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मुसलमानों पर हमलों को लेकर NHRC की भूमिका पर 'बंटे' इलाहाबाद HC के जज

आम तौर पर किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच एक ही आदेश पारित करते हैं. लेकिन कभी-कभी जब दोनों जज किसी मामले में एक राय पर नहीं पहुंचते तो अलग-अलग अंतरिम आदेश पारित करते हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कुछ ऐसा ही हुआ.

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29 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 29 अप्रैल 2026, 06:42 PM IST)
Allahabad high court division bench nhrc split verdict
इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक मामले में Split Verdict दिया है. (इंडिया टुडे)
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इलाहाबाद हाई कोर्ट में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिए गए आदेश के खिलाफ लगाई गई एक याचिका पर सुनवाई चल रही थी. सुनवाई दो जजों की डिवीजन बेंच कर रही थी. NHRC और देश भर के मानवाधिकार आयोगों की भूमिका को लेकर दोनों जजों की राय अलग थी, इसलिए उन्होंने इस मामले में अलग-अलग अंतरिम आदेश (Split Verdict) पारित किए. 

जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि देश भर के मानवाधिकार आयोग मुसलमानों पर हुए हमलों और लिंचिंग से जुड़े मामलों में स्वत: संज्ञान लेने में फेल रहे हैं. वहीं जस्टिस विवेक सरन ने कहा कि वह इस तरह के ऑब्जर्वेशन से सहमत नहीं हैं.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के खिलाफ टीचर्स एसोसिएशन 'मदरिस अरबिया' की दायर की गई याचिका पर सुनवाई कर रहा था. 'मदरिस अरबिया' ने NHRC द्वारा मदरसे के कामकाज को लेकर पारित किए गए कुछ आदेशों को चुनौती दी थी.

जस्टिस श्रीधरन ने मदरसों के खिलाफ जांच का निर्देश देने के NHRC की शक्ति पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि मानवाधिकार आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर के मामलों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. खास तौर पर उन मामलों में जिनको अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट के सामने उठाया जा सकता है. जस्टिस श्रीधरन ने कहा, 

मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले और उनकी लिंचिंग से जुड़ी कुछ घटनाओं में अपराधियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं होते या फिर ठीक से जांच नहीं होती. ऐसे मामलों में स्वत: संज्ञान लेने के बजाय मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हस्तक्षेप करता है जिससे प्रथम दृष्टया उसको कोई लेना-देना नहीं है.

उन्होंने आगे कहा कि कोर्ट को इस बात की जानकारी नहीं है कि NHRC उन मामलों में स्वत: संज्ञान लेता हो, जिसमें कुछ ग्रुप्स कानून को अपने हाथ में  लेकर देश के आम नागरिकों को परेशान करते हैं. इसके बाद जस्टिस श्रीधरन ने दो अलग समुदायों के लोगों को आपसी संबंध के चलते होने वाली परेशानियों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा,

 पब्लिक प्लेस पर किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ एक कप कॉफी पीना भी कभी-कभी डर का कारण बन जाता है.

वहीं जस्टिस विवेक सरन ने कहा कि वे जस्टिस श्रीधरन के कॉमेंट्स से सहमत नहीं हैं. उन्होंने एक अलग आदेश पारित किया. जस्टिस सरन ने कहा, 

अनुच्छेद 6 और अनुच्छेद 7 में कई फैक्ट्स मेंशन किए गए हैं. जिससे मैं सहमत नहीं हूं. इसलिए मैं जस्टिस अतुल श्रीधरन के दिए गए आदेश से असहमत हूं.

जस्टिस सरन ने कहा कि अगर NHRC की भूमिका को लेकर कोई आदेश पारित करना था तो सभी संबंधित पक्षों को सुना जाना चाहिए था. उन्होंने ये भी कहा कि पक्षकारों के एब्सेंट होने की स्थिति में किसी भी तरह की प्रतिकूल टिप्पणी की जरूरत नहीं थी.

वीडियो: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ED को किस बात पर नसीहत दे दी?

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