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'धर्मांतरण विरोधी कानून अंतरधार्मिक विवाह या लिव इन पर रोक नहीं लगाता', HC का अहम बयान

Allahabad High Court ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार का धर्मांतरण विरोधी कानून अंतर धार्मिक विवाह और लिव इन रिलेशनशिप पर प्रतिबंध नहीं लगाता है. अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति बालिग हो चुका है उसे साथी चुनने से वंचित नहीं किया जा सकता. ऐसा करना बालिगों के अधिकारों पर अंकुश लगाना होगा.

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24 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 24 फ़रवरी 2026, 08:53 PM IST)
allahabad high court interfaith marriage live in relationship
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक शादी और लिव इन को लेकर बड़ा फैसला किया है. (इंडिया टुडे)
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उत्तर प्रदेश का धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून अंतरधार्मिक विवाह और लिव इन रिलेशनशिप पर रोक नहीं लगाता. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अलग-अलग धर्मों से जुड़े कपल्स की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये अहम टिप्पणी की है. 

कोर्ट ने कहा, ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021’ अंतरधार्मिक विवाह और लिव इन रिलेशनशिप पर रोक नहीं लगाता है. कोर्ट ने साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सबको जीवनसाथी चुनने का अधिकार और गरिमा के साथ जीने का अधिकार मिला हुआ है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा, 

किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो. यह उनके जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है. किसी के निजी संबंधों में हस्तक्षेप करना उसके चुनने की स्वतंत्रता का गंभीर अतिक्रमण होगा. यदि कानून दो व्यक्तियों को, चाहे वे समान लिंग के हीं क्यों न हों, शांतिपूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है तो दो बालिग व्यक्तियों के स्वेच्छा से साथ रहने पर न तो कोई व्यक्ति, न परिवार और न ही राज्य आपत्ति कर सकता है.

कई अंतरधार्मिक जोड़ों ने हाई कोर्ट से अपने परिवार और दूसरे लोगों से जान के खतरे की आशंका जताते हुए सुरक्षा की मांग की थी. उनका कहना था कि पुलिस के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं किए जाने के कारण उनको हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा,

 साल 2021 का धर्मांतरण विरोधी कानून की धारा 3 और 5 तभी लागू होगा, जब ताकत, प्रलोभन, छल, दबाव या शादी करके जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराया गया हो. इन मामलों में ऐसा कोई आरोप नहीं था.

कोर्ट ने साफ किया कि अंतरधार्मिक विवाह 2021 के अधिनियम के तहत प्रतिबंधित नहीं है. यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उसे अधिनियम की धारा 8 और 9 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा. लेकिन विवाह या लिव इन रिलेशन के लिए किसी को धर्म बदलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. हाई कोर्ट ने कहा,

जो व्यक्ति बालिग हो चुका है उसे साथी चुनने से वंचित नहीं किया जा सकता. ऐसा करना बालिगों के अधिकारों पर अंकुश लगाना होगा और देश की 'विविधता में एकता' की अवधारणा के खिलाफ होगा.  

हाई कोर्ट की बेंच ने सुप्रियो चक्रवर्ती उर्फ सुप्रिया चक्रवर्ती बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और हाई कोर्ट के पूर्व जजों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 सभी व्यक्तियों को समानता का अधिकार देते हैं. ये धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता. 

कोर्ट ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का जिक्र भी किया जिसमें विवाह या आपसी सहमति से बने संबंधों के चलते खतरे का सामना कर रहे जोड़ों के लिए सुरक्षा के उपाय तय किए गए थे. जस्टिस सिंह की बेंच ने कहा,

 राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे. अंतरधार्मिक शादी करने या संबंधों में रहने के आधार पर किसी को उनके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित पुलिस अधिकारियों के पास आवेदन देने की स्वतंत्रता दी और प्रशासन को निर्देश दिया कि यदि जांच में खतरे की बात सही निकले तो उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए. साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि यदि जबरन धर्म परिवर्तन का मामला हो तो FIR दर्ज कराई जा सकती है.

वीडियो: बहू के खिलाफ सास भी दर्ज करा सकती है घरेलू हिंसा का केस, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?

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