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  • The Story of Sheema Kermani: Why Was the Bharatanatyam Dancer, Who Defied Pakistan Dictator, Taken Away by Police?

'पसूरी' फेम जिस भरतनाट्यम डांसर को पाकिस्तानी तानाशाह भी नहीं रोक पाया, उन्हें पुलिस क्यों ले गई?

शीमा करमानी को अली सेठी के गाने 'पसूरी' में देखा गया था. मगर पाकिस्तानी पुलिस ने उन्हें अरेस्ट क्यों किया?

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14 मई 2026 (अपडेटेड: 14 मई 2026, 08:22 PM IST)
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सीमा करमानी अली सेठी के वायरल गाने 'पसूरी' में नज़र आ चुकी हैं.
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तख्तापलट कर चुके मुहम्मद ज़िया-उल-हक ने पाकिस्तान में मार्शल लॉ का ऐलान कर दिया था. रातों-रात वहां की आर्मी ने सख्त इस्लामिक कानून लागू कर दिए. नाचने-गाने जैसी कला को हराम बताकर पूरी तरह रोक लगा दिया गया. हजारों कलाकार अपना काम-धंधा छोड़कर घर में बैठ गए. ऐसे माहौल में भी एक 26-27 साल की लड़की लगातार थिरक रही थी. बदन पर साड़ी. बाल में गजरा. मुख पर साज-शृंगार किए. भरतनाट्यम करते हुए उसके घुंघरू तानाशाह ज़िया-उल-हक के शासन की खिल्ली उड़ा रहे थे. उस दौर में वो एकमात्र ऐसी डांसर थी, जिसने बंदूक की नोक देखने के बावजूद अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा. वो 26 साल की लड़की आज 75 की हो गई है. डांस करके उन्होंने पाकिस्तानी महिलाओं के हक़ में जितना काम किया, उतना शायद वहां की हुकूमत भी न कर सकी. फर्क सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान का सबसे क्रूर तानाशाह भी जिसका बाल-बांका नहीं कर सका, उसे पिछले दिनों पाकिस्तान की पुलिस घसीटती हुई ले गई. क्योंकि वो पाकिस्तानी महिलाओं के अधिकारों और उनके हक़ के लिए आवाज़ उठा रही थीं.

हम बात कर रहे हैं वेटरन पाकिस्तानी क्लासिकल डांसर, एक्टर और सोशल एक्टिविस्ट शीमा करमानी की. पाकिस्तान में भरतनाट्यम डांस फॉर्म का जाना-माना नाम हैं. आपमें से बहुतों ने उन्हें पाकिस्तानी सिंगर अली सेठी के वायरल गाने 'पसूरी' में देखा होगा. उसमें साड़ी पहने भरतनाट्यम करती, जो महिला आपको नज़र आ रही हैं, जो शीमा करमानी ही हैं. वो पाकिस्तानी की सबसे चर्चित कलाकारों में से एक हैं. अपनी संस्था 'तहरीक-ए-निस्वां' के जरिए वो दशकों से महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं. रोचक बात ये है कि उन्होंने इस संस्था की स्थापना 1979 में की थी. यानी उसी दौर में, जब ज़िया-उल-हक की तानाशाही अपने चरम पर थी. बंदूकों से लड़ने के लिए उन्होंने डांस और अभिनय को अपना हथियार बनाया.

खैर, पिछले दिनों इंटरनेट पर अचानक उनका एक वीडियो वायरल हुआ. उसमें पुलिस उन्हें अरेस्ट करके ले जा रही थी. महिला कॉन्सटेबल्स उन्हें गाड़ी में बिठाने के लिए लगातार धक्का-मुक्की कर रही थीं. उनसे बचने के लिए शीमा ने भी गुस्से में खूब हाथ-पांव चलाए. तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस उन्हें अपने साथ ले जाने में सफल हो गई.

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‘पसूरी’ गाने में शीमा करमानी.

मगर ये सब हुआ क्यों? आखिर शीमा ने ऐसा क्या किया कि उन्हें अरेस्ट करने की नौबत आ गई? जवाब है- हक़. दरअसल, कुछ दिनों बाद वो कराची में 'औरत मार्च' करने वाली हैं. लेकिन प्रशासन ने उन्हें ऐसा करने की इजाज़त नहीं दी. इसके विरोध में उन्होंने कराची प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलवाई थी. हालांकि इससे पहले कि वो वहां कुछ करतीं, पुलिस उन्हें अपने साथ ले गई.

इस घटना का वीडियो इंटरनेट पर आग की तरह फैल गया है. जिसके बाद पाकिस्तान और भारत समेत दुनियाभर के लोगों ने सिंध सरकार की खूब आलोचना की. खासकर इस बात के लिए कि वहां पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) की सरकार है. PPP वही पार्टी है, जिसकी तरफ़ से बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी थीं. लोगों ने कहा कि जब बेनज़ीर की ही पार्टी एक महिला के साथ ऐसी बदसलूकी कर रही, तो बाकियों से क्या ही उम्मीद रखी जाए!

जो भी हो, उन्हें सोशल मीडिया की ताकत का अंदाज़ा नहीं था. हल्ला मचा तो सिंध सरकार प्रेशर में आ गई. उन्होंने फौरन तीन पुलिस ऑफिसर्स को सस्पेंड कर दिया. साथ ही शीमा को रिहा कर दिया. सरकार का कहना है कि उन्हें इस घटना की जानकारी नहीं थी. इतना ही नहीं, उन्होंने शीमा से इसके लिए माफ़ी भी मांगी. लेकिन लोग उनकी इस सफाई से संतुष्ट नहीं हुए. पाकिस्तानी जनता का कहना है कि अगर सरकार को इस घटना के बारे में पता नहीं था, तो पुलिस ने इतनी सख्ती किसके आदेश पर की? इतनी नामचीन हस्ती का सरेआम यूं घसीटा जाना नॉर्मल तो नहीं. लोगों का आरोप है कि या तो सरकार इस बारे में झूठ बोल रही या फिर उनका सिस्टम पर कंट्रोल नहीं है. दोनों ही केस में लोग इस बात से सहमत दिख रहे कि शीमा करमानी का इस तरह अरेस्ट किया जाना गलत है. वो भी तब, जब वो सिर्फ एक महिलाओं के हक़ में प्रोटेस्ट कर रही थीं.

वैसे, 1951 के रावलपिंडी में जन्मी शीमा का परिवार भारत से था. उनके पिता लखनऊ और मां हैदराबाद की थीं. चूंकि उनके पूर्वज ईरान के करमान से आए थे, इसलिए उन्हें करनामी सरनेम मिला. बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया, जहां उनके पिता पाकिस्तानी सेना में ब्रिगेडियर बने. बाद में उन्होंने कराची इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉर्पोरेशन में बतौर चेयरमैन भी काम किया. शीमा के पति खालिद अहमद एक चर्चित पाकिस्तानी टीवी एक्टर और डायरेक्टर हैं. उनका एक भांजा भारत में बड़ा फिल्ममेकर है. जानते हैं ये भांजा कौन है? इम्तियाज़ अली. वही इम्तियाज़ अली, जिन्होंने 'रॉकस्टार', 'जब वी मेट' और 'लव आज कल' जैसी फिल्में बनाई हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो जिन शीमा करमानी की हम बात कर रहे, वो इम्तियाज़ अली की मामी हैं.

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घनश्याम और नीलिमा.

शीमा लंबे समय से एक्टिंग करती रही हैं. साथ ही वेस्टर्न म्यूजिक पर भी उनका काम सधा हुआ है. हिस्ट्री में एम.फिल हैं और अभी पीएचडी कर रहीं. फिर भी उन्होंने पाकिस्तान में रहते हुए भरतनाट्यम को क्यों चुना, इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है. दरअसल, पार्टिशन के बाद कोलकाता के एक बड़े बिजनेसमैन जॉर्ज मलिक, पाकिस्तान में 'फ़नकार' नाम की मूवी बनाना चाहते थे. उसमें डांस कोरियोग्राफी करने के लिए उन्होंने अपने दोस्त घनश्याम और उनकी पत्नी नीलिमा को कराची इन्वाइट किया. दोनों भरतनाट्यम के एक्सपर्ट थे. 1952 में दोनों कराची पहुंचे. मगर 'फ़नकार' कभी बन नहीं सकी. लेकिन इस बहाने हुसैन शहीद सोहरावर्दी ने उनका काम देख लिया. ये वही सोहरावर्दी हैं, जो 1956 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे. जब उन्होंने घनश्याम का डांस देखा इंप्रेस हो गए. इतने कि उन्होंने उनसे पाकिस्तान में ही रुकने और कराची में एक डांस स्कूल शुरू करने की रिक्वेस्ट कर डाली.

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अपने गुरु घनश्याम के साथ शीमा करवानी.

ये पाकिस्तान में क्लासिकल डांस की नई शुरुआत थी. घनश्याम ने कराची में जो स्कूल खोला, उसमें कथक, भरतनाट्यम और दूसरे क्लासिकल डांस फॉर्म सिखाए जाते थे. शीमा भी उसी स्कूल की देन हैं. वो 13 साल की थीं, जब उन्होंने घनश्याम से डांस सीखना शुरू किया. समय के साथ वो इसमें बतौर स्टाफ काम करने लगीं. लेकिन 1977 के बाद सब कुछ बदल गया. जनरल ज़िया-उल-हक़ ने सत्ता संभाली और मार्शल लॉ के दौर में इस स्कूल की फंडिंग बंद कर दी गई. इतना ही नहीं, स्कूल को एंटी-मुस्लिम बताकर वहां के टीचर्स और उनके परिवार को जान से मारने की धमकियां तक दी गईं.

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स्टेज शो में परफ़ॉर्म करती शीमा करमानी.

समय के साथ माहौल बिगड़ता जा रहा था. तंग आकर घनश्याम ने पाकिस्तान छोड़ने का फैसला किया. मगर वो चाहते थे कि उनकी गैर-मौजूदगी में भी ये स्कूल चलता रहे. उस समय शीमा लंदन में फाइन आर्ट्स की पढ़ाई कर रही थीं. घनश्याम उन्हें अपनी बेटी जैसा मानते थे. मजबूरी में उन्होंने शीमा को बुलावा भेजा. लेकिन वो जब तक कराची लौटीं, तब तक वहां क्लासिकल डांस खत्म हो चुका था. कई कलाकार देश छोड़कर जा चुके थे. कई डरकर घरों में छिप गए थे. लेकिन शीमा हार नहीं मानीं. उन्होंने बड़े-बड़े स्टेज शो करने शुरू किए. उनकी साड़ियां, उनका डांस और उनका कॉन्फिडेंस उस दौर में राजनीतिक विरोध का प्रतीक बन गया. सरकार ने उन्हें रोकने की तमाम कोशिशें की. उनके स्कूल को बम से उड़ाने की धमकी भी मिली. मगर शीमा नहीं रुकीं. न तब, जब ज़िया-उल-हक ने उन पर दबाव बनाया था. न अब, जब पाकिस्तान पुलिस उन्हें सरेआम अरेस्ट करके ले गई…

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