के जीवित रहते हुए वे पूरी तरह से उसी पर निर्भर थे. उन्होंने यह तर्क दिया कि उनकी बहू उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है. उसकी अपनी पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे मृतक के सभी बेनिफिट्स मिल चुके हैं.

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29 मार्च 2026 (अपडेटेड: 29 मार्च 2026, 06:58 PM IST)
Dead policeman Parents Want Daughter In Law To Pay Maintenance allahabad high court
इलाहाबाद हाईकोर्ट (PHOTO-Wikipedia)
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‘नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी जिम्मेदारी के तौर पर लागू नहीं किया जा सकता.’ ये कहना है इलाहाबाद हाईकोर्ट का. हाईकोर्ट ने यह बात एक बुजुर्ग दंपती की उस याचिका को खारिज करते हुए कही, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की मृत्यु के बाद बहू से मेंटेनेंस की मांग की थी. इससे पहले फैमिली कोर्ट ने भी अगस्त 2025 में दंपती की याचिका खारिज की थी, जिसके बाद दोनों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. 

हाईकोर्ट के जज जस्टिस मदन पाल सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और बीएनएस की धारा 144 के तहत बुजुर्ग दंपती के बहू से मेंटेनेंस का दावा करने वाली याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है. लेकिन यह सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए है, जिनका जिक्र इस कानून में किया गया है. सास-ससुर का नाम इसके दावेदारों में नहीं है. यानी कानूनन सास-ससुर का भरण-पोषण करना बहू की जिम्मेदारी नहीं है.    

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिका दाखिल करने वाले दंपती के वकील ने दलील दी थी कि बुजुर्ग दंपती अनपढ़ और गरीब माता-पिता हैं, जो अपने इकलौते बेटे प्रवेश कुमार पर पूरी तरह निर्भर थे. प्रवेश यूपी पुलिस में कांस्टेबल थे. उनकी शादी 26 अप्रैल 2016 को हुई थी. 31 मार्च 2021 को उनकी मौत हो गई. प्रवेश कुमार की पत्नी यानी दंपती की बहू भी यूपी पुलिस में कांस्टेबल है. उनकी अपनी अच्छी कमाई है और बेटे की नौकरी से जुड़े सर्विस और रिटायरल बेनिफिट्स भी उसे मिले हैं. 

वकील ने जोर देकर कहा कि बहू का अपने सास-ससुर की देखभाल करना नैतिक जिम्मेदारी है. इसे कानूनी जिम्मेदारी भी माना जाना चाहिए. हाईकोर्ट से उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट का फैसला गलत है. मनमाना है और ठीक से सोच-विचार करके नहीं दिया गया है.

ये दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने ‘नैतिक’ और ‘कानूनी’ जिम्मेदारी में अंतर बताया. कोर्ट ने कहा, 

इस केस में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि बहू को नौकरी ‘सहानुभूति’ (compassionate) के आधार पर मिली थी. नैतिक जिम्मेदारी (moral obligation) भले ही सही लगे लेकिन जब तक कानून में साफतौर पर न लिखा हो, उसे कानूनी जिम्मेदारी नहीं बनाया जा सकता. मेंटेनेंस सिर्फ उन्हीं लोगों को मिलेगा, जिनका जिक्र कानून में है.

कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने वालों ने जानबूझकर इस दायरे में सास-ससुर को शामिल नहीं किया है. सीधे शब्दों में कहें तो इस कानून के तहत बहू पर अपने सास-ससुर का खर्च उठाने की कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं डाली गई है.

क्या है कानून में

दंपती ने कानून की धारा 144 के तहत गुजारा भत्ता की मांग की थी. ये कानून कहता है कि कोई भी साधन संपन्न व्यक्ति अगर अपना भरण-पोषण करने में असक्षम पत्नी, वैध-अवैध बच्चे या माता-पिता को गुजारा भत्ता नहीं देता है तो बीएनएस की धारा 144 के तहत मजिस्ट्रेट उसे ऐसा करने का आदेश दे सकते हैं.

कोर्ट का कहना है कि दंपती की मांग धारा 144 के तहत कानूनी तौर पर सही नहीं है, क्योंकि इस कानून में गुजारा भत्ता के लिए सास-ससुर का जिक्र नहीं है. इसलिए फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई गलती या कमी नहीं है. 

ये कहते हुए हाईकोर्ट ने दंपती की याचिका खारिज कर दी.

वीडियो: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, 'शादीशुदा शख्स का दूसरे वयस्क के साथ रहना जुर्म नहीं'

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