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IPS अधिकारियों को लेकर CAPF और सरकार के बीच क्या खींचतान चल रही?

देश की तमाम सेन्ट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPFs) के लोग एक कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. उनका मुद्दा CAPFs में लाई जा रही एक पॉलिसी है. उनका कहना है कि सरकार एक ऐसा बिल लाने जा रही है जिससे CAPFs के कैडर अफसरों पर बुरा असर पड़ सकता है.

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CAPF officers demoralised that Centre is not giving them their due
CAPF की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना था. (PHOTO- X)
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मानस राज
13 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 04:38 PM IST)
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जम्मू-कश्मीर की गलियों से लेकर छत्तीसगढ़ के जंगलों तक, आतंकवादियों और नक्सलियों से लोहा लेने में CRPF ने अहम भूमिका निभाई. सीमा पर BSF खड़ी है तो चीन के सामने ITBP डटी है. वहीं देश के हवाई अड्डों और राष्ट्रीय प्रतिष्ठानों की सुरक्षा का जिम्मा CISF ने उठाया हुआ है. देश की ये तमाम सेन्ट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPFs) के लोग आज एक कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. उनका मुद्दा CAPFs में लाई जा रही एक पॉलिसी है. उनका कहना है कि सरकार एक ऐसा बिल लाने जा रही है जिससे CAPFs के कैडर अफसरों पर बुरा असर पड़ सकता है.

क्या है CAPF?

CAPF में देश की कुल 7 फोर्सेज आती हैं-

  • सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF)
  • सीमा सुरक्षा बल (SSB)
  • सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (CISF)
  • बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF)
  • इंडो-तिबेतियन बॉर्डर पुलिस (ITBP)
  • असम राइफल्स
  • नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG)

CAPF में दो तरह के अधिकारी होते हैं. एक वो जो आईपीएस होते हैं. जिन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति यानी डेपुटेशन पर CAPF में भेजा जाता है. दूसरे वो जिन्हें कैडर अधिकारी कहा जाता है. ये वो अधिकारी होते हैं जो डायरेक्ट इन बलों में भर्ती होते हैं. केंद्रीय बलों में IPS अफसरों के लिए एक कोटा निर्धारित है. यानी वो एक तय संख्या में CAPFs में सेवाएं देते हैं

सरकार कौन सा बिल लाने जा रही है?

सरकार के बिल को समझने से पहले थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं. साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया. इसमें कहा गया था कि सरकार CAPF में Senior Administrative Grade (SAG) स्तर के पदों पर आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को दो सालों में धीरे-धीरे घटाए. मकसद ये बताया गया कि इससे CAPFs में कैडर अफसर की संख्या बढ़ेगी. इन बलों में NFFU (नॉन फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन) के लिए ही नहीं, बल्कि सभी कार्यों के लिए 'संगठित समूह ए सेवा' (OGAS) पैटर्न' लागू किया जाए. सीएपीएफ में छह माह के भीतर 'कैडर रिव्यू' हो.

केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 'पुनर्विचार याचिका' दायर की. कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया गया. बाद में अवमानना केस में सरकार को नोटिस भी जारी हुआ. अब जब सरकार के पास कोई रास्ता नहीं बचा, तो वो एक विधेयक ले आई है. जाहिर है सरकार की मंशा सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने की है. संसद के मौजूदा बजट सत्र में ही एक बिल लाया जा सकता है. इस बिल को केंद्रीय सशस्त्र बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक नाम दिया गया है.

दशकों तक प्रमोशन नहीं मिलता

BSF और CRPF, दोनों में ही, डिप्टी कमांडेंट के पद पर पहला प्रमोशन पाने में 11 से 13 साल लग जाते हैं. उदाहरण के लिए, 1997 बैच के अधिकारी 29 साल की सेवा के बाद भी 'सेकंड-इन-कमांड' के तौर पर ही काम कर रहे हैं. 1990 बैच के अधिकारी 35 साल बाद भी डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ही हैं. 

वहीं इंडियन पुलिस सर्विस (IPS) में उनके समकक्ष अधिकारी, सेवा के 13 साल के अंदर ही 'सिलेक्शन-ग्रेड' रैंक हासिल कर लेते हैं. इससे होता ये है कि सीनियर पदों पर वो IPS अधिकारी बैठते हैं, जो कैडर अधिकारियों से कम सर्विस करने के बावजूद, उनके कमांडर बन जाते हैं. 

हालांकि ITBP और SSB में अधिकारियों के प्रमोशन के मामले में स्थिति थोड़ी बेहतर है. लेकिन सभी CAPF में अगर पूरी तस्वीर देखें, तो पता चलता है कि यहां सिस्टम की तरफ से लगातार अनदेखी की जा रही है. ज्यादातर अधिकारी अब प्रमोशन के लिए अनिश्चित काल तक इंतजार करने के बजाय, समय से पहले ही रिटायरमेंट ले लेते हैं. इस तरह, इन सुरक्षा बलों को उन काबिल अधिकारियों को खोना पड़ रहा है, जिनके जाने से न फोर्स पर बुरा असर पड़ सकता है. और इससे जुड़ी चिंता के दायरे में राष्ट्रीय सुरक्षा भी आती है.

लल्लनटॉप से बात करते हुए CRPF के पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट सर्वेश त्रिपाठी कहते हैं,

"जो CAPF के अधिकारी हैं उन्हें यूपीएससी चुनती है. उसके बाद वो असिस्टेंट कमांडेंट (AC) बनते हैं. अब AC से डिप्टी कमांडेंट तो उन्हें 4 साल में बन जाना चाहिए. पहले मिलता भी था. लेकिन अब वो इसके लिए 15-15 साल से इंतजार कर रहे हैं.

दिल्ली हाई कोर्ट ने CAPF केे हक में फैसला दिया. लेकिन केंद्र सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई. सरकार जब सुप्रीम कोर्ट से भी हार गई. तो रिव्यू पिटीशन डाली. वह भी खारिज होने के बाद सरकार कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक बिल लाई है. यानी ये बिल पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ है. अगर ग्राउंड पर काम करने वाला कमांडर समय से प्रमोशन नहीं पाएगा, तो उसका मनोबल गिरेगा. और इससे जवानों का मनोबल गिरेगा. और इस कारण राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी खतरा हो सकता है."

इस मुद्दे को लेकर न सिर्फ CAPF, बल्कि कई विपक्षी सांसदों ने भी आवाज उठाई है. समाजवादी पार्टी के सांसद प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने संसद में कहा,

“CAPF अधिकारी संसद, सीमाओं, औद्योगिक इकाइयों, हवाई अड्डों आदि की सुरक्षा करते हैं, और इनमें से कई तो ड्यूटी के दौरान शहीद भी हो जाते हैं. लेकिन उनकी सेवा शर्तें इतनी अनिश्चित हैं कि उन्हें 10 से 15 वर्षों तक 'डिप्टी कमांडेंट' के पद पर पदोन्नति नहीं मिल पाती.”

प्रोफेसर रामगोपाल यादव कहते हैं कि उन्हें मजबूर होकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा, और पिछले साल कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उन्हें 1986 से ही 'संगठित सेवाओं' (Organised Services) के रूप में माना जाए. लेकिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लागू नहीं किया, जिसके चलते उन्हें 'अवमानना ​​याचिकाएं' (Contempt Petitions) दायर करनी पड़ीं.

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