BHU में प्रोफेसर समेत सैंकड़ों नियुक्तियों पर हाई कोर्ट ने रोक क्यों लगा दी?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने BHU में लगभग 800 नियुक्तियों और प्रमोशन पर सवाल खड़े कर दिए हैं. यूनिवर्सिटी प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती हो गई है.
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बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक झटके में प्रोफेसर समेत अन्य सैकड़ों पदों पर नियुक्तियां सवालों के घेरे में आ गई हैं. विश्वविद्यालय की एक एसोसिएट प्रोफेसर की तरफ से दायर की गई याचिका से अब एक बड़ा विवाद और संकट खड़ा हो गया है. इसकी वजह से लगभग 800 नियुक्तियों और प्रमोशन पर सवाल उठ रहे हैं. साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.
क्या है मामला?आशीष मिश्र की ओर से इंडिया टुडे हिंदी के लिए लिखी गई एक रिपोर्ट में पूरा मामला विस्तार से बताया गया है. इसके मुताबिक पूरा विवाद BHU के कुलपति की ओर से इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल करने से जुड़ा हुआ है. यूनिवर्सिटी में कथक की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपांविता सिंह राय ने प्रोफेसर के सेलेक्शन के लिए गठित कमेटी की वैधता को कोर्ट में चुनौती दी थी. उनका आरोप था कि जब यह कमेटी बनाई गई थी, तब BHU में कोई भी कार्यकारी परिषद नहीं था. ऐसे में कुलपति ने इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल करते हुए सेलेक्शन कमेटी का गठन किया था. जबकि दीपांविता सिंह का कहना था कि जबकि यह मामला किसी अचानक नियुक्ति का नहीं था, बल्कि रेगुलर प्रमोशन से जुड़ा था.
कार्यकारी परिषद यूनिवर्सिटी में अहम फैसले लेने वाली सर्वोच्च संस्था होती है. यही पूरे यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट, फाइनेंस और पॉलिसी से जुड़े फैसले लेती है. रिपोर्ट के मुताबिक याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि संबंधित पोस्ट कथक सब्जेक्ट की थी, लेकिन सेलेक्शन कमेटी में इसका कोई एक्सपर्ट ही नहीं था. बल्कि इसकी जगह भरतनाट्यम के एक्सपर्ट पैनल में थे. इस मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट में हुई.
यूनिवर्सिटी ने क्या कहा?हालांकि यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट का कहना था कि कुलपति ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के नियमों के तहत ही इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल किया था. मैनेजमेंट ने तर्क दिया कि यह नियुक्त किसी नृत्य के प्रकार की नहीं, बल्कि नृत्य विभाग के लिए थी, इसलिए पैनल में भरतनाट्यम के एक्सपर्ट को शामिल करना गलत नहीं माना जा सकता. यूनिवर्सिटी का यह भी कहना था कि बाद में कार्यकारी परिषद बना दी गई थी, जिसने इन फैसलों को मंजूरी भी दे दी थी, इसलिए प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा जा सकता.
कोर्ट का फैसलाकोर्ट ने एसोसिएट प्रोफेसर दीपांविता सिंह और यूनिवर्सिटी दोनों का पक्ष सुना. अंत में 18 फरवरी को कोर्ट ने याचिकाकर्ता एसोसिएट प्रोफेसर के पक्ष में फैसला सुनाया. हाई कोर्ट ने सिर्फ संबंधित चयन प्रक्रिया को रद्द कर दिया. साथ ही 9 अक्टूबर 2025 को इसे लेकर कार्यकारी परिषद की ओर से दी गई मंजूरी को भी रद्द कर दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि करियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत दिया गया प्रमोशन कोई इमरजेंसी की स्थिति नहीं है. कोर्ट का कहना था कि अगर मूल प्रक्रिया में ही नियम फॉलो नहीं किए गए हैं तो बाद में दी गई मंजूरी भी लीगल नहीं है. इसके बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि दो महीने के भीतर फिर से नई सेलेक्शन कमेटी बनाई जाए और उसमें कथक एक्सपर्ट को शामिल किया जाए. साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा है कि एक्सपर्ट का पैनल तैयार करते समय उम्मीदवारों को इस प्रक्रिया से बाहर रखा जाए.
फैसले का असरअब कोर्ट के इस एक फैसले का व्यापक असर हो सकता है. फैसले ने सैकड़ों नियुक्तियों को संदेह के घेरे में ला दिया है, क्योंकि कुलपति ने बड़े पैमाने पर इमरजेंसी पावर के तहत नियुक्तियां और प्रमोशन किए हैं. इंडिया टुडे हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक BHU के पूर्व कुलपति प्रो. सुधीर कुमार जैन के कार्यकाल में लंबे समय तक कार्यकारी परिषद का गठन नहीं हो पाया था. इस दौरान उन्होंने BHU अधिनियम की धारा 7 सी (5) के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करके कई फैसले लिए थे. बताया गया है कि इस दौरान उन्होंने 450 से अधिक एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदों पर प्रमोशन किया.
साथ ही इसी प्रोसेस के जरिए 350 से अधिक नई नियुक्तियां हुईं. कई संस्थानों के डायरेक्टर नियुक्त किए गए और विभागाध्यक्षों को अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी दी गईं. हालांकि बाद में जब नई कार्यकारी परिषद गठित की गई तो इनमें से अधिकतर फैसलों को मंजूरी दे दी गई. लेकिन अब कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में इमरजेंसी पावर के इस्तेमाल पर ही सवाल उठा दिए हैं. यानी मूल प्रक्रिया को ही गड़बड़ बता दिया है. ऐसे में उस पर दी गई मंजूरी पर भी सवाल उठ रहे हैं.
अब क्या स्थिति है?फिलहाल यूनिवर्सिटी प्रशासन का यही कहना है कि सभी नियुक्तिया और प्रमोशन नियमों के तहत ही किए गए हैं और बाद में कार्यकारी परिषद की मंजूरी भी ली गई है. प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक उस समय यूनिवर्सिटी में 30 से अदिर विभागों में पद खाली थे, जिन्हें समय पर भरना जरूरी था. अगर फैसले रुक जाते तो एकेडेमिक और प्रशासनिक काम प्रभावित होते. प्रशासन का तर्क है कि इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल किया गया. बहरहाल, अब बताया जा रहा है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने और अन्य कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है. फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है. यूनिवर्सिटी के सामने कानूनी अपील के साथ-साथ आंतरिक सुधार का विकल्प भी खुला हुआ है.
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