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भारत में नहीं उड़ेंगे विमान? एयर इंडिया, इंडिगो, स्पाइसजेट ने सरकार को चेताया

ग्लोबल ऑयल प्राइस बढ़ गए हैं. और दूसरा, एयरस्पेस पर रिस्ट्रिक्शन्स लग गई हैं. जिसके चलते फ़्लाइट्स को लंबे रूट्स से जाना पड़ रहा है. इससे ईंधन ज़्यादा ख़र्च होगा, वक़्त भी ज़्यादा लगेगा. नतीजतन, लागत बढ़ेगी.

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28 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 28 अप्रैल 2026, 09:05 PM IST)
Airlines may stop operations
क्या हवाई यात्रा बंद होने वाली है? (फाइल फोटो- पीटीआई)
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क्या भारत में हवाई सफर बंद हो सकता है? देश की सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनियां इसी तरफ इशारा कर रही हैं. उनका कहना है कि भारत में फ़्लाइट्स रुक सकती हैं. उन्होंने ये बात खुद सरकार को भेजे अपने SOS में कही है. एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी कंपनियों का कहना है कि एविएशन सेक्टर काफी स्ट्रेस से गुज़र रहा है और वे अपने ऑपरेशन्स बंद करने की कगार पर हैं. अगर हालात ऐसे ही रहे तो फ़्लाइट्स कैंसल हो सकती हैं और एयरक्राफ़्ट ग्राउंड हो सकते हैं. 

इसका सबसे बड़ा कारण है ATF यानी एविएशन टरबाइन फ़्यूल. वो फ़्यूल जिससे प्लेन उड़ते हैं. इसके लिए पहले एयरलाइंस के टोटल ख़र्च में से क़रीब 30–40% हिस्सा ATF पर जाता था. लेकिन अब ये बढ़कर 55–60% तक पहुंच गया है. मतलब आधे से ज़्यादा ख़र्चा सिर्फ़ "फ़्यूल" पर. और ये जंप अचानक हुआ है, अप्रैल के प्राइस हाइक के बाद. और दूसरा झटका, वेस्ट एशिया वॉर (मिडिल ईस्ट में जारी जंग).

इस जंग का असर फ़्लाइट्स और एयरलाइंस पर दो तरह से पड़ रहा है. एक तो ग्लोबल ऑयल प्राइस बढ़ गए हैं. और दूसरा, एयरस्पेस पर रिस्ट्रिक्शन्स लग गई हैं. जिसके चलते फ़्लाइट्स को लंबे रूट्स से जाना पड़ रहा है. इससे ईंधन ज़्यादा ख़र्च होगा, वक़्त भी ज़्यादा लगेगा. नतीजतन, लागत बढ़ेगी.

समस्या के निपटारे के लिए एयरलाइंस क्या कह रहीं?

फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एयरलाइंस (FIA) ने इसे लेकर सरकार को लेटर लिखा है. FIA इन तीनों बड़ी एयरलाइंस की एक कलेक्टिव बॉडी है. वो सरकार को लिखती है, “ATF (प्लेन के फ़्यूल) की क़ीमत अगर ग़ैरवाजिब तरीक़े से बढ़ाई जाती है तो इससे ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई नहीं की जा सकेगी. एयरक्राफ़्ट खड़े करने पड़ जाएंगे.”

मैसेज सीधा है, अगर एयरक्राफ़्ट का फ़्यूल और महंगा हो गया तो लॉस इतने बढ़ेंगे कि प्लेन्स खड़े करने पड़ेंगे. सरकार के नाम ये लेटर लिखने के पीछे एक बड़ी वजह एक ऐसी डिमांड भी है, जो शब्दों में सीधे-सीधे नहीं कही गई लेकिन इशारा कर दिया गया है. और वो है "टैक्स". 

इंडिया में एयरक्राफ़्ट टरबाइन फ़्यूल पर बहुत तरह के टैक्स लगते हैं. इनमें 11% एक्साइज़ ड्यूटी और राज्यों का VAT भी शामिल है. इंडिया के सबसे बड़े एविएशन हब दिल्ली में ये VAT 25% है. जबकि देश में सबसे ज़्यादा VAT तमिलनाडु सरकार वसूलती है, 29%. जहां चेन्नई एयरपोर्ट है. 

बाक़ी बड़े शहर जैसे मुंबई, बैंगलोर, हैदराबाद और कोलकाता में VAT 16% से 20% के बीच है. FIA का कहना है कि ये 6 शहर भारत के आधे से ज़्यादा एयरलाइन ऑपरेशन्स संभालते हैं.

ये तर्क देते हुए एयरलाइंस ने कुछ सीधी मांगे भी रखी हैं. FIA की डिमांड्स हैं:

- प्लेन के फ़्यूल की क़ीमत वाजिब हो, 
- 11% एक्साइज़ ड्यूटी टेम्पररी रूप से हटा दी जाए, 
- VAT के रेट कम हों.

एयरलाइन कंपनियों का कहना है कि ये डिमांड्स जल्दी से जल्दी पूरी की जाएं ताकि कॉस्ट कम किया जा सके. 

एक बड़ी दिक्कत ग्लोबल लेवल पर भी है. "इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट" वाला इशू.

इंडिया में जो ऑयल रिफ़ाइनरीज़ हैं उनके टोटल प्रोडक्शन का सिर्फ़ 4% ही ATF होता है. इसमें से भी 30% ATF डोमेस्टिक एयरलाइंस यूज़ करती हैं, 20% ATF का इस्तेमाल इंटरनेशनल कैरियर्स करते हैं. जबकि 50% ATF एक्सपोर्ट हो जाता है. मतलब इस 4% का भी आधा (यानी 4 में से 2%) फ़्यूल दूसरे देशों को बेच दिया जाता है.

इस वजह से इंडियन एयरलाइंस को प्लेन का ये फ़्यूल महंगी क़ीमतों पर खरीदना पड़ रहा है. जिसे फिर "रुपया फ़ैक्टर" से जोड़ें तो स्थिति और नाज़ुक हो जाती है, क्योंकि ग्लोबल लेवल पर रुपया कमज़ोर हुआ है. इसकी वजह से इम्पोर्ट कॉस्ट भी बढ़ गया है. जो प्रेशर की तीसरी परत है. और ये बात एकदम क्लियर है कि इसका असर फ़्लाइट्स के पैसेंजर्स पर भी आएगा. 

जैसे: एयरलाइंस घाटे में जाएंगी, फ़्लाइट्स कम होंगी, टिकट की क़ीमतें बढ़ेंगी और कनेक्टिविटी प्रभावित होगी. यानी घूम–फिरकर इसका असर पैसेंजर्स पर ही आएगा.

हालांकि इसके लिए सरकार पहले एक क़दम भी उठा चुकी है. उसने अप्रैल में डोमेस्टिक ATF प्राइस हाइक को ₹15 प्रति लीटर तक कैप कर दिया था. लेकिन इंटरनेशनल फ़्लाइट्स के लिए प्राइस ₹73 प्रति लीटर तक बढ़ गया, जो अपने आप में बहुत ज़्यादा है. 

एयरलाइंस इसे अपने शब्दों में "कम्प्लीटली अनवायबल" कहती हैं. यानी जिसके साथ काम जारी रख पाना नामुमकिन सा है. 

इस SOS के साथ ही एयरलाइंस ने अब गेंद सीधे सरकार के पाले में डाल दी है. इसके बाद सवाल ये है कि सरकार क्या क़दम उठाएगी? अगर कोई क़दम तुरंत नहीं उठाया गया तो क्या पैसेंजर्स को महंगी फ़्लाइट्स और कैंसलेशन्स के लिए तैयार रहना होगा? क्योंकि फ़िलहाल जो संकेत हैं वो बता रहे हैं कि एविएशन सेक्टर टर्ब्युलेंस से गुज़र रहा है… और ये टर्ब्युलेंस अब ज़मीन पर भी महसूस होने लगा है.

वीडियो: न्यूयॉर्क के एक रनवे पर ट्रक से कैसे टकराया एयर कनाडा का प्लेन?

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