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बंद कमरे में जातिसूचक गाली पर नहीं लगेगा SC-ST एक्ट, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए फैसला दिया कि निजी घर की चारदीवारी में जातिसूचक शब्द कहे जाते हैं और वहां कोई बाहरी आदमी मौजूद नहीं हो तो इसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा.

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12 मई 2026 (पब्लिश्ड: 09:07 PM IST)
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सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट को लेकर बड़ा फैसला दिया है. (इंडिया टुडे)
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सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को लेकर को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट के मुताबिक, किसी निजी घर की चारदीवारी और बाहरी लोगों की गैरमौजूदगी में जातिसूचक शब्द कहे जाते हैं तो यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एनवी अंजारिया और जस्टिस पीके मिश्रा की बेंच ने साफ किया कि एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत मामला दर्ज होने के लिए यह बेहद जरूरी शर्त है कि कथित अपमान या गाली-गलौज सार्वजनिक रूप से यानी ‘पब्लिक व्यू’ में हुई हो.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ‘पब्लिक व्यू’ को परिभाषित किया है. कोर्ट ने कहा कि ‘पब्लिक व्यू’ का मतलब ऐसी जगह जहां आम लोग मौजूद हों. जहां से वे आरोपी की बातों को सुन सकें और उसे देख सकें. शीर्ष अदालत ने कहा, 

अगर कथित अपराध चारदीवारी के भीतर हुआ है और वहां बाहरी लोग मौजूद नहीं हैं तो यह नहीं कहा जा सकता कि घटना सार्वजनिक तौर पर हुई है. 

हालांकि कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि कोई निजी जगह भी ‘पब्लिक व्यू’ के दायरे में आ सकती है. बशर्ते वहां आम लोग इस घटना के गवाह हों. यह मामला दिल्ली के एक परिवार के बीच के संपत्ति विवाद से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट मामले में परिवार के चार सदस्यों के खिलाफ दर्ज FIR और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था. शिकायतकर्ता और दो आरोपी सगे भाई हैं, जो अनुसूचित जाति से आते हैं. मामले में बाकी आरोपी उनकी पत्नियां हैं.

जनवरी 2021 में कीर्ति नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी महिला आदतन उसे और उसके परिवार के खिलाफ ‘चूड़ा, चमार, हरिजन और गंदी नाली’ जैसे जातिसूचक अपशब्दों का इस्तेमाल करती थी. आरोपी महिला शादी से पहले सामान्य जाति की थी. शिकायत के मुताबिक, 28 जनवरी को हरिनगर और रमेश नगर में प्रॉपर्टी के विवाद के दौरान आरोपियों ने शिकायतकर्ता के घर का ताला तोड़ने की कोशिश की. आरोप है कि इस दौरान हुई कहासुनी के दौरान शिकायतकर्ता और उनकी पत्नी को जातिसूचक गालियां दी गईं और शिकायतकर्ता को उत्पीड़न के झूठे केस में फंसाने की धमकी दी गई.

हाईकोर्ट का दखल देने से इनकार

जांच के बाद निचली अदालत ने एक आरोपी पर एससी-एसटी एक्ट और बाकी आरोपियों पर IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत आरोप तय किए. इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में आरोप तय करने से इनकार कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर कोर्ट से 'मिनी ट्रायल' चलाने की उम्मीद नहीं की जा सकती.

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की FIR

सुप्रीम कोर्ट पूरे मामले की जांच के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि FIR में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध तय करने के लिए जरूरी मूल आधार ही मौजूद नहीं थे. कोर्ट के मुताबिक, शिकायत में कहीं भी इसका जिक्र नहीं था कि घटना 'पब्लिक व्यू' में हुई या उस समय कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद था. FIR में जिन दो गवाहों के नाम थे, वे शिकायतकर्ता के ही दोस्त थे और उनके बयानों से भी यह साबित नहीं हुआ कि घटना के समय वे मौजूद थे.

सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 506 के तहत दर्ज आपराधिक धमकी के आरोप को भी रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि FIR में दर्ज बातों से ऐसा नहीं लगता कि आरोपियों का इरादा शिकायकर्ता के मन में खौफ पैदा करना था, जो इस धारा के तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए जरूरी शर्त है. इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट और निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए FIR और चार्जशीट रद्द कर दिया है.

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