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लाल इमली, टिनोपाल, वॉकमैन, कहां गए ये सब?

माफ करना! इरादा इमोशनल करने का कतई नहीं था. न जाने क्या क्या खो गया. लल्लन आपको अइसी चीज दिखाएगा कि आंसू निकल पड़ेंगे.

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फोटो - thelallantop
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आशुतोष चचा
9 मार्च 2016 (अपडेटेड: 9 मार्च 2016, 05:36 AM IST)
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1. अफगान स्नोः

ये न पूछना किस बला का नाम है. कसम है अगर किसी ने तुमको इसके बारे में बताया न हो. जब बोरो पिलस और फेयर एंड लभली सात दिनों में गारंटीड गोरापन देने के लिए धरा पर अवतरित नहीं हुई थीं. तब अफगान स्नो ने नारी का हुश्न संवारा था. नेचुरल ब्यूटी के नाम पर. भई हम देखे नहीं हैं साफ बात. लेकिन सुने हैं. कि उसमें पाउडर और क्रीम एक में घेप कर पोता जाता था. अब तो इत्ती वैराइटी हैं और उनके इत्ते वादे हैं कि आप एक एक ब्रांड आजमाओ तो दुइ जनम पार हो जाएं.
Afgan




2. टिनोपालः

ये होता था एक पाउडर. कपड़े धोने के लिए. सफेद कपड़ों में व्हाइट हाउस जैसी सफेदी लाने के लिए. नील के साथ इस्तेमाल किया जाता था शायद. इत्ता फेमस ब्रांड था कि व्हाइट हो तो टिनोपाल. इसका नाम बहुत चल गया तो पता नहीं क्यों बदल कर रानीपाल कर दिया था.
Tinopal-Powder




 

3. केश निखारः

नाम से ही जाहिर है बालों की क्वालिटी लल्लनटॉप करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन मितरों, ये शैंपू नहीं साबुन था. येब्बड़ी सी बट्टी काली काली. लोहे जैसा तो रंग था उसका. इसके निखारे केश या तो आज इतिहास बन चुके हैं या खिचड़ी या फिर टोटल सफेद हो चुके हैं. अरे भैया उमर भी तो हो गई है.
keshnikhar-soap




 

4. 555 ताश के पत्तेः

ताश का खेल कोई खेल नहीं एक संस्कृति है. परंपरा है. इसे खेलने में किसी सीमा या बंधन का उल्लेख इतिहास में नहीं मिलता. लेकिन इस नंबर का मिलता है. 555. ये नंबर उन ताश के खिलंदड़ों पर ऐसा छपा है कि दिमाग की हार्डडिस्क डीप फॉर्मैट कर दो. 555 ताश के पत्ते न मिट पाएंगे.
555 card




5. चारमीनारः
सिगरेट थी भाईसाब. जैकी श्राफ इसका ऐड करते थे. हीरो थे भाई उस जमाने के. इसे बनाती थी वजीर सुल्तान टुबैको कंपनी. बड़े वाले शौकीनों के बस की बात थी इसे इस्तेमाल करना.
charminar cigarette




6. बजाज सन्नीः
सचिन तेंदुलकर इस स्कूटर का ऐड करते थे. उनका फेम आसमान पर छाया हुआ था उस वक्त. ये 60 CC का स्कूटर 50 किलोमीटर प्रति घंटे की मैक्सिमम रफ्तार से दौड़ता था. 120 किलो से ज्यादा वजन ले जाना ठीक नहीं था इस पर. तब स्कूटी नाम का शब्द नहीं आया था नहीं तो यही कहते. तब इससे फर्राटे भरने वाली लड़कियां आज ऑन्टी जी हैं. सन 1997 में इस स्कूटर का प्रोडक्शन बंद हो गया.
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7. बिगफनः
किसी के सामने बहुत चपड़ चपड़ बतियाओ तो वो क्या कहता है. नहीं नहीं कंटाप मारने से पहले. यही कि सेंटरफ्रेश खाओ. ई जबान पर लगाम लगाती है. च्युइंग गम का ये यूज बहुत बाद में शुरू हुआ. पहले तो खाली मुंह में भर कर फुलाया जाता था. जिसने सबसे पहले बचुवा लोगन का मन मोहा वो था बिगफन. गुजरे जमाने का बबलगम.
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8. लाल इमलीः
ये शॉल होती थी भाईसाब. यूपी वाले अच्छे से जानते हैं. कानपुर की एक पहचान लाल इमली भी है. वहां की रिश्तेदारियों में बड़ा लालच होता था जब तक लाल इमली की मिल चलती थी. ये फैक्ट्री जिस जगह पर थी वहीं एक इमली का पेड़ था. बड़ा हक्कान पेड़, जिसमें लाल रंग की बेहतरीन इमली फलती थी. ललचहे लोग पहुंचते थे कि चाचा गिरते गिरते एक लाल इमली की शॉल दे देंगे. बस जिंदगी सफल है उत्ते में.
Source: Ebay

Source: Ebay



9. क्लिक 3 कैमरा:
70s के दशक में चला ये कैमरा लक्जरी था भाईसाब. रेडियो, टेप रख ले आदमी वही बहुत था. कैमरा रखना तो बस रईसों के बस का था. जर्मनी की कंपनी ऐग्फा ये नयनसुख वाली चीज बनाती थी. इसके बारे में बहुत ज्यादा नहीं पता है. अपने पापा से पूछ लो. आज के कैमरों की तुलना उससे नहीं हो सकती. अब तो 300 रुपए के चाइनीज फोन में भी 2-4 मेगापिक्सल कैमरा मिल जाता है.
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10. वॉकमैनः
कनौती समझते हो? कनखोंसना. कान में घुसे हुए लाल, नीले, पीले रंग के इयरफोन. जो आज हर कूल डूड की पहचान हैं. जब इनका अस्तित्व नहीं था तब भी हेडफोन होते थे. बहुत ही बकवास टाइप के. आवाज भी बहुत खास नहीं थी. लेकिन तब जो लौंडा एक दिन ये वॉकमैन लेकर स्कूल चला जाए, वो स्कूल का इल्तुतमिश हो जाता था. सोनी ने सबसे पहले निकाला. जो बाद में सोनी एरिक्सन के मोबाइल तक चला. लेकिन वॉकमैन का नाम था जो रह गया.
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11. कैम्पा कोलाः
ये उस जमाने में यहां लोग सर उठा के पीते थे जब तक कोका कोला और पेप्सी की घुसपैठ यहां नहीं हुई थी. कैम्पा कोला प्योर ड्रिंक्स का आइटम था. और ये कंपनी भाईसाब.... सॉफ्ट ड्रिंक्स की मम्मी है इंडिया में. फिर 1991 में पीवी नरसिंहाराव की सरकार ने विदेशी कंपनियों को छूट दे दी. कि आओ इंडिया में कारोबार करो. कैम्पा का खेल खतम. 2000-01 में इसके दिल्ली में बॉटलिंग प्लांट और ऑफिस बंद हो गए.
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12. एनासिनः
सिरदर्द की टिकिया. बज्जर देहाती मघैयों के सिर में भी दर्द होता था तो कहते थे. "खोपड़ी फटी जात है एनासीन लिए आव". तो भैया अइसी पुन्य प्रताप था एनासिन का. और सुनो. चली तो ये बहुत साल लेकिन आई थी सन 1916 में. विलियम मिल्टन नाइट ने खोजा था इस दवाई को. जिसमें होता है एस्पिरिन और कैफीन. चाहे जित्ती लड़ाई हो पड़ोसी से. सिरदर्द हो जाए तो एक गोली खाओ बस काम टनाटन.
Anacin




 

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