CAG राम मंदिर के दान का ऑडिट कर सकता है? नियम-कानून क्या कहते हैं?
CAG के पास आमतौर पर भारत सरकार के कंट्रोल वाले दफ्तरों के किसी भी खाते का ऑडिट करने की शक्ति होती है. इसके अलावा, कैग राज्यपाल के कहने पर राज्य सरकारों के मालिकाना हक या कंट्रोल वाले सरकारी निकायों, प्राधिकरणों या निगमों के खातों का ऑडिट भी कर सकता है.

राम मंदिर के लिए मिलने वाले दान का ऑडिट CAG (Comptroller and Auditor General of India) से कराने की मांग की जा रही है. ये मांग राम मंदिर तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के दान में हेराफेरी का मामला सामने आने के बाद की गई है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में इसे लेकर एक याचिका डाली गई है. इसमें दान घोटाले की जांच के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार की बनाई स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) पर भी सवाल उठाए गए हैं. इस याचिका के बहाने सवाल उठ रहे हैं कि क्या कैग के पास राम मंदिर ट्रस्ट को मिलने वाले दान का ऑडिट करने का अधिकार है? कानून इस पर क्या कहता है?
पहले दो शब्दों को अच्छे से समझ लेते हैं. पहला कि ये ऑडिट क्या बला है? दूसरा कैग क्या है?
ऑडिट को सरल भाषा में ऐसे समझिए कि यह किसी संस्था के पैसे के हिसाब-किताब की निष्पक्ष जांच है. मान लीजिए कोई कानूनी संस्था है. जैसे राम मंदिर ही को ले लीजीए. इसे तमाम जगहों से दान के रूप में पैसे या अन्य कीमती चीजें मिलती हैं. मंदिर के रखरखाव की व्यवस्था इसी दान से की जाती है. इसके हिसाब-किताब को अगर कोई स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम जांचे कि सब कुछ पारदर्शी तरीके से हुआ है या नहीं, इसी को ऑडिट कहते हैं. भारत सरकार के लिए ये काम CAG यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक करते हैं.
CAG भारत सरकार का सबसे बड़ा ऑडिट अधिकारी होता है. सरकारी पैसे का दुरुपयोग, गबन या घोटाला न हो, इसकी निगरानी करने वाली संस्था यही है. इसे ‘सरकारी पैसे का रक्षक’ कहें तो गलत नहीं होगा. हालांकि, कैग किस संस्था का ऑडिट कर सकता है, इसकी भी सीमाएं हैं. उसके जांच के अधिकार में वो संस्थाएं हैं जो या तो सरकारी हैं या सरकार का जहां पैसा लगा है. इसलिए राम मंदिर के चंदे की ऑडिट कैग से कराने की मांग पर सवाल उठ रहे हैं.
राम मंदिर का CAG ऑडिट हो सकता है?इंडिया टुडे से जुड़ीं अनीशा माथुर की रिपोर्ट के मुताबिक, CAG के पास आमतौर पर भारत सरकार के कंट्रोल वाले दफ्तरों के किसी भी खाते का ऑडिट करने की शक्ति होती है. इनमें नगर निगम या तमाम तरह की अथॉरिटीज शामिल हैं. इसके अलावा, कैग राज्यपाल के कहने पर राज्य सरकारों के मालिकाना हक या कंट्रोल वाले सरकारी निकायों, प्राधिकरणों या निगमों के खातों का ऑडिट भी कर सकता है.
हालांकि, CAG ऐक्ट की धारा-20 के कहती है कि CAG किसी ऐसी बॉडी या अथॉरिटी के खातों का ऑडिट भी कर सकता है, जो पहले से अधिनियम के दायरे में नहीं हैं. लेकिन ऐसा राष्ट्रपति या राज्यपाल या केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक के कहने पर ही किया जा सकता है. इसके अलावा, कैग सिर्फ उन संस्थाओं के खातों तक पहुंचने की अपील कर सकता है, जिसमें सरकार का पैसा लगा हो.
राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि मंदिर राष्ट्रीय महत्व का एक धार्मिक और धर्मार्थ संस्थान है. यह देश-विदेश के राम भक्तों के अपनी मर्जी से किए गए योगदान और सरकारी संगठनों के दान से चलता है. ऐसे में यहां पैसे की हेरफेर के आरोपों से लाखों भक्तों की आस्था और भरोसे पर चोट लगती है. ऐसे में व्यापक ‘जनहित’ में यह जरूरी है कि मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच हो.
सवाल है कि क्या CAG किसी मंदिर ट्रस्ट का ऑडिट कर सकता है?
सर्राफ एंड पार्टनर्स के पार्टनर गौहर मिर्जा ने इंडिया टुडे को बताया कि CAG का अधिकार क्षेत्र तो काफी फैला हुआ है, लेकिन यह अनंत नहीं है. CAG प्राइवेट संस्थाओं के जरिए इस्तेमाल होने वाले सरकारी फंड और सब्सिडी की जांच तो कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसे उनके सभी कामकाज का ऑडिट करने का आम अधिकार मिल गया है. CAG एक्ट की धारा 20 एक खास तरीका बताती है, जिसके तहत राष्ट्रपति या गवर्नर ‘जनहित’ में उन संस्थाओं के ऑडिट का काम CAG को सौंप सकते हैं जो आमतौर पर उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आतीं.
मिर्जा यह भी कहते हैं कि जब तक सरकारी मालिकाना हक न हो, काफी मात्रा में सरकारी फंडिंग न हो, या धारा 20 के तहत कोई खास जिम्मेदारी न सौंपी गई हो, तब तक CAG प्राइवेट या चैरिटेबल संस्थाओं पर सिर्फ इसलिए अपना अधिकार नहीं जमा सकता क्योंकि वो जनहित के कामों में लगी हुई है.
कानून क्या कहता है?एक सवाल ये भी है कि राम मंदिर ट्रस्ट पर CAG के अधिकार क्षेत्र का कानूनी आधार क्या है? इसका जवाब वकील अमीर खान वली देते हैं. उनके मुताबिक, अभी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ऑडिट की जा सकने वाली संस्थाओं की किसी भी कैटेगरी में ठीक से फिट नहीं बैठता है. हालांकि मंदिर ट्रस्ट को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद सरकार के आदेश से बनाया गया था, लेकिन यह सख्ती से उस "निकाय या प्राधिकरण" (body or Authority) के दायरे में नहीं आता है जो राज्य (state) या सरकारी फंडिंग के तहत आते हैं.
वली आगे कहते हैं कि केवल मंदिर सार्वजनिक महत्व का है, इस आधार पर ही इस पर CAG का अधिकार लागू नहीं हो जाता. यह सरकारी विभाग नहीं है. सरकारी कंपनी नहीं है. वैधानिक निगम (statutory corporation) नहीं है. संसदीय कानून से बनाया गया निकाय नहीं है. या सरकारी अनुदान से बड़े पैमाने पर फंडेड नहीं है. ऐसे में इसके कैग ऑडिट के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल के आदेश का ही सहारा हो सकता है.
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