मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी किसी मोड़ पर फिर... बशीर बद्र के 21 सबसे मशहूर शेर
Bashir Badr's demise: बशीर साहब लोकप्रिय आधुनिक शायर रहे. वे लंबे समय से डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. इसके चलते उनकी याददाश्त बहुत कमज़ोर हो गई थी. उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक़्क़त आ रही थी. अब 91 साल की उम्र में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली.

‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए'. आज बशीर बद्र साहब हमारे बीच नहीं रहे. लेकिन उनका ये शेर याद आ रहा है. आज दोपहर उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है. वे लंबे समय से डिमेंशिया (Dementia) जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. इस बीमारी के चलते उनकी याददाश्त बहुत कमज़ोर हो गई थी. उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक़्क़त आ रही थी. इसी वजह से बशीर साहब ने शायरी का साथ बहुत पहले छोड़ दिया था. आज 28 मई को 91 साल की उम्र में उन्होंने भोपाल में अंतिम सांस ली.
बशीर बद्र के बारे में थोड़ा और…बशीर बद्र का पूरा नाम सय्यद मुहम्मद बशीर था. उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में हुआ. उन्होंने शुरुआती तालीम कानपुर से हासिल की. कम उम्र में ही पुलिस की नौकरी भी की. महज 20 साल की उम्र से ही उनकी ग़ज़लें हिंदुस्तान और पाकिस्तान की अवाम तक पहुंचने लगी थीं. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वे मेरठ यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग के लेक्चरर भी रहे.
तमाम मक़ाम हासिल करने के बाद एक बीमारी ने उनसे उनकी सबसे बड़ी ताक़त छीन ली. डाक्टर बशीर बद्र को भारत सरकार ने पदमश्री से सम्मानित किया और उनको साहित्य अकादमी के अलावा विभिन्न प्रादेशिक उर्दू एकेडमियों ने भी सम्मानित किया. बशीर साहब अपनी बातों को बेहद सरल शब्दों में पिरोया करते थे. और यही उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत रही. वे अपने पीछे जो कलाम छोड़ गए हैं उसकी एक झलक देख लीजिए.
बशीर साहब के 21 मशहूर शेर:-- न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
- हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
- मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
- ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है
- कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
- तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आंखें हमारी कहां से लाएगा
- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
- अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो
- तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा
- चराग़ों को आंखों में महफ़ूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
- उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते
- अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गए हैं
आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते
- कभी यूं भी आ मिरी आंख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बाद सहर न हो
- आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
- दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा है उसने लूटा है
- काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
- मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूं
- कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते
किसी की आंख में रह कर संवर गए होते
- नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं
ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे
- मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहां होगा
परिंदा आसमां छूने में जब नाकाम हो जाए
- मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियां
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो
बशीर बद्र साहब के अल्फ़ाज़ जितने आसान हैं उतनी ही सुरीली उनकी आवाज़. उन्होंने सिर्फ़ शायरी नहीं की, बल्कि महफ़िलों में जाकर अपने कलाम को पढ़ा और सुनाया भी. ग़ज़ल जब गाई जाए तो उसे तरन्नुम कहते हैं. उनकी आवाज़ उन लफ़्ज़ों का भार उठाती रही, जिन्हें वो रात भर अपनी डायरी में लिखते रहे. यूट्यूब पर उनके मुशायरों के कई वीडियो हैं. आप उन्हें देखिए और दिल खोलकर याद करिए. ऊपर दिए गए कई शेर उन्होंने महफ़िलों में गाए हैं.
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