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भारत अमेरिका के दबाव में चाबहार पोर्ट से पीछे हटा? विदेश मंत्रालय ने ये जवाब दिया

चाबहार बंदरगाह को लेकर मोदी सरकार कांग्रेस के निशाने पर है. कहा जा रहा है कि सरकार चाबहार बंदरगाह के विकास के काम से अपने हाथ खींच रही है. विदेश मंत्रालय ने इस पर जवाब दिया है.

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MEA on chabahar port
चाबहार बंदरगाह पर विदेश मंत्रालय का जवाब आया है (india today)
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राघवेंद्र शुक्ला
16 जनवरी 2026 (Published: 11:40 PM IST)
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क्या भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह से अपना कंट्रोल छोड़ दिया है? विपक्षी पार्टी कांग्रेस का तो ऐसा ही दावा है. उसका कहना है कि अमेरिका के दबाव में नरेंद्र मोदी सरकार ‘झुक’ गई है और राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर रही है. वहीं, विदेश मंत्रालय का कहना है कि अभी इस मामले पर अमेरिका से बातचीत चल रही है.

इसी बीच दावा किया गया है कि अमेरिका के प्रतिबंधों से दी गई छूट की डेडलाइन (अप्रैल 2026) खत्म होने से पहले भारत ने ईरान को वो सारे पैसे दे दिए हैं, जो चाबहार पोर्ट के विकास के लिए समझौते में तय हुए थे. इसके अलावा एक नई यूनिट भी बनाई जा रही है जो चाबहार बंदरगाह के विकास का आगे का काम देखेगी. इससे भारत सरकार अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने से बच जाएगी. हालांकि, सरकार की ओर से इसकी पुष्टि नहीं हुई है.

क्या है चाबहार पोर्ट?

ईरान के दक्षिणी तट पर सिस्तान-बलूचिस्तान राज्य में चाबहार नाम का बंदरगाह है. इस बंदरगाह को भारत और ईरान मिलकर विकसित कर रहे हैं. यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ये ऐसा रूट है, जिससे भारत की यूरोप तक पहुंच आसान हो जाती है. इसके अलावा ईरान और रूस को भी काफी फायदा होता है. पाकिस्तान को बायपास कर माल की आवाजाही के लिए भी ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए बहुत जरूरी है. खासतौर पर तब जब चीन पाकिस्तान के ग्वादर में एक बंदरगाह को डेवलप कर रहा है. चाबहार के विकास में भारत की भूमिका को इसी का जवाब माना गया था. 

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2003 में भारत और ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए सहमति बनी थी. इसके बाद साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान का दौरा किया. इसी साल इस समझौते को मंजूरी मिली. पोर्ट का सबसे पहला सफल इस्तेमाल 2019 में किया गया, जब अफगानिस्तान से भारत आने वाले मालवाहक जहाज ने पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अपना सफर पूरा किया.  

अब कहा जा रहा है कि भारत चाबहार बंदरगाह के काम से अपना हाथ खींचने वाला है. सोशल मीडिया पर पीएम नरेंद्र मोदी का एक पुराना वीडियो भी चल रहा है, जिसमें वो कहते हैं कि चाबहार एग्रीमेंट उनका किया हुआ एक बड़ा काम है. वे ये भी कहते हैं कि किसी तीसरे देश के प्रभाव में वह अपने फैसले नहीं लेंगे. कांग्रेस के लोग यही वीडियो शेयर कर कह रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के आगे पीएम मोदी ‘झुक’ गए हैं.

विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

ये सवाल जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के सामने आया तो उन्होंने कहा कि भारत इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है. आगे उन्होंने कहा, 

जैसा कि आप जानते हैं कि 28 अक्टूबर को अमेरिका के वित्त विभाग ने एक लेटर जारी किया था. इसमें बिना शर्त प्रतिबंधों में छूट की जानकारी दी गई थी, जो 26 अप्रैल 2026 तक वैध है. 

दरअसल, अमेरिका ने ईरान पर 29 सितंबर 2025 को अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए थे. इस दौरान उसने कहा था कि ईरान के चाबहार बंदरगाह का संचालन करने वाले लोगों पर सितंबर महीने के अंत से प्रतिबंध लागू होंगे. लेकिन भारत के लिए अमेरिका ने प्रतिबंधों में ढील भी दी थी. चाबहार पोर्ट से अपनी सारी गतिविधियों को समेटने के लिए अमेरिका के ऑफिस ऑफ फॉरेन असेट्स कंट्रोल (ओएफएसी) ने भारत को प्रतिबंधों से 26 अप्रैल 2026 तक छूट दी थी.

हालांकि, द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले की जानकारी रखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें ये पता चला है कि भारत चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए अपना सीधा निवेश समाप्त करने की कोशिश में है. इसके लिए प्रोजेक्ट में भारत की प्रतिबद्धता वाला सारा बजट एक साल पहले ही एकमुश्त ईरान को सौंप दिया गया है. अब इस पोर्ट के विकास में भारत के लिए कोई जिम्मेदारी नहीं बचती. 

ये बात इसलिए भी अहम है, क्योंकि डॉनल्ड ट्रंप ने 12 जनवरी को ऐलान किया था कि जो भी देश ईरान के साथ कारोबार करेगा, उस पर अमेरिका के साथ किए जाने वाले कारोबार पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा.

इकनॉमिक टाइम्स से बातचीत करते हुए एक सरकारी सूत्र ने बताया कि भारत को पहले ही पता था कि अमेरिका ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लगाएगा और ऐसे में चाबहार प्रोजेक्ट के लिए पैसा भेजना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए पहले ही तकरीबन 1090 करोड़ रुपये (120 मिलियन USD) का बजट ईरान को ट्रांसफर कर दिया गया. 

उन्होंने आगे कहा कि अब चाबहार के लिए ईरान को दी गई अपनी प्रतिबद्धता के प्रति भारत की कोई जिम्मेदारी नहीं बचती. भारत ने ईरान को जो पैसे दिए हैं, उसे वो अपनी इच्छा के अनुसार इस्तेमाल करने के लिए आजाद है. ये भी कहा जा रहा है कि चाबहार बंदरगाह के विकास का काम आगे बढ़ाने के लिए भारत एक नई इकाई बनाने की संभावना पर भी विचार कर रहा है.

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