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गोबर से कैंसर का इलाज ढूंढने के नाम पर खर्च कर डाले 3.5 करोड़, अब पता किया जा रहा पैसा कहां गया?

MP में यह प्रोजेक्ट साल 2011 में शुरू किया गया था. इसका मकसद गाय के गोबर, मूत्र और दूध से बनने वाली पारंपरिक दवाओं के जरिए कैंसर का इलाज तलाशना था. लेकिन दस साल बाद प्रोजेक्ट पर पैसे के गलत इस्तेमाल और गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं. बताया जा रहा है कि 15 लाख रुपये की चीज को 2 करोड़ रुपये में खरीदा गया. जानिए पूरा मामला.

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research for Cow products to cure cancer
इस प्रोजक्ट का मकसद कैंसर का इलाज तलाशना था. (सांकेतिक फोटो: आजतक)
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अर्पित कटियार
10 जनवरी 2026 (Updated: 10 जनवरी 2026, 03:14 PM IST)
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मध्य प्रदेश सरकार की मदद से शुरू हुआ एक रिसर्च प्रोजेक्ट इन दिनों विवादों में है. इस प्रोजक्ट का मकसद कैंसर का इलाज तलाशना था. इसके लिए पंचगव्य पर रिसर्च की जानी थी. पंचगव्य यानी गाय के गोबर, गोमूत्र और दूध से बने पदार्थ. इसे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के रूप में देखा जा रहा था. लेकिन करीब दस साल बाद प्रोजेक्ट पर पैसे के गलत इस्तेमाल और गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं.

क्या है पूरा मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट साल 2011 में जबलपुर के नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में शुरू किया गया था. इसका मकसद गाय के गोबर, मूत्र और दूध से बनने वाली पारंपरिक दवाओं के जरिए कैंसर का इलाज तलाशना था. शुरुआत में यूनिवर्सिटी ने इस रिसर्च के लिए करीब 8 करोड़ रुपये मांगे थे, लेकिन राज्य सरकार ने इसके लिए 3.5 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी.

हाल ही में, जिला अधिकारी को एक औपचारिक शिकायत मिली, जिसके बाद डिविजनल कमीश्नर ने प्रोजेक्ट की जांच के आदेश दिए. अतिरिक्त कलेक्टर की अध्यक्षता में एक जांच दल का गठन किया गया. जो रिपोर्ट सामने आई, उसने प्रोजेक्ट के फाइनेंशियल मैनेजमेंट पर सवाल खड़े कर दिए. मामले से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, प्रोजेक्ट के लिए मार्केट रेट से कई गुना ज्यादा कीमत में प्रोजेक्ट के लिए सामान खरीदा गया.

गोबर-मूत्र और कच्चे माल की लागत 2 करोड़

जांच में सामने आया है कि गोबर, गोमूत्र और दूसरे कच्चे सामान पर करीब 2 करोड़ रुपये खर्च किए गए. जबकि जांच दल का कहना है कि बाजार भाव के हिसाब से इन चीजों की कीमत सिर्फ 15–20 लाख रुपये होनी चाहिए थी. यह खर्च साल 2011 से 2018 के बीच दिखाया गया है.

जांच में यह भी पता चला कि यूनिवर्सिटी की टीम ने रिसर्च के नाम पर 23–24 बार हवाई यात्राएं कीं. जांचकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि इन यात्राओं की आखिर जरूरत क्या थी.

इसके अलावा रिपोर्ट में कई और खर्च बताए गए हैं. इनमें करीब 7.5 लाख रुपये की एक गाड़ी की खरीद शामिल है, जो मंजूर बजट में थी ही नहीं. प्रोजेक्ट के तहत ईंधन और गाड़ी के रखरखाव पर 7.5 लाख रुपये से ज्यादा, मजदूरी पर करीब 3.5 लाख रुपये और फर्नीचर व इलेक्ट्रॉनिक सामान पर लगभग 15 लाख रुपये खर्च किए गए, जिन्हें जांच में गैर-जरूरी बताया गया है.

प्रोजेक्ट में कमियां

अतिरिक्त कलेक्टर रघुवर मरावी ने प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन (Implementation) में मौजूद कमियों के बारे में बताया. उन्होंने कहा, 

किसानों को ट्रेनिंग भी दी जानी थी, लेकिन यह जिक्र नहीं किया गया कि किस प्रकार की ट्रेनिंग दी जाएगी. पंचगव्य में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए रिसर्च की जानी थी. 

उन्होंने कहा कि जांच में पता चला कि जिन वाहनों को कथित तौर पर खरीदा गया था, वे गायब थे. 

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यूनिवर्सिटी ने क्या कहा?

यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट के हर पहलू में सरकारी खरीद प्रक्रियाओं और वित्तीय नियमों का पालन किया गया है. रजिस्ट्रार डॉ. एस.एस. तोमर ने कहा,

मशीनें हों या गाड़ियां, सभी खरीद खुले टेंडर्स के जरिए की गई थीं. सरकारी नियमों का पालन किया गया है, कोई घोटाला नहीं हुआ है. एक जांच कमेटी आई थी और हमने सभी डॉक्यूमेंट पेश किए, कोई फैक्ट छिपाया नहीं गया.

डॉ. तोमर ने कहा कि यह प्रोजेक्ट 3.5 करोड़ रुपये का था और वे अभी भी युवाओं और किसानों को ट्रेनिंग दे रहे हैं. फिलहाल, जांच दल की रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी गई है. अब यह रिपोर्ट डिविजनल कमीश्नर को भेजी जाएगी. वही, तय करेंगे कि आगे क्या कार्रवाई की जानी चाहिए.

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