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मेमोरीज़ ऑफ अ मशीन: जिसे देखते हुए नर्वस होंगे, शरीर शॉक में चला जाएगा, फिल्म बीच में रोक देंगे

10 मिनट की ये एक मस्ट वॉच फिल्म है. यहां देखें.

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फिल्म के एक दृश्य में सोलो रोल में एक्ट्रेस कनी कुसरुथी.
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गजेंद्र
21 नवंबर 2016 (Updated: 21 नवंबर 2016, 01:19 PM IST)
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सबसे पहले इस फिल्म को देख लीजिए.

https://youtu.be/NyudLUzDSl0 मेमोरीज़ ऑफ अ मशीन को बनाया है बेंगलुरू की रहने वाली शैलजा पडिनडला ने जिन्होंने फाइन आर्ट्स और फिल्ममेकिंग की पढ़ाई की है. उनके मुताबिक उन्होंने एक फीचर फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी जिसके लिए उनके पास बजट नहीं था तो शुरुआती दस मिनट को उन्होंने शूट किया. यही वो शॉर्ट फिल्म हो गई जिसे सोमवार को रिलीज किया गया. पूरी फिल्म सिंगल टेक में शूट की गई है. यानी बीच में कोई कट नहीं है. पूरी फिल्म में सिर्फ एक केंद्रीय पात्र दिखता है, दूसरे की आवाज सुनाई देती है. इसकी कहानी ये है कि एक युवती है जिसे कोई पुरुष सुबह जगाता है और उससे अपने 'पहले अनुभव' के बारे में पूछता है. फिर वो अपना पहला सेक्सुअल एक्सपीरियंस सुनाने लगती है. कि कैसे जब वो करीब 9 साल की थी और स्कूल का पीयन/चपरासी उसे बहुत आकर्षक लगता था. एक बार उसने उसे जांघों पर बैठाया. युवती बेचैनी, खुशी के साथ बता रही होती है कि उसे अपने नीचे किसी मोटी चीज का अनुभव हुआ. मांस या हड्‌डी का कोई टुकड़ा. फिर पीयन ने उसे वहां छुआ जहां से वो 'पी' करती है. फिर वो गीली हो गई. इस तरह से फिल्म आगे चलती है और साढ़े नौ मिनट में खत्म होती है. इसे देखते हुए आपके अंदर घबराहट सबसे ज्यादा होती है. दो बड़ी वजह हैं. एक तो हमारे यहां ऐसे कंटेंट की मौजूदगी नहीं है. दूसरा, बहस और संदेश के लिहाज से ये फिल्म जजमेंटल नहीं है. दूसरी बात पर ज्यादा बात होगी. लेखिका-निर्देशिका शैलजा ने इस वर्जित से विषय में जो बातें रखी हैं इससे बहुत से लोग शॉक हो जाएंगे, इसे अश्लील कहेंगे और न जाने कैसे-कैसे अपनी बदहवासी निकालेंगे कि ऐसी फिल्म अस्तित्व में कैसे आई. खास ये कि आपत्ति करने वालों में आलोचक और नैतिकतावादी भी हो सकते हैं. शिक्षाविद् और एक्टिविस्ट लोग भी इस फिल्म की निंदा कर सकते हैं. यहीं पर ये फिल्म जरूरी हो जाती है. कैसे? जैसे शुरू में किरदार अपनी कहानी सुना रही होती है कि जब वो बच्ची होती है स्कूल का पीयन उसके साथ यौन क्रियाएं करता है. ऐसा करना paedophilia यानी बच्चों के यौन शोषण की श्रेणी में आता है जो दुनिया में आज के टाइम शायद सबसे घृणित अपराध माना जाता है. दिक्कत कुछ को ये होगी कि अपने 'बाल यौन शोषण' की बात बताते हुए वो युवती खुश है. जबकि राजनीतिक और नैतिक रूप से फिल्मों में ऐसा पसंद नहीं किया जाता है. लेकिन व्यक्तिगत अनुभव के तौर पर वो लड़की ऐसा कह सकती है और उसे पसंद भी कर सकते हैं. इसके बाद फिल्म में उसका पार्टनर उसे पूछता भी है कि उसके साथ जो हुआ उस पर वो गुस्सा नहीं थी, उसे बुरा नहीं लगा, ये पीडोफीलिया था? तो वो युवती भीतर ऐसे किसी भाव से इनकार कर देती है. उल्टे वह कहती है कि अब तो वो पीयन पचास साल का हो गया होगा और वो कभी उसे मिले तो न जाने क्या करेगी? वो फिर हंसने लगती है, शर्माने लगती है. यहां पर फेमिनिस्ट, बाल यौन शोषण कार्यकर्ता, कानूनविद् बौखला जाएंगे. लेकिन ये आर्ट का दायरा है. यहां निजी अहसास और सोच को पूरी आजादी होती है और होगी. अगर डायरेक्टर शैलजा अपने किरदार की सोच बिलकुल आजाद और केयरफ्री रखना चाहती हैं तो उन्हें पूरी आज़ादी है. वे सही भी हैं. इसी का अन्य पहलू ये है कि वे इस आपत्तिजनक स्थिति को सामने रखकर किसी पर थोप नहीं रहीं. बल्कि एक डिबेट शुरू कर रही हैं जो हमने क्लोज़ कर दी है. जबकि कुछ भी क्लोज़ कभी नहीं होता है. अब तक यही होता आया है कि नानी की कहानियों में, सालाना रावण दहन में, हत्यारों के मामलों में और पॉपुलर फिल्मों में तुरंत ही एक सही और एक गलत मान लिया जाता है. आर्ट हमें यहीं पर इंसान और उच्चर जीवों में तब्दील करने की कोशिश करता है. आर्ट के सामने कोई सही-गलत नहीं. वहां सिर्फ बात सहज रूप से सामने रख दी जाती है. उसे शांति से हम देखें और प्रोसेस करें. इस अनुभव को सुनाने के बाद फिल्म में वो युवती हस्तमैथुन यानी मास्टरबेशन पर बात करती है. एक और विषय जिस पर बात करना शर्मिंदगी से जोड़कर देखा जाता है. फिल्म इस झिझक में नहीं पड़ती. जो इस झिझक में हैं, खासकर एक लड़की के हस्तमैथुन को अहसास को कैमरे पर सुनते हुए, वो बेचैन होते हैं. वो कहती है कि जब पहली बार उसे आर्गेज़म हुआ तो उसे लगा कि उसने मानव शरीर का ऐसा अहसास खोज लिया है जो सिर्फ उसके पास है. एक बार वो अपने आपको शारीरिक रूप से खुश कर रही होती है और उसके माता-पिता घर आ जाते हैं. ये बताते हुए भी फिल्म की नायिका खुशी और उत्साह से भरी शर्म के साथ बात करती है. कहती है, उसके बाद माता-पिता ने उसके लिए लड़का देखना शुरू कर दिया. उसे लगा उसका खेल वहीं खत्म हो जाएगा और उसे साड़ी पहना, चाय-बिस्किट की ट्रे पकड़ा लड़कों के सामने खड़ा किया जाएगा. इसे सुनते हुए दिमाग में दो तस्वीरें बनने लगती है. पहली में लड़कियों की वो छवि जिसमें वे घरेलू हैं. इंडियन कपड़े पहनकर चाय सर्व करने वाली, खाना सर्व करने वाली. उनसे शर्म चाही जाती है. वे वर्जित विषयों के इर्द-गिर्द भी न मिलें. वहीं दूसरी तस्वीर इस युवती की जो सब लड़कियों के निजी जीवन और विचारों की प्रतिनिधि है जहां वो तमाम वर्जित विषयों पर बेहद सामान्य तरीके से बात करती हैं. यानी उनका ये जीवन भी होता है जिसे बेडरूम की दीवारों में कैद रखा जाता है. जबकि इसके प्रति भी सहज हुआ जा सकता है. कैमरा पकड़े उसका पार्टनर पूछता है कि क्या उसके बॉयफ्रेंड नहीं रहे तो वो कहती है कि जब वो 10वीं क्लास में थी तब उसका बॉयफ्रेंड था जिससे चार महीने में ब्रेकअप हो गया. हुआ ये कि एक बार उन्होंने kiss किया तो वो wet हो गई और उसने बॉयफ्रेंड से कहा कि उसे वो नीचे वहां स्पर्श करे तो वो शॉक हो गया. उसने लड़की को बेशर्म कहा और थप्पड़ मारा. वो बोली, मैंने उस पर पत्थर फेंका और लौट गई. उसने कहा वो उसका आखिरी बॉयफ्रेंड था, उसके बाद उसे उसकी जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि उसके पास उसका आविष्कार यानी हस्तमैथुन था.

इस किस्से के बाद कैमरा के पीछे मौजूदा उसका जीवनसाथी पूछता है, 'क्या एक दिन तुम्हे मेरी भी जरूरत नहीं होगी?' तो वो कहती है, 'तुम कभी भी मुझे बेइज्जत नहीं करते. इसीलिए मैं तुम्हे बहुत पसंद करती हूं. तुम्हे मेरे दोस्त हो. हो न?'

ऐसे कई पहलू हैं जो आप फिल्म में देख सकते हैं.
फिल्म में अभिनय कनी कुसरुथी का है जो केरल से हैं और मुंबई में रहती हैं.
राइटर-डायरेक्टर शैलजा का प्रश्नोत्तर सेशन भी यहां देख सकते हैं जो पिछले हफ्ते फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद किया गया था. आपके कई सवालों के जवाब इसमें मिल सकते हैं. https://www.youtube.com/watch?v=GekKg2Xf74k

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