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हाथी-घोड़ा-ऊंट, डीजे पर डांस, 85 साल का 'दूल्हा', ये बारात नहीं शव यात्रा है

राजस्थान के अलवर में एक 85 साल के बुजुर्ग की अंतिम यात्रा किसी जश्न की तरह निकाली गई. उनकी अंतिम शव यात्रा में उन्हें दूल्हे की तरह साफा पहनाया गया. चश्मा लगाया गया.

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Alwar elderly person unique funeral procession
बुजुर्ग को दूल्हे की तरह सजाकर अंतिम विदाई दी गई. (फोटो-इंडिया टुडे)
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रितिका
19 मार्च 2025 (Published: 11:58 PM IST)
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राजस्थान के अलवर में 85 साल के बुजुर्ग की शव यात्रा चर्चा का विषय बनी हुई है. बुजुर्गों की अंतिम यात्रा बैंड-बाजे के साथ निकालना आम माना जाता है. लेकिन गाड़िया लोहार समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बुजुर्ग रिछपाल की अंतिम यात्रा में जिस तरह का 'जश्न' मनाया गया, वो वाकई में अनोखा है. परिवार के लोगों ने रिछपाल गाड़िया लोहार को दूल्हे की तरह सजाया. उन्हें बकायदा साफा पहनाया गया. इसके बाद उन्हें अर्थी पर लिटाया नहीं गया, बल्कि दूल्हे की तरह बिठाकर ले जाया गया. यही नहीं, उनकी लंबी शव यात्रा के लिए घोड़े, ऊंट और हाथी तक का इंतजाम किया गया. इसका वीडियो भी सामने आया है. देखकर समझ नहीं आ रहा शव यात्रा निकल रही है या बारात. 

बुजुर्ग की अनोखी शव यात्रा

इंडिया टुडे के रिपोर्टर हिमांशु के मुताबिक, रिछपाल के निधन की खबर राजस्थान समेत हरियाणा और उत्तर प्रदेश के गाड़िया लोहार समुदाय के लोगों तक तेजी से फैली. वे सभी बड़ी संख्या में अलवर पहुंचने लगे. बुजुर्ग के अंतिम संस्कार के लिए सभी ने चंदा इकट्ठा किया. इसके बाद अनोखी शव यात्रा निकाली गई. रिछपाल को दूल्हे की तरह सजाकर तीजकी श्मशान ले जाया गया. उन्हें दूल्हे की तरह साफा पहनाया गया है. चश्मा लगाया गया है. गले में माला है. अर्थी को रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजाया गया है.

इस दौरान हाथी, घोड़ा और ऊंट को भी शव यात्रा का हिस्सा बनाया गया. डीजे वाले को भी बुलाया गया था. लोग नाचते-गाते, रंग उड़ाते हुए रिछपाल को अंतिम विदाई दी.

इस दिलचस्प शव यात्रा को लेकर मृतक के एक परिजन ने बताया,

“रिछपाल पांच जिलों के पंच थे. इस तरह की शव यात्रा निकालने का रिवाज है. हमारे बुजुर्ग भी ऐसा ही करते थे. अंतिम यात्रा के लिए हमारे समाज ने मिलकर पैसा इकट्ठा किया था. किसी ने 500 रुपये दिए तो किसी ने 1000 रुपये दिए हैं.”

बुजुर्ग रिछपाल अलवर के एनईबी एरिया के सड़क किनारे बनी झुग्गी में परिवार के साथ रहते थे. वे लोहे के छोटे-छोटे सामान बनाकर जीवन यापन करते थे.

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