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'बीवी का पॉर्न देखकर खुद को संतुष्ट करना पति के साथ क्रूरता नहीं', हाई कोर्ट को ऐसा क्यों कहना पड़ा?

Madras High Court की मदुरै बेंच ने अपने फैसले में साफ कहा कि "जब तक कोई चीज कानून के खिलाफ नहीं होती, तब तक किसी व्यक्ति का खुद की इच्छाओं को पूरा करना अपराध नहीं माना जा सकता." मद्रास हाई कोर्ट ने ये टिप्पणी तलाक के एक केस की सुनवाई के दौरान दिया

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20 मार्च 2025 (अपडेटेड: 20 मार्च 2025, 08:38 AM IST)
Madras High Court
'बीवी का पॉर्न देखना क्रूरता नहीं'- मद्रास हाई कोर्ट
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मद्रास उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कहा है कि पत्नी द्वारा पोर्नोग्राफी देखना या आत्म सुख में लिप्त होना पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने इस फैसले में आगे कहा कि जब तक कि यह साबित न हो जाए कि ऐसा करने से शादीशुदा रिश्तों पर बुरा असर पड़ रहा है, तब तक महिला के पति को इस मामले में राहत नहीं दी जा सकती.

हाईकोर्ट का फैसला

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति आर पूर्णिमा की मदुरै पीठ ने यह साफ किया कि अगर पत्नी अकेले में पोर्न देखती है, तो इसे पति के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता. हालांकि, यह देखने वाले पति या पत्नी के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसे स्वतः ही क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. उच्च न्यायालय ने आगे कहा:

यदि पोर्न देखने वाला व्यक्ति अपने साथी को इसमें शामिल होने के लिए मजबूर करता है, तो यह निश्चित रूप से क्रूरता मानी जाएगी. यदि यह दिखाया जाता है कि इस लत के कारण किसी के वैवाहिक दायित्वों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो यह कार्रवाई योग्य आधार प्रदान कर सकता है.

वैवाहिक निजता और यौन स्वायत्तता

मद्रास हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निजता के मौलिक अधिकार में पति-पत्नी की निजता भी शामिल है और इसके अंतर्गत महिला की यौन स्वायत्तता भी आती है.

जब निजता एक मौलिक अधिकार है, तो इसके दायरे में वैवाहिक निजता भी शामिल होगी. वैवाहिक निजता के अंतर्गत महिला की यौन स्वायत्तता के विभिन्न पहलू शामिल होंगे. जब तक कोई चीज कानून के खिलाफ नहीं होती, तब तक किसी व्यक्ति का खुद की इच्छाओं को पूरा करना अपराध नहीं माना जा सकता.

महिलाओं का आत्मसुख कोई वर्जित विषय नहीं

अदालत ने यह भी कहा कि पुरुषों में आत्मसुख को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जाता है, तो महिलाओं के मामले में क्यों नहीं? कोर्ट ने बायोलॉजिक दृष्टि से स्पष्ट किया कि पुरुष आत्मसुख के बाद तत्काल वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकते, जबकि महिलाओं के मामले में ऐसा नहीं होता.

तलाक के मामले में न्यायालय की टिप्पणी

अदालत एक पति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उसे तलाक देने से इनकार कर दिया गया था और पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका को स्वीकार कर लिया गया था. अदालत को बताया गया कि दंपति ने 11 जुलाई, 2018 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी, लेकिन वे 9 दिसंबर, 2020 से अलग रह रहे हैं.

पति ने तर्क दिया कि रिश्ता पूरी तरह से टूट चुका था और इसे जीवित रखने का कोई लाभ नहीं था. उन्होंने मुख्य रूप से दावा किया कि पत्नी संचारी रूप में यौन रोग (STD) से पीड़ित थी.

अदालत का अंतिम आदेश

मद्रास उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित नहीं होता कि पत्नी के आचरण से पति के प्रति क्रूरता हुई है, तब तक हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत इसे तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता.

इस फैसले से स्पष्ट होता है कि विवाह के बाद भी महिलाओं की व्यक्तिगत पहचान और यौन स्वायत्तता बनी रहती है और उन्हें अपने निजता के अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.
 

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