राजस्थान का एक कस्बा है, शिलासपुरा. एक आईएएस हैं, अवनि. जो शिलासपुरा में माइनिंगइसलिए करना चाहती हैं क्योंकि इससे वहां रोज़गार बढ़ेगा, लोगों की जिंदगी मेंखुशहाली आएगी. एक शिलास्थल है. और एक हज़ारों साल पुरानी कहानी, जो कारण है वहां केलोगों की उस शिला में आस्था का. हम बात कर रहे हैं ‘दहन’ की. हॉटस्टार पर 16 सितंबरको रिलीज़ हुई ये नौ एपिसोड की सीरीज़ एक रोलर कोस्टर राईड है. जो विश्वास, आस्था,विज्ञान, विकास और पर्यावरण जैसे मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करती है.कहानी है शिलासपुरा नाम के कस्बे की, जहां दो समुदाय रहते हैं. कारापल्ली औरनिकासिये. इन दोनो को जोड़ती है एक शिला में इनकी आस्था. शिलासपुरा में प्रचलितसदियों पुरानी एक कहानी है. इसके एक किरदार रिढियाकन की गरदन कारापल्लियों ने धड़से अलग कर दी थी. उसके बाद भी रिढियाकन शोर मचाकर अपनी मां को बुलाने की कोशिश कररहा था. इसलिए उसकी गरदन को कारापल्लियों ने एक शिला के नीचे छुपा दिया और उसे शांतरखने के लिए शिला की पूजा करना शुरू किया.आईएएस अवनि, जो इस कहानी को अंधविश्वास मानती हैं, शिलासपुरा में माइनिंग का कामशुरू करना चाहती हैं. जिससे वहां लोगों को रोज़गार मिलेगा और उनकी ज़िंदगी में बदलावआएगा. लेकिन वहां के कुछ प्रमुख लोगों का मनना है कि इससे शिला को नुकसान होगा औरशिलासपुरा के लोगों की जान मुसीबत में पड़ जायेगी.यहीं से शुरू होता है विज्ञान और आस्था के बीच का संघर्ष.इन दोनो के बीच का अंतर ये है कि आस्था को सवालों का सामना नहीं करना पड़ता, लेकिनविज्ञान को हज़ारों सवालों से गुज़रना होता है. अगर विज्ञान सवालों का जवाब नहीं देपाता है, तो जवाब मिलने तक आस्था को ही सही माना जाता है. ठीक उसी तरह जैसे बेनिफिटऑफ डाउट क्रिकेट में बल्लेबाज़ को मिलता है और राजनीति में विपक्ष के कमज़ोर होने परसत्ता पर काबिज़ पार्टी को.लेकिन अगर इसका उल्टा होता है तो? मान लीजिए कि विज्ञान सभी सवालों का जवाब ढूंढलेता है. तब क्या होता है? ऑफिस-ऑफिस के स्टाइल में कहें तो दो बातें होंगी. या तोआस्था सही साबित होगी, या गलत.अगर गलत साबित होती है, तो भी नहीं कह सकते हैं कि आस्था में भरोसा करने वालेविज्ञान में भरोसा करने लगेंगे. लेकिन अगर आस्था विज्ञान की कसौटी पर सही साबितहोती है, तो वो एक ऐसा पल होता है जहां विज्ञान और आस्था एक हो जाते हैं. और ये समझआता है कि हमारे पूर्वजों की लिखी और कही कहानियों में, हो सकता है हमारे लिए कुछसंकेत छुपे हों.दहन देखने के बाद कई सारे निष्कर्षों में से एक निष्कर्ष ये भी निकलता है कि किसीभी कहानी के किरदार और उनके साथ होने वाली घटना आस्था को जन्म देती है और उसमेंछुपे हुए संकेत विज्ञान को.विक्रांत पवार के डायरेक्शन में बनी सीरीज दहन को लिखा है निसर्ग मेहता, शिव बाजपेईऔर निखिल नायर ने. इसमें आपको हॉरर, मिस्ट्री और थ्रिलर सब देखने को मिलेगा. IASअवनि के किरदार में टिस्का चोपड़ा की परफॉरमेंस काबिल–ए-तारीफ़ है. आईएएस के रोल मेंजहाँ वो प्रोफेशनल और कॉंफिडेंट दिखाई देती हैं, वहीं एक माँ के रूप में अपने बेटेके लिए भावुक और संवेदनशील भी हैं. दोनों जगह पर पूरी ईमानदारी से उन्होंने इस कामको अंजाम दिया है. सौरभ शुक्ला की बात करें तो शिला की रक्षा करने वाले पुजारी प्रमुख स्वरुप केकिरदार में अपने हर सीन में उनकी एक्टिंग हमारी उम्मीदों पर खरी उतरती है. उनके लुकसे लेकर डायलॉग डिलीवरी तक सब कुछ हमें मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी है. राजेशतैलंग भी कांस्टेबल परिमल सिंह के किरदार के साथ सीरीज में एक unpredictable factorको शुरू से आखिर तक बना कर रखते हैं.गोलमाल में वसूली का किरदार निभाने वाले मुकेश तिवारी ने भी सर्किल इंस्पेक्टरभैरों सिंह का किरदार बखूबी निभाया है. इन सब के अलावा पंकज शर्मा, रोहन जोशी, लहरखान और सिद्धार्थ भारद्वाज भी इस सीरीज में आपको देखने को मिलेंगे. सबका कामसंतोषजनक है.आईएएस अवनि, प्रमुख स्वरुप और परिमल सिंह के किरदारों की ख़ास बात यह है कि इन सब कीजर्नी में काफी उतार चढ़ाव हैं, जो सीरीज के साथ हमें बांधे रखते हैं. लोकेशन,विजुअल इफेक्ट्स और प्रोडक्शन डिज़ाइन इस सीरीज़ का एक ऐसा हिस्सा है, जिसके सहारेकहानी की कुछ कमियों को कवर अप किया जा सकता है.ये सीरीज़ हमारे सोचने के तरीके को चैलेंज करते हुए वहां तक पहुंचती है, जहां हमेंकिसी एक पक्ष को पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत बताने से पहले कई सारे तथ्यों औरतर्कों से होकर गुज़रना होगा. हालांकि कुछ एपिसोड्स ज़्यादा खिंचे हुए लगते हैं औरकुछ बातें बार-बार दोहराई जाती है. सीरीज़ और बेहतर हो सकती थी. लेकिन अभी भी काफीकुछ ऐसा है, जिसके लिए देख सकते हैं.ये रिव्यू हमारे साथी दीपक कौशिक ने किया है.