छत्तीसगढ़ के इस गांव में पहली बार पहुंची बिजली, लोग बोले- 'खुशी के मारे नींद नहीं आई'
इस इलाके में ये सामान पहुंचाना मशीन के बस का नहीं है. क्योंकि कई जगहें हैं जहां मशीनें पहुंच नहीं सकती. लिहाजा यहां अधिकतर सामान लोग अपने कंधों पर ढो कर लाए.

भारत की आजादी के 78 साल बाद भी देश में ऐसे गांव हैं, जहां बिजली के तार नहीं बिछे. जहां के घर बल्ब की पीली या सफेद रोशनी से सराबोर नहीं हुए. छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ का ईरपानार ऐसा ही एक गांव है. ये गांव नारायण डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर्स से करीब 30 किलोमीटर दूर है. बीते दिनों यहां पहली बार बिजली पहुंची है.
अबूझमाड़ की पहाड़ियों और घने जंगल के बीच ईरपानार नाम का गांव पड़ता है. यहां पहुंचने के लिए खड़ी चढ़ाई, टूटे-फूटे रास्ते और काफी चलना पड़ता है. मानसून के समय तो ये इलाका पूरी तरह से बाकी दुनिया से कट जाता है. नक्सल प्रभावित इस दुर्गम इलाके में बिजली पहुंचाना ‘अंसभव के करीब’ का काम था लेकिन 'छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड' ने ये काम कर दिखाया. बिजली के पोल और तारों को उस इलाके में पहुंचाया गया.
इस इलाके में सामान पहुंचाना मशीन के बस का नहीं है क्योंकि कई जगहें हैं जहां मशीनें पहुंच नहीं सकती. लिहाजा यहां अधिकतर सामान लोग अपने कंधों पर ढो कर लाए. इस उपलब्धि पर जानकारी देते हुए नारायणपुर की डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर नम्रता जैन ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि इस इलाके में बिजली का कनेक्शन ले जाना बहुत मुश्किल था. उन्होंने कहा,
बिजली का मतलब सिर्फ रोशनी नहींइस काम में हर कदम पर शारीरिक ताकत की जरूरत पड़ती थी. इक्विपमेंट्स से लेकर पोल गाड़ने तक. हर चीज में बहुत मेहनत लगी. लेकिन हम सबका टारगेट एक था कि आखिरी गांव तक न छूटे और हम उसमें सफल रहे.
ईरपानार गांव में बिजली न होने के कई नुकसान थे. बात सिर्फ रोशनी की नहीं थी. बिजली आई तो अब यहां के लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर सकेंगे, जो पहले उनके लिए बस एक खिलौना जैसा था. पंखे, लाइटों आदि से लोगों का जीवन आरामदायक बनेगा. ईरपानार के लोगों का मानना है कि इससे पढ़ाई के नए रास्ते खुलेंगे. रिपोर्ट के मुताबिक जब पहली बार लाइट जली तो लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था. उन्हें लगा जैसे उनकी एक नई जिंदगी शुरू हो गई है. कई लोगों ने तो ये भी कहा कि वो आज खुशी के मारे सो ही नहीं पाएंगे.
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