भारत में दो प्रमुख फ़ूड डिलीवरी कम्पनीज़ हैं. Zomato और Swiggy. इन दोनों को एक साथमिलाएंगे, तो एक शब्द बनेगा Zwigato. इसी नाम से 'फ़िराक़' और 'मंटो' बनाने वालीनंदिता दास ने एक फिल्म बनाई है. इसे अप्लॉज एंटरटेनमेंट ने प्रोड्यूस किया है.इसमें Kapil Sharma फूड डिलीवरी बॉय बने हैं. पिक्चर टोरंटो इंटरनेशन फिल्मफेस्टिवल (TIFF) में दिखाई जा चुकी है. इसकी चारों ओर तारीफ़ भी हुई. अब ये थिएटरमें रिलीज हो गई है. देखते हैं तारीफ़ के लायक है या नहीं?कहानी क्या है?झारखंड का रहने वाला मानस सिंह महतो. ओडिशा के भुवनेश्वर में रहता है. पहले घड़ी कीफैक्ट्री में मैनेजर था. पैंडमिक ने नौकरी छीन ली. अब Zwigato नाम की फूड डिलीवरीकंपनी में काम करता है. गगनचुम्बी इमारतों और बसों से लेकर मंदिर तक में फूड डिलीवरकरता है. ऐसी जगहों पर भी जाता है, जहां लिफ्ट में चढ़ना डिलीवरी वालों को अलाउडनहीं है. एक ओर उसके फूड डिलीवरी का और दूसरी ओर जीवन का संघर्ष. परिवार में उसकीपत्नी प्रतिमा है. दो बच्चे हैं और एक बूढ़ी मां. पैसों की किल्लत है. प्रतिमा कामकरना चाहती है. पर मानस का मेल ईगो इसकी इजाज़त नहीं देता. ये तो रही कहानी. अब ज़रापिक्चर की कुछ अच्छी और कम अच्छी बातें जान लेते हैं. पर उससे पहले ये कि, इस फिल्ममें स्पॉइलर जैसा कुछ है नहीं. इसलिए बिल्कुल चिंता न करें कि सबकुछ मैंने ही बतादिया. इतना सब ट्रेलर में ही दिखा दिया है. अब मुद्दे पर आते हैं.# कहते हैं सिनेमा वो अच्छा जिसका सबटेक्स्ट तगड़ा हो. सबटेक्स्ट माने जो दिखाया जारहा है, उसके भीतर आप और क्या देख सकते हैं? 'ज़्विगाटो' के भीतर आप बहुत कुछ देखसकते हैं. जो सामने दिख रहा है, उसके पीछे कुछ और भी प्लस है. रीड बिटवीन द लाइन्सवाला मामला है. फिल्म में डायलॉग कम, दृश्य ज़्यादा बोलते है.# फिल्म अपर-लोअर क्लास के विभेद को दिखाती है. इसमें सोशल जस्टापोजीशन बहुत अच्छाहै. जैसे एक जगह प्रतिमा अपने बच्चों को स्कूल के लिए टिफिन बांधकर देती है. दूसरीओर जिस स्कूल में बच्चे पढ़ते हैं, उसके प्रिंसिपल के घर मानस डिलीवरी करने गया है.वो खाना प्रिंसिपल के बेटे को देता है और वो टिफिन के तौर पर वो खाना अपने स्कूलबैग में रख लेता है. बीच-बीच में मजदूर मंडी दिखती है. आग में झुलसे आदमी पर वीडियोबनाने को आतुर कुछ असंवेदनशील लोग दिखते हैं. और ऐसे ही तमाम सीक्वेंस, जिनका कहानीसे कोई सरोकार नहीं है. पर समाज से ज़रूर है.# कई मौकों पर सोशल कमेंट्री जबरन घुसेड़ी गई मालूम होती है. एक आदमी, जो मानस सेदौड़कर पूछने आता है कि साइकिल से डिलीवरी हो सकती है. यहां थोड़ा चीज़ें बनावटी दिखतीहैं. कपिल गाड़ी चलाए जा रहे हैं, वो आदमी पीछे दौड़े जा रहा है. ऐसे ही एक जगह असलमनाम के आदमी को मंदिर के अंदर जाकर डिलीवरी करने से डर लगता है. उसकी जगह मानसडिलीवरी करने जाता है. लौटकर असलम उससे कहता है, भाई आज तुमने बचा लिया. मानते हैं,डर है, पर ये वाला डर थोड़ा ज़बरदस्ती लगा.# Zwigato सिर्फ एक सोशल ड्रामा नहीं है. ये एक परिवार की भी कहानी है. एक परिवारकैसे कम संसाधनों में निबाह कर रहा है. ये लगभग 70 प्रतिशत भारतीय परिवारों कीकहानी है. पुरुष और स्त्री के संबंधों का भी ये अच्छा रिप्रेजेंटेशन है. एक जगहप्रतिमा को ये पता है कि मानस क्यों परेशान है? पर वो मानस से इस बारे में नहींपूछती. माने कई ट्रैजिक मुगालतों को भी फिल्म छूती है.# आर्ट डिपार्टमेंट ने बहुत अच्छा काम किया है. चटाई, सिलाई मशीन और छोटे-छोटेबर्तन से लेकर सबकुछ अपनी सही जगह पर है. फ्रेम में सबकुछ रियल लगता है. कई बार ऐसीफिल्मों के साथ ये होता है कि धरातल की सच्चाई से प्रोडक्शन डिजाइन मेल नहीं खाता.यहां बिल्कुल ऐसा नहीं है. आपको एक भी चीज़ ऐसी नहीं मिलेगी, जिसके लिए आपको लगे येथोड़ा ज़्यादा हो गया. बहुत अच्छा काम है.# नंदिता दास के डायरेक्शन में एक बात है कि वो हर जगह वोकल नहीं हुई हैं. कुछ कहाहै और बहुत ज़्यादा दर्शकों के लिए छोड़ दिया है. जैसे एक सीन है. जिसमें मानस औरप्रतिमा ट्रेन से तेज़ बाइक दौड़ाने की कोशिश कर रहे हैं. कितना प्यारा सीन है! ज़मीनपर बैठा व्यक्ति आसमान छूने की चाहत रखता है. यही ट्रैजिक मुगालते हैं.# कपिल शर्मा फिल्म में अपनी छवि के विपरीत हैं. हरदम हंसाने वाला आदमी यहां सीरियसहै. कपिल ने मानस के रोल की आत्मा को ढंग से पकड़ा है. उन्होंने आम आदमी कीदुविधाओं, संकोचों और दुख में डूबे ह्यूमर को अच्छा रिप्रेजेंट किया है. पर उनकेबोलने का तरीका कई मौकों पर आर्टीफ़िशियल लगता है. खासकर पहले सीन में, जैसे वो अभीकिरदार का सुर न पकड़ पाए हों. वो ऐक्टिंग बहुत उम्दा करते हैं. एक्स्प्रेशन भी ऐप्टहैं. पर उनका झारखंडी लहजा थोड़ा बनावटी है. कपिल की पत्नी के रोल में हैं शहानागोस्वामी. मैं तो उनका फैन हो गया. इतना कमाल काम. उनकी हंसी में भी एक मध्यवर्गीयस्त्री का संकोच है. जैसे मैंने बचपने में अपनी मां को देखा है. ठीक वैसी ही इसमेंशहाना लगीं. अब इससे ज़्यादा तारीफ़ में क्या ही कह सकता हूं. एक सीन है जहां पड़ोसनरोटी मेकर के बारे में शहाना को बताती है. कैसे इसमें गोला रखो और एकदम परफेट गोलरोटी बनेगी. वहां शहाना जिस मासूमियत से पूछती हैं: "रोटी फूलेगा भी!" वो फिल्म मेंउनकी ऐक्टिंग का पीक पॉइंट है. ऐसे कई पीक पॉइंट आपको फिल्म में मिलेंगे.# मजदूरों की जमात को भी फिल्म रिप्रेजेंट करती है. चूंकि फिल्म का किरदार मानस भीएक मजदूर है. उसकी कहानी के पैरलल फैक्ट्री मजदूरों की कहानी भी चलती है. कैसे कुछमजदूर संघर्ष कर रहे हैं और दूसरों को उनसे मतलब नहीं है. उन्हें अपना घर परिवारपालना है. नंदिता दास के पास समय कम था, इसलिए मुझे लगा वो एक ही फिल्म में सबकुछथोड़ा-थोड़ा दिखा देना चाहती हैं. जो इस फिल्म की सबसे कम अच्छी बात है.नंदिता की तरह ही मेरे पास भी समय और शब्द दोनों कम हैं, इसलिए कम समय में सबकुछ कहदेना चाहता था. थोड़ा कहा और बहुत कुछ बच भी गया. शुक्रिया.