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2027 में बड़े शहरों में क्राइम रेट घट जाएगा, भविष्यवाणी नहीं 'गणित' है ये, समझिए कैसे?

NCRB हर साल हुए अपराधों की संख्या को अपडेट करता है. लेकिन शहरों के लिए, क्राइम रेट की गिनती करते समय वह पिछली जनगणना की आबादी को आधार के तौर पर इस्तेमाल करता है. पॉपुलेशन का यह आंकड़ा अगली जनगणना होने तक वैसे का वैसा बना रहता है.

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10 मई 2026 (पब्लिश्ड: 11:16 PM IST)
after census 2027 crime rates of ncrb data will see decline here is why
क्राइम का डेटा निकालते समय आखिरी जमगणना को ध्यान में रखा जाता है (PHOTO-AajTak)
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देश में अगले साल यानी 2027 में कई बड़े शहरों का क्राइम रेट कम दिखाई दे सकता है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं होगा कि अचानक अपराध बहुत कम हो गए हैं या पुलिस ने अपराध पर पूरी तरह लगाम लगा दी है. इसके पीछे असली वजह जनगणना और आंकड़ों का गणित है. दरअसल, National Crime Records Bureau (NCRB) हर साल देशभर में होने वाले अपराधों का डेटा जारी करता है. क्राइम रेट निकालने के लिए अपराधों की संख्या को शहर की आबादी के हिसाब से गिना जाता है. लेकिन यहां एक बड़ी बात ये है कि NCRB आबादी के लिए पिछली जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करता है. जब तक नई जनगणना नहीं होती, तब तक वही पुरानी आबादी आधार बनी रहती है.

यानी अगर किसी शहर की असली आबादी तेजी से बढ़ गई हो, तब भी क्राइम रेट निकालते समय पुराने जनसंख्या आंकड़े ही इस्तेमाल किए जाते हैं. इस वजह से कई बार क्राइम रेट ज्यादा दिखाई देता है.

जनगणना, क्राइम और गणित का खेल

दरअसल, NCRB हर साल हुए अपराधों की संख्या को अपडेट करता है. लेकिन शहरों के लिए क्राइम रेट की गिनती करते समय वह पिछली जनगणना को आधार के तौर पर इस्तेमाल करता है. पॉपुलेशन का यह आंकड़ा अगली जनगणना होने तक वैसे का वैसा बना रहता है. इसलिए, भले ही हर साल दर्ज होने वाले अपराधों की संख्या घटती-बढ़ती रहे, लेकिन क्राइम रेट की गिनती के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आबादी का आधार सेम रहता है. आमतौर पर एक दशक तक ये नंबर सेम होता है लेकिन इस बार मामला और बड़ा है. क्योंकि देश में आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी. यानी 15 साल से ज्यादा समय तक वही पुरानी आबादी का डेटा इस्तेमाल हो रहा है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में दिल्ली का उदाहरण दिया गया है. 2011 की जनगणना के मुताबिक दिल्ली की आबादी करीब 1.6 करोड़ थी और अभी भी क्राइम रेट निकालने में यही आंकड़ा इस्तेमाल हो रहा है. जबकि अब दिल्ली की अनुमानित आबादी करीब 2.2 करोड़ मानी जा रही है. यानी अपराधों की संख्या नई आबादी के हिसाब से देखी जाए तो प्रति लाख लोगों पर अपराध का आंकड़ा अपने आप कम हो जाएगा.

आंकड़ों में बड़ा बदलाव 

आबादी के इस अंतर से क्राइम रेट में भारी बदलाव आता है. दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) और दिल्ली शहर में आईपीसी के तहत दर्ज अपराधों की संख्या समान है लेकिन एनसीआरबी अलग-अलग आबादी के आधारों का इस्तेमाल करता है, इसलिए दिल्ली का क्राइम रेट 1,259 प्रति लाख दिखाया गया है. जबकि दिल्ली शहर का रेट 1,688 प्रति लाख है जो 34% अधिक है. जनसंख्या आधार को अपडेट करने पर क्या होता है, इसका एक उदाहरण पहले से मौजूद है. 2001 की जनगणना में, भारत में 35 ऐसे शहर थे जिनकी जनसंख्या दस लाख से अधिक थी.

2011 में जब शहरों की जनसंख्या को अपडेट किया गया, तो उनमें से 27 शहरों में क्राइम रेट में गिरावट देखने को मिली. कोच्चि में यह रेट 1,898 प्रति लाख से घटकर 1,636 हो गया. विशाखापत्तनम, बेंगलुरु, इंदौर, अहमदाबाद और भोपाल में भी 150 से अधिक अंकों की गिरावट देखी गई. 

वीडियो: नेतानगरी: पहलगाम हमले के बाद सरकार ने अचानक जातीय जनगणना कराने का फैसला क्यों ले लिया?

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