सांसदों से हिसाब मांगने वाले #YeTheekKarKeDikhao कैंपेन की कहानी क्या है?
ये सब शुरू हुआ जब बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने राजस्थान के तीन कांग्रेस सांसदों पर MPLADS का पैसा हरियाणा में लगाने का आरोप लगाया था.

कुछ दिन पहले शायर मंजर भोपाली की नज्म सोशल मीडिया पर जमकर वायरल थी. बोल थे, 'मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए/देश की तबाही का हिसाब दीजिए.' नेता लोगों को टारगेट करके लिखी नज्म थी, जिसमें उनसे इस बात का हिसाब मांगा गया था कि चुने जाने के बाद उन्होंने अपने-अपने क्षेत्र के लिए क्या किया? नज्म में छिपा हुआ तंज था कि जो किया वो दिखा नहीं तो पैसे कहां गए? सवालों का ऐसा ही एक तूफान इन दिनों सोशल मीडिया पर भी छाया है. एक अभियान के तहत लोग अपने सांसदों से विकास निधि के खर्चे का हिसाब मांग रहे हैं. सरकारी वेबसाइट से आंकड़े निकालकर सवाल पूछ रहे हैं कि उन्होंने अपनी सांसद निधि से कितना खर्च किया, कहां खर्च किया?
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, ये सब शुरू हुआ जब बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने राजस्थान के तीन कांग्रेस सांसदों पर MPLADS का पैसा हरियाणा में लगाने का आरोप लगाया था. ठीक इसी समय सोशल मीडिया पर समाजवादी पार्टी की पहली बार सांसद बनी इकरा चौधरी की जमकर तारीफ हो रही थी. इसकी वजह थी कि इकरा उन गिने-चुने सांसदों में थीं, जिनका MPLADS डैशबोर्ड एकदम अपडेट है. उसमें जरूरी दस्तावेज और जियोटैग की गई तस्वीरें भी मौजूद हैं.
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक अभियान ही चल पड़ा, जिसे नाम दिया गया- ‘ये ठीक करके दिखाओ’. कहा जा रहा है कि 'खुरपेंच' नाम के चर्चित एक्स यूजर ने ये ‘आंदोलन’ शुरू किया है. इसके तहत X हैंडल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी सहित कई सांसदों के क्षेत्रों में हुए विकास कामों, उन पर खर्च पैसे और ‘सही में काम हुआ है या नहीं’ इसकी खोज-पड़ताल की गई है.
पड़ताल में क्या निकला?पूरी तरह से सोशल मीडिया के लोगों ने इस अभियान को खाद-पानी दिया है. दावा किया जा रहा है कि किसी भी राजनीतिक दल से इस कैंपेन का कोई लेना-देना नहीं है. ये शुरुआत हुई थी, नए साल की पूर्व संध्या से जब बिहार के सारण से भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी का 'हिसाब-किताब' एक्स पर वायरल होना शुरू हुआ.
#YeTheekKarkeDikhao के तहत लोगों ने MoSPI के आधिकारिक पोर्टल पर मौजूद MPLADS डेटा से जानकारी निकाली. इस सरकारी पोर्टल पर MPLADS के तहत मिले पैसे, खर्च, कितने काम सुझाए गए, कितने पूरे हुए और उनकी तस्वीरें दी होती हैं. ‘एक्स’ पर पोस्ट किया गया कि सारण जिले में MPLADS के कामों के तहत कंप्यूटर, UPS, वेबकैम और प्रिंटर की सप्लाई से जुड़े 28 लाख, 20 लाख और 28.41 लाख रुपये के कामों में कोई तस्वीर अपलोड नहीं थी. कहीं सिर्फ कैंसिल चेक दिख रहा था तो कहीं एक ही फोटो कई बार डाली गई थी. लोगों ने सवाल उठाए कि 20 कंप्यूटर और 20 UPS पर 28 लाख रुपये कैसे खर्च हो गए? जबकि पहले बड़े ऑर्डर कम कीमत में दिख रहे थे.
इस कैंपेन में लोगों ने वाराणसी के सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बही भी खंगाली. हालांकि, पीएम की लोगों ने तारीफ की क्योंकि उनके डैशबोर्ड पर डेटा में काफी पारदर्शिता दिखी, जहां हर काम की जियोटैग फोटो मौजूद थी. पीएम मोदी की प्रोफाइल के अनुसार, 18वीं लोकसभा में 11.31 करोड़ में से 2.88 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे और 43 काम पूरे किए गए. अच्छी बात ये थी कि हर काम की जियोटैग तस्वीरें अपलोड थीं. अभियान चलाने वाले लोगों ने कहा कि दूसरे सांसदों को पीएम मोदी से सीखना चाहिए.

हालांकि, पीएम मोदी से भी ज्यादा जिस सांसद की तारीफ की गई, वो पहली बार सांसद बनीं सपा की इकरा हसन थीं. 1994 में जन्मीं इकरा हसन लंदन में पढ़ी हैं. कैराना से पहली बार सांसदी जीतने वाली इकरा का MPLADS प्रोफाइल पूरी तरह अपडेट है. इसमें काम के पहले और बाद की जियोटैग तस्वीरें दर्ज हैं. उनके रिकॉर्ड में 9.80 करोड़ में से 1.88 करोड़ रुपये खर्च दिखाए गए हैं. 49 कार्यों के सुझाव के मुकाबले 12 काम पूरे भी किए गए दिखते हैं.
बिहार के बहुचर्चित सांसद पप्पू यादव अक्सर नोटों की गड्डियां बांटते दिखते हैं, लेकिन अपने MPLADS रिकॉर्ड की बदतरी पर वो बुरा फंस गए. 18वीं लोकसभा में उनके क्षेत्र में 4.78 करोड़ रुपये खर्च दिखने के बावजूद पोर्टल पर सिर्फ एक काम पूरा दिखाया गया है. इनमें भी ज्यादातर काम स्ट्रीट लाइट से जुड़े हैं. उनसे एक तीखा सवाल ये भी पूछा गया कि ज्यादातर काम एक ही वेंडर को क्यों दिए गए?
वेंडर के मामले में राहुल गांधी का रिकॉर्ड ठीक था. वे रायबरेली से कांग्रेस सांसद हैं. 6 जनवरी को राहुल गांधी का MPLADS रिकॉर्ड एक्स पर वायरल था. इसके मुताबिक, 18वीं लोकसभा में उनके सुझाए 148 कामों में से सिर्फ 3 पूरे दिखाए गए. 9.80 करोड़ रुपये में से सिर्फ 47.97 लाख रुपये खर्च दिखे. लेकिन जियोटैग तस्वीर एक भी नहीं थी. 17वीं लोकसभा में उन्होंने अपने क्षेत्र में 8.21 करोड़ रुपये खर्च किए और 30 काम पूरे कराए. हालांकि, सिर्फ 21 कामों की तस्वीरें पोर्टल पर थीं.
अभियान के झंडाबरदारों ने एक बात मानी. राहुल गांधी के क्षेत्र में अलग-अलग वेंडरों को काम दिया गया था. यानी किसी एक को फायदा पहुंचाने की संभावना यहां नहीं दिखी, जैसा पप्पू यादव के यहां थी.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी का रिकॉर्ड सबसे ज्यादा अजीब था. उनके खाते में 89 काम पूरे दिखाए गए थे, लेकिन जो तस्वीरें अपलोड थीं, वो सब संदिग्ध थीं. एक ही फोटो 5 अलग-अलग कामों के लिए इस्तेमाल की गई थी. हैरानी की बात ये कि गूगल रिवर्स इमेज सर्च से पता चला कि वो फोटो भी कोलकाता के मार्बेला कैफे की थी. ये फोटो मार्च 2021 से इंटरनेट पर मौजूद है.
डीएमके के सांसद दयानिधि मारन के खाते में 17वीं लोकसभा के दौरान एक भी सुझाया गया काम पूरा नहीं हुआ. लेकिन खर्च करोड़ों में दिखाया गया. 18वीं लोकसभा में भी फंड का इस्तेमाल बहुत कम बताया गया. लेकिन सवाल ये था कि बिना तस्वीरों और जमीनी सबूत के पोर्टल पर काम के लिए पेमेंट ‘सक्सेसफुल’ कैसे दिखाया गया था.
उत्तर प्रदेश में भाजपा के अध्यक्ष बनाए गए पंकज चौधरी भी इस अभियान में जवाब-तलब किए गए. उनके रिपोर्ट कार्ड में 18वीं लोकसभा की डिटेल ऐसी थी कि जारी किए गए 9.80 करोड़ में से 5.33 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. काम सुझाए गए थे 49 लेकिन पूरा एक भी नहीं दिखा. न किसी काम की फोटो दिखी. न कोई सबूत और न कोई अपडेट, लेकिन भुगतान एकदम 'सफल' दिखा रहा था.

अब आप ये जानना चाह रहे होंगे कि ये MPLADS क्या है. चलिए आपको आसान भाषा में समझाते हैं. भारत में कुल 790 सांसद होते हैं. 545 लोकसभा में और 245 राज्यसभा में. हर सांसद को अपने क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए सालाना 5 करोड़ रुपये खर्च करने का अधिकार होता है. यह पैसा ‘सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि योजना’ यानी MPLADS के तहत मिलता है. हर लोकसभा सांसद अपने क्षेत्र में 5 करोड़ रुपये तक के कामों की सिफारिश जिला कलेक्टर से कर सकता है. राज्यसभा सांसद उस राज्य के एक या एक से ज्यादा जिलों में काम सुझा सकते हैं, जहां से वे चुने गए हैं या नामित हैं.
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) इस योजना को चलाता है, जबकि जमीनी स्तर पर काम जिला प्रशासन करता है. सांसदों की भूमिका सिर्फ काम सुझाने और उस पर नजर रखने की होती है. वे न तो काम लागू करते हैं और न ही उसका पेमेंट करते हैं. नियमों के मुताबिक, हर काम की जानकारी आधिकारिक पोर्टल पर डालना जरूरी है. इसमें जियोटैग की गई तस्वीरें और काम की प्रगति की जानकारी बहुत जरूरी होती है. जिला प्रशासन को हर साल कम से कम 10% कामों की जांच भी करनी होती है और संभव हो तो सांसदों को इसमें शामिल किया जाता है.
आप भी देख सकते हैं डिटेल
हम अक्सर ये सवाल उठाते हैं कि सांसद या विधायक अपना काम ठीक से नहीं करते और जनता के पैसे की लूट-खसोट मचती है. लेकिन सोशल मीडिया के इस अभियान ने बताया है कि हम भी उनसे सवाल पूछने में अक्सर चूक जाते हैं. सांसदों और विधायकों के काम का ब्योरा अब ऑनलाइन मौजूद होता है. जरूरत होती है कि हम उस पर नजर रखें और उसके हिसाब से अपने जन प्रतिनिधियों से सवाल करें.
MPLADS के आधिकारिक डैशबोर्ड पर जाकर कोई भी व्यक्ति अपने सांसद के कामकाज को देख सकता है. इसके लिए आप सांसद के नाम या अपने संसदीय क्षेत्र के नाम से खोज कर सकते हैं. यहां आपको सांसद निधि के बारे में पूरी जानकारी मिलती है. कितना पैसा जारी हुआ, कितना पैसा खर्च हुआ, कितने काम सुझाए गए और कितने पूरे दिखाए गए? सबका डेटा सरकारी वेबसाइट www.mplads.gov.in पर मौजूद है.
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