24 साल बाद बेगुनाह साबित हुआ आज़ाद, लेकिन क्या सिस्टम लौटाएगा उसकी छीनी हुई ज़िंदगी?
साल 2000 में डकैती के एक मामले में गिरफ्तार आज़ाद खान ने 24 साल जेल में बिताए. सबूतों के अभाव में हाईकोर्ट ने उन्हें बेगुनाह माना. लेकिन रिहाई के बाद भी सिस्टम ने उन्हें आसान रास्ता नहीं दिया. ये कहानी इंसाफ में देरी और सिस्टम की बेरुखी पर बड़ा सवाल है.

यूपी के मैनपुरी के रहने वाले आज़ाद खान की कहानी किसी एक आदमी की नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की सच्चाई है. साल 2000 में डकैती के एक मामले में गिरफ्तार किए गए आज़ाद को बेगुनाह साबित होने में पूरे 24 साल लग गए.
पुलिस, अदालत और प्रशासन की भूलों के बीच आज़ाद की ज़िंदगी जेल की सलाखों में गुजरती रही. दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट से बरी होने के बाद भी वह कई दिन तक जेल में बंद रहे. यह कहानी बताती है कि हमारे यहां इंसाफ सिर्फ फैसला आने का नाम नहीं है, बल्कि उसे ज़मीन पर उतरने में भी सालों लग जाते हैं.
एक दिन, जो जिंदगी खा गयासाल 2000. मैनपुरी के थाना अलाऊ इलाके का ज्योति कतारा गांव. आज़ाद खान घर पर था. अचानक पुलिस आई. कहा, डकैती का केस है. और उसे उठाकर ले गई. आज़ाद चिल्लाता रहा, कहता रहा कि वो बेगुनाह है. लेकिन पुलिस ने सुनना ही नहीं था.
डकैती की धाराएं लगीं 395 और 397. आज़ाद को तब शायद ये भी नहीं पता था कि इन धाराओं का मतलब क्या होता है. बस इतना पता चला कि मामला कोर्ट पहुंच गया है.
अदालत ने भी मान ली पुलिस की कहानीनिचली अदालत में पुलिस ने जो कहा, वही सच मान लिया गया. सबूत नहीं, बरामदगी नहीं, पुख्ता गवाह नहीं. फिर भी फैसला आया. आज़ाद को उम्रकैद. एक झटके में जिंदगी थम गई. मां-बाप टूट गए. रिश्तेदार दूर हो गए. समाज ने किनारा कर लिया.
लेकिन एक शख्स था, जिसने हार नहीं मानी. नाम था मस्तान. आज़ाद का भाई.
भाई, जिसने 24 साल हार नहीं मानीमस्तान मजदूरी करता था. ईंट, गारा ढोता. दिन में पसीना बहाता, शाम को वकीलों के चक्कर काटता. एक-एक रुपया जोड़कर हाईकोर्ट में अपील डाली. पूरे 24 साल. न थका, न रुका.
हाईकोर्ट में खुली पुलिस की पोलमामला पहुंचा इलाहाबाद हाईकोर्ट. जस्टिस जेजे मुनीर के सामने सुनवाई हुई. यहीं से कहानी बदली. जज ने पुलिस से सीधे सवाल पूछे.
सबूत कहां है?
गवाह कहां है?
बरामदगी कहां है?
पुलिस के पास जवाब नहीं था. बस एक बयान. कोर्ट ने साफ कहा, सिर्फ बयान के आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता. 19 दिसंबर 2025, इंसाफ मिला… लेकिन अधूरा.
हाईकोर्ट ने आज़ाद को बरी कर दिया. डकैती का केस खत्म. सजा रद्द. लेकिन आज़ाद फिर भी जेल में ही रहा. क्यों? क्योंकि धारा 437A के तहत दो जमानतदार चाहिए थे. 20-20 हजार के. ऊपर से एक पुराना मामला. धारा 307. सजा पूरी हो चुकी थी, लेकिन 7000 रुपये का जुर्माना बाकी था.
24 साल की लड़ाई में परिवार सब कुछ गंवा चुका था. 7000 रुपये भी नहीं थे.
सवाल उठा, सिस्टम हिलामीडिया तक बात पहुंची. सवाल उठे. क्या कोई बेगुनाह आदमी सिर्फ पैसों की कमी से जेल में रहेगा? जेल सुपरिंटेंडेंट अविनाश गौतम ने पहल की. कोर्ट को पत्र भेजा. ईमेल से काम तेज कराया. तभी ‘छोटी सी आशा’ नाम की संस्था सामने आई. पारुल मलिक और रूपाली गुप्ता ने 7000 रुपये जमा कर दिए.
21 जनवरी, जेल के गेट खुलेऔपचारिकताएं पूरी हुईं. मैनपुरी कोर्ट से रिलीज ऑर्डर बरेली जेल पहुंचा. 21 जनवरी की देर रात. 24 साल बाद आज़ाद खान जेल से बाहर आया.
भाई मस्तान सामने खड़ा था. दोनों रो पड़े. कोई शब्द नहीं. बस 24 साल का दर्द और थोड़ी सी राहत.
लेकिन सवाल अब भी जिंदा हैंआज़ाद छूट तो गया, लेकिन सवाल अब भी जस के तस खड़े हैं. उसके 24 साल कौन लौटाएगा, जो जेल की सलाखों के पीछे गुजर गए? मां-बाप का साथ, जो इस इंतज़ार में टूट गया, वो कौन वापस करेगा? जिंदगी के वो सपने, जो कभी पूरे ही नहीं हो पाए, उनका हिसाब कौन देगा?
समाज की नजरों में जो दाग लग गया, उसे कौन मिटाएगा? और अगर भाई मस्तान इस लंबी लड़ाई में हार मान लेता, अगर मीडिया ने सवाल न उठाए होते, अगर ‘छोटी सी आशा’ संस्था आगे न आती, तो क्या आज़ाद आज भी जेल की उसी कोठरी में बंद होता?
ये सिर्फ आज़ाद की कहानी नहींयूपी के ललितपुर के रहने वाले विष्णु तिवारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एक झूठे रेप केस में उन्हें 19 साल 3 महीने जेल में बिताने पड़े. साल 2021 में जाकर अदालत ने उन्हें बेगुनाह माना.
वहीं छत्तीसगढ़ के जागेश्वर प्रसाद पर महज 100 रुपये की रिश्वत लेने का झूठा आरोप लगा. इस एक मामले ने उनकी जिंदगी के 39 साल अदालतों और जेल के बीच छीन लिए. आखिरकार सबूतों के अभाव में उन्हें रिहा किया गया. ये दोनों मामले बताते हैं कि सिस्टम की एक गलती किसी इंसान की पूरी जिंदगी निगल सकती है.
कहते हैं, 100 गुनहगार छूट जाएं, लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए. लेकिन आज़ाद, विष्णु, जागेश्वर बताते हैं कि हमारे सिस्टम में बेगुनाह को सजा मिलना कोई अपवाद नहीं, एक डरावनी हकीकत है.
आज़ाद खान की रिहाई राहत है. लेकिन ये कहानी सिस्टम के मुंह पर जोरदार तमाचा भी है.
क्योंकि जब इंसाफ मिलने में 24 साल लग जाएं, तो सवाल सिर्फ एक आदमी का नहीं होता. सवाल पूरे सिस्टम का होता है.
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