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क्लासमेट पर बनाया बुर्का पहनने का दबाव, HC का आदेश- 'गंभीर आरोप, FIR रद्द नहीं होगी'

ये मामला जनवरी 2026 का है, जब एक प्राइवेट ट्यूशन में पढ़ने वाली 5 लड़कियों के खिलाफ जबरन धर्मांतरण कराने की शिकायत दर्ज कराई गई थी.

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17 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 17 अप्रैल 2026, 05:22 PM IST)
allahabad high court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफआईआर खारिज करने से किया इनकार. (फोटो- India today)
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12वीं क्लास में पढ़ने वाली 5 मुस्लिम छात्राओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया. पांचों लड़कियों पर आरोप है कि उन्होंने अपने ग्रुप की अकेली हिंदू सहपाठी पर बुर्का पहनने का दबाव बनाया. उसके धर्म परिवर्तन की भी कोशिश की. आरोपी 5 लड़कियों में 4 नाबालिग हैं, जिनकी उम्र 16 से 18 साल के बीच है. एक आरोपी बालिग है, जिसकी उम्र 20 साल बताई गई है. कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि युवाओं में इस तरह के रुझान काफी चिंताजनक हैं. उनके जीवन का ये वो समय है, जब उन्हें पढ़ाई के बारे में सोचना चाहिए था और अपने  व्यक्तित्व विकास की कोशिश करनी चाहिए थी. 

क्या है मामला 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला जनवरी 2026 का है. एक प्राइवेट ट्यूशन में पढ़ने वाली 5 लड़कियों के खिलाफ जबरन धर्मांतरण कराने की शिकायत दर्ज कराई गई थी. मुरादाबाद शहर की इस ट्यूशन क्लास में 6 लड़कियां थीं. इनमें 5 मुस्लिम थीं और सिर्फ एक हिंदू थी. पीड़िता का आरोप है कि जब वो ट्यूशन क्लास से वापस घर लौटती थी, तब बाकी 5 लड़कियां उस पर बुर्का पहनने का दबाव बनाती थीं. FIR में ये भी कहा गया कि आरोपी लड़कियों ने अपनी अकेली हिंदू सहपाठी को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर भी किया था. 

इससे जुड़ा एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया है, जिसके बाद हिंदू लड़की के भाई ने पुलिस में इसकी शिकायत कर दी. शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्हें इस गतिविधि के पीछे किसी 'गहरी साजिश' का संदेह है, जिसकी पूरी तरह से जांच की जानी चाहिए. इसके बाद पुलिस ने इस मामले में 5 लड़कियों के खिलाफ धर्मांतरण विरोधी एक्ट की धारा 3 और 5(1) के तहत 22 जनवरी को शिकायत दर्ज की थी. ये दोनों धाराएं जबरन धर्मांतरण या गलतबयानी, धोखाधड़ी या विवाह के जरिए धर्मांतरण की कोशिशों से जुड़ी हैं. .

क्या कहा कोर्ट ने?

इसी FIR को ही रद्द कराने के लिए आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की थी. केस की सुनवाई करते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने गुरुवार, 16 अप्रैल को अपने आदेश में कहा, 

धर्मांतरण विरोधी कानून ऐसे लोगों के लिए ही लाया गया था, जो अपने धर्म का प्रचार-प्रसार नहीं करते बल्कि दूसरों पर उसे थोपते हैं. उन्हें लगता है कि वो जिस धर्म में आस्था रखते हैं, उसका पालन दूसरों को भी करना चाहिए.

कोर्ट ने आगे कहा कि युवाओं में अगर इस तरह का रुझान दिखता है तो ये और चिंताजनक बात है. यह उनके जीवन का वो समय है, जब उन्हें शिक्षा और अलग-अलग क्षेत्रों में कौशल विकास पर ध्यान देना चाहिए. समाज और राष्ट्र की सेवा में अपने को समर्पित करने के बारे में सोचना चाहिए. 

खंडपीठ के मुताबिक, किसी उभरते हुए खतरे को रोकने के लिए बनाए गए कानून को अगर शुरुआती चरणों में ही रोक दिया जाए तो वह कानून को ही उलझा देगा. उसके मकसद को विफल कर देगा. कोर्ट ने साफ किया कि इसका मतलब ये नहीं कि नए कानून के तहत झूठे आरोपों को प्रोत्साहित किया जाए. लेकिन ठोस सबूतों के साथ शुरू किए गए केस को शुरुआत में ही खत्म करके इस कानून के मकसद को विफल नहीं किया जा सकता.

दूसरे पक्ष की दलील

वहीं, एफआईआर खारिज करने की अपील करने वाले पक्ष ने हिंदू लड़की के भाई की शिकायत को बदले की कार्रवाई बताया है. उनका कहना है कि वह आरोपियों में से एक लड़की को परेशान करता था. उसका पीछा करता था. उससे यौन संबंध बनाने के लिए भी कहा था. ये घटना होने पर छात्रा और उसकी साथियों ने प्रिंसिपल के पास शिकायत की थी. इसके बाद बदला लेने के लिए उसने मनगढ़ंत कहानी के आधार पर लड़कियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी.

आरोपी छात्राओं के वकील ने इस बात पर जोर दिया कि न तो धर्मांतरण हुआ है और न ही धर्मांतरण का प्रयास किया गया है. एफआईआर दुर्भावनापूर्ण तरीके से दर्ज की गई है.

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