भारतीयों ने दवाओं पर एक साल में 1.6 लाख करोड़ खर्च किए, सरकारी रिपोर्ट में खुलासा
भारत सरकार के Health Ministry ने साल 2022-23 में Healthcare और दवाओं पर होने वाले खर्च का रिपोर्ट जारी किया है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार की ओर से दी जाने वाली मदद से आम जनता की जेब पर कम भार पड़ रहा है.

भारत के लोग दवाओं पर कितना खर्च करते हैं? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसे लेकर एक डेटा जारी किया है. नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (NHA) 2022-23 की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि एक साल के अंदर भारतीयों ने दवाओं पर 1.6 लाख करोड़ से ज्यादा खर्च किया है. दवाएं हेल्थकेयर में लोगों के सबसे बड़े खर्चों में एक बन गई हैं. टीओआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि डॉक्टर की पर्ची दिखाकर जो दवाएं खरीदी गईं, उन पर 1.3 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. हालांकि, कई दवाएं बिना डॉक्टर की पर्ची के भी खरीदी गई हैं. ऐसी दवाओं पर 26 हजार 670 करोड़ रुपये खर्च किए गए. ये सारे खर्च मिलाकर 1.6 लाख करोड़ से ज्यादा होते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यह देश में हेल्थकेयर पर खर्च का पांचवा हिस्सा है.
दवाओं के अलावा इलाज के खर्चे के बारे में भी रिपोर्ट में जानकारी दी गई है. बताया गया कि अस्पताल में भर्ती होने और इलाज पर 2,9 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए. ये कुल स्वास्थ्य खर्चे का 37.6 फीसदी है. इसके अलावा, बिना भर्ती हुए ओपीडी इलाज में 1.4 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारतीय परिवारों के स्वास्थ्य बजट में दवाओं का खर्च एक बड़ा बोझ बनकर सामने आया है. इससे डायबिटीज, बीपी और दिल की बीमारी के वो मरीज खासतौर पर प्रभावित हैं, जिन्हें रेगुलर ये दवाएं खरीदनी पड़ती हैं.
सरकार का खर्चस्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी की गई रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि साल 2012-14 में सरकार हेल्थ पर करीब 1.30 लाख करोड़ रुपये खर्च करती थी, जो अब करीब तीन गुना बढ़ गई है. रिपोर्ट में दावा किया गया कि साल 2022-23 में ये रकम बढ़कर करीब 3.85 लाख करोड़ रुपये हो गई है. प्रति नागरिक होने वाले खर्च के तौर पर देखा जाए तो साल 2013-14 में सरकार प्रति नागरिक 1042 रुपये का खर्च करती थी. लेकिन अब साल 2022-23 में यह बढ़कर 2786 रुपये हो गई है. हेल्थकेयर पर होने वाला खर्च देश की Gross Domestic Product (GDP) में 1.15 % से बढ़कर 1.43% हो गई है. नई सीरीज में ये हिसाब करीब 1.48% तक पहुंच गया है.

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च का असर आम जनता की जेब पर कम हो गया है. साल 2013-14 में कुल खर्च का 64.2% भाग आम जनता को देना पड़ता था, लेकिन अब सरकार के प्रयासों और योजनाओं की वजह से यह घटकर 43.4% हो गया है. यानी आपकी-हमारी जेब पर इलाज के खर्च का बोझ कम हो गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं में होने वाले खर्च को दोगुना से भी ज्यादा कर दिया है. यानी गांवों, कस्बों और सरकारी अस्पतालों और हेल्थ सेंटर्स पर सरकारी खर्चा बढ़ गया है. इन स्थानों पर होने वाला खर्च 0.5 लाख करोड़ से बढ़कर 1.4 लाख करोड़ हो गया है.
सरकार का आम जनता के लिए आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं और कर्मचारियों को मिलने वाले हेल्थ केयर पर भी खर्च 6% से बढ़कर 9.9% हो गया है. इसके अलावा प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंस कराने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 3.4% से 9.2% हो गई है.
कोरोना काल के समय कितना खर्च हुआ?रिपोर्ट में स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना महामारी के दौरान होने वाले खर्च का भी हिसाब दिया है. इसमें विशेष तौर पर साल 2021-22 में हुए खर्च के बारे में जानकारी दी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, वैक्सीनेशन और इमरजेंसी स्वास्थ्य सेवाओं में काफी खर्च हुआ, जो उस समय GDP का करीब 1.84% हो गया था.
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