एक फिल्म आ रही है, अलिफ़. 3 फ़रवरी 2017 को रिलीज़ होगी. इससे पहले कि हम इसके ट्रेलरकी खूबियों पर बात करें, आइये ज़रा यादें ताज़ा कर लें. पाकिस्तान में एक फिल्म बनीथी 'खुदा के लिए'. इस्लाम में संगीत की पाबंदी, पहनावे की ड्रामेबाज़ी पर खुल करओपिनियन देती थी ये फिल्म. एक मुस्लिम युवा के खुलेपन से कट्टरता की तरफ के उल्टेसफ़र को बेहद खूबसूरती से पेश किया था इस फिल्म ने. पाकिस्तानी सिनेमा की तरफ से आयामास्टरपीस था ये. खुदा के लिए बनाने वाले शोएब मंसूर ने ही फिर एक और फिल्म दी,‘बोल’. बोल तो और भी ज़्यादा मुखर थी. लड़कियों की इस्लाम में स्थिति और फॅमिलीप्लैनिंग के प्रति मुसलमानों की उदासीनता पर कड़ा प्रहार करती थी. आज भी इस फिल्म कावो डायलॉग कानों में गूंजता रहता है. “अगर पाल नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो?”जिस इस्लाम में अपनी मज़हब की बनी-बनाई लकीर से हटने की मनाही है, वहां संवेदनशीलमुद्दों पर फिल्म बनाना हौसले का काम था. और वो भी कहां! पाकिस्तान में! जहां मज़हबीकट्टरता अक्सर अपने चरम पर रहती है. जहां मज़हब के खिलाफ़ कोई भी टिप्पणी आपकी जान काग्राहक बन सकती है. फिर भी पाकिस्तान से ऐसी फ़िल्में आई. इस मामले में भारत थोड़ाकंगाल नज़र आता है. यहां अभिव्यक्ति की आज़ादी भरपूर मात्रा में उपलब्ध होने के बादभी ऐसी फिल्म मुश्किल से ही नज़र आती है जो इस्लाम में शामिल कुरीतियों पर खुल केबोले. पीके जैसी फिल्म में भी इसका महज़ एक पहलू छू कर छोड़ दिया गया. लगता है ये कमीअब पूरी होने जा रही है. इस्लामी दीनी तालीम के साथ-साथ दुनियावी तालीम की भीअहमियत समझाती ये फिल्म रिलीज़ होने को है. 'अलिफ़' का ट्रेलर तो धांसू लग ही रहाहै, जो मैसेज इससे निकल कर आ रहा है वो अनमोल है. हर भारतीय मुसलमान को इस फिल्म केटिकट्स एडवांस में बुक कर लेने चाहिए. ‘अलिफ़’ एक पिता की अपने बेटे को डॉक्टर बनानेकी महत्वाकांक्षा की जद्दोजहद की कहानी है. अपने बेटे को उंची तालीम देने के लिएप्रतिबद्ध इस पिता की लड़ाई मज़हबी पागलपन से है, मुस्लिम समाज की संकुचित मनोवृत्तिसे है, उस कट्टरता से है जो इस्लाम की बुनियादी शिक्षा ‘तालीम ही सर्वोपरि है’ कोनकारती आई है. बनारस के मुस्लिम मोहल्ले में रहने वाले हकीम रज़ा अपने बेटे अली कोकिसी अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं लेकिन कुछ तो अपने समुदाय की सनक और कुछहिंदू कम्युनिटी का निरर्थक डर उन्हें रोकता है. ऐसे हालात में उनकी बहन ज़हरापाकिस्तान से भारत आती है. ज़हरा ज़ोर देकर कहती है कि अली की तालीम बेहद ज़रूरी है.बेटे को अच्छे स्कूल में दाख़िल करवाने के रज़ा के फैसले से मुस्लिम समुदाय, मदरसोंके कर्ता-धर्ता और रज़ा में तनाव पैदा हो जाता है. फिल्म में एक मदरसा शिक्षक जमालका किरदार भी है जिसका दावा है कि उसे अल्लाह से मुहब्बत है. मज़हब से बगावत परउतारू रज़ा और उनके बेटे अली का मुल्लाशाही जीना हराम कर देती है. ज़हरा को जान सेमारने की धमकियां जारी करती है. कैसे हकीम रज़ा इन चुनौतियों से पार पाते हैं यहीकहानी है ‘अलिफ़’ की. मदरसों की शिक्षाओं का स्तर कितना चिंताजनक है ये किसी से छुपानहीं है. ऐसा नहीं है कि मदरसों में गणित, विज्ञान वगैरह नहीं पढ़ाया जाता. लेकिनमेन फोकस धार्मिक शिक्षा को घोट के पिलाना ही होता है. ऐसे में बच्चों का पिछड़ जानालाज़मी है. जो मुस्लिम मां-बाप अपने बच्चों को ज़माने की रफ़्तार के साथ चलता देखनाचाहते हैं वो मदरसों के भरोसे बैठे नहीं रह सकते. यहीं से मज़हब और व्यक्ति मेंसंघर्ष की नींव पड़ती है. ‘अलिफ़’ इस बेहद ज़रूरी मसले को पूरी संवेदनशीलता से छूतीनज़र आ रही है. ‘अलिफ़’ के निर्देशक ज़ैग़म इमाम की ये दूसरी फिल्म है. इससे पहले वो‘दोज़ख-इन सर्च ऑफ़ हेवन’ नाम से एक खूबसूरत फिल्म बना चुके हैं जिसकी बेहद तारीफ़ हुईथी. उनकी दूसरी फिल्म में कास्टिंग से लेकर लोकेशंस तक सब कुछ परफेक्ट नज़र आ रहाहै. लंबे समय बाद नीलिमा अज़ीम को एक सशक्त किरदार में देखना दिलचस्प रहेगा. ट्रेलरमें तो वो छा गई है. डायलॉग राइटर की स्पेशल तारीफ़ बनती है. कुछेक मुलाहिज़ा फरमाइए * ‘सिर्फ कुरआन रटने से इल्म थोड़े ही ना आ जाता है रज़ा, तुम हमारे अली को एक अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवा दो.’ * ‘इल्म हासिल करना तो हमारा बुनियादी हक़ है.’ * 'एक आखिरी मौक़ा मुसलमान समझ के नहीं, मदरसे वाला समझ के नहीं, बच्चा समझ के दे दीजिये.’ * ‘सवाल हमारी ज़िंदगी का नहीं है, सवाल आनेवाली नस्लों का है.’और सबसे कीमती, * ‘तुम तो एक मामूली हाफ़िज़ निकले मियां, जिसने कुरआन घोल कर पी तो लिया पर उसके मायने नहीं समझ सका.’ये फिल्म इस्लाम की सबसे बड़ी और फौरी ज़रूरत तालीम को बोल्ड लेटर्स में अंडरलाइनकरती है. पैगम्बर मुहम्मद साहब का कहना था कि अगर तालीम के लिए चीन भी जाना पड़े तोजाओ. शिक्षा की अहमियत पर जोर देने वाला इस्लाम कब कठमुल्लाओं की जकड़न में आ गयापता ही नहीं चला. आख़िरत के लिए जीने का दावा करने वाली मुल्लाशाही तालीम के नाम परसिर्फ मज़हबी किताबें रटवाना चाहती है. ऐसे में प्रगतीशील विचारों वाले लोगों का येफ़र्ज़ बन जाता है कि मुस्लिम समाज को इनके चंगुल से छुडाने के लिए कोशिशें तेज़ करें.ये फिल्म ऐसी ही एक ईमानदार कोशिश का नतीजा नज़र आ रही है. हालांकि ट्रेलर देख करकिसी फिल्म को अच्छी मान लेना तर्कसंगत नहीं होगा, लेकिन इस फिल्म को महज़ इसलिएदेखा जाना चाहिए कि इसने एक बेहद ज़रूरी सब्जेक्ट पर बात की है. ऐसी फिल्मों का ख़ूबप्रचार-प्रसार होना चाहिए. ऐसी फ़िल्में गुमनामी के अंधेरे में नहीं खोनी चाहिए.हौसला बढ़ाइए इन फिल्म मेकर्स का ताकि वो और ज़्यादा जोशोखरोश के साथ ऐसे नगीनों कोलेकर लौट सकें. ‘अलिफ़’ फिल्म का अन-नोटिस्ड चले जाना बहुत बड़ा अन्याय होगा. ट्रेलरदेखेंः https://www.youtube.com/watch?v=vo1uC2pCPa8--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़िएःभारत का मुसलमान क्यों दुनिया के मुसलमानों से ज्यादा समझदार है!मजहब को अपने घर तक रखो, बाहर निकला तो इंसानियत के होंठ सी देगा