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पति तलाक के लिए पत्नी की वॉट्सऐप चैट को सबूत बनाना चाहता था, HC के फैसले पर बहस छिड़ने वाली है

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है. फेयर ट्रायल यानी निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार सार्वजनिक न्याय से जुड़ा है. यह निजता के व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर है.

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13 फ़रवरी 2026 (पब्लिश्ड: 06:15 PM IST)
whatsapp chat call recording evidence  family dispute
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद में डिजिटल सबूतों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला किया है. (इंडिया टुडे)
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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के आपसी झगड़ों और वैवाहिक विवाद के मामलों में डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक सबूत को लेकर महत्वपूर्ण फैसला किया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब वैवाहिक विवादों में वॉटसऐप चैट (WhatsApp Chat) और फोन कॉल की रिकॉर्डिंग को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की बेंच ने फैमिली कोर्ट में चल रहे तलाक के एक मामले पर लगाई गई अपील की सुनवाई के दौरान कहा कि मोबाइल का डेटा सच्चाई सामने लाने में मददगार हो सकता है. उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट के पास यह विशेष शक्ति है कि वह प्रभावी ढंग से मामले के निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या जानकारी को सबूत के तौर पर स्वीकार सकता है.

रायपुर के रहने वाले एक युवक ने पत्नी से तलाक लेने के लिए फैमिली कोर्ट में अर्जी लगाई थी. अर्जी में उसने पत्नी की दूसरे लोगों के साथ हुए वॉटसऐप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड पर लाने के लिए आवेदन दिया. पत्नी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पति ने उसका मोबाइल हैक करके अवैध तरीके से ये सबूत जुटाए हैं, जोकि उसकी निजता के अधिकार का उल्लंघन है. हालांकि फैमिली कोर्ट ने पति की अर्जी स्वीकार कर ली थी. इस फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट में अपील की.

निजता के अधिकार से ऊपर फेयर ट्रायल

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है. फेयर ट्रायल यानी निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार सार्वजनिक न्याय से जुड़ा है. यह निजता के व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर है. अगर निजता के नाम पर सबूतों को रोका गया तो फैमिली कोर्ट का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा.

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 यह शक्ति देती है कि वह किसी भी ऐसे सामग्री को सबूत मान सकती है जो विवाद सुलझाने में मददगार हो. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यदि सबूत प्रासंगिक है तो इससे फर्क नहीं पड़ता कि उसे किस तरह हासिल किया गया है. जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की बेंच ने कहा कि कोर्ट को दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना होता है. पति को अपनी बात साबित करने के लिए प्रासंगिक सबूत पेश करने का मौका मिलना चाहिए. 

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