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पंजाब के आखिरी महाराजा दिलीप सिंह, जो जिए सिख की तरह लेकिन मरे अंग्रेज की तरह

वो राजा, जो प्राइवेट में अंग्रेजों की तरह रहता था, लेकिन लोगों के बीच खुद को भारतीय दिखाता था. आज इनका जन्मदिन है.

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6 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 21 अक्तूबर 2017, 02:45 PM IST)
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बेहद कम उम्र में मां से अलग करके इंग्लैंड भेजे गए पंजाब के आखिरी महाराज दिलीप सिंह के जीवन पर आधारित फिल्म 'दि ब्लैक प्रिंस' 21 जुलाई 2017 में रिलीज हुई. जब ये फिल्म इंग्लैंड के बर्मिंघम में दिखाई गई, तो ढेर सारे अंग्रेजों के मुंह खुले रह गए. क्योंकि बहुतों को महाराज दिलीप सिंह और क्वीन विक्टोरिया की ये कहानी नहीं मालूम थी. महाराजा दिलीप सिंह लाहौर में 6 सितंबर 1838 के दिन पैदा हुए थे.

पंजाबी सिंगर सतिंदर सरताज ने इस फिल्म में महाराज दिलीप सिंह की भूमिका निभाई है, जानिए दिलीप सिंह की लाइफ के कुछ फैक्ट्स:


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'दि ब्लैक प्रिंस' में दिलीप सिंह के किरदार में सतिंदर सरताज.

#1. एक राजकुमार 1838 में भारत के एक बेहद ताकतवर राजघराने में पैदा हुआ. वो पंजाब के महाराज रणजीत सिंह का सबसे छोटा और महारानी जिंद कौर की इकलौता बेटा था. उसके चार पुरखे कत्ल कर दिए गए. पांच साल की छोटी सी उम्र में उसे सिख साम्राज्य का शासक बना दिया गया. उसका नाम था दिलीप सिंह.

#2. 1849 में ब्रिटिश राज ने इंडिया में पंजाब को हड़प लिया. इसके साथ ही महाराजा दिलीप सिंह को गद्दी से हटा दिया गया. वे सिख साम्राज्य के आखिरी राजा थे.

#3. महाराज को उनकी मां से दूर कर दिया गया. पहले इन्हें लाहौर से उठाकर फ़तेहगढ़ भेजा गया, जो अब उत्तर प्रदेश में है.

#4. महाराज को अंग्रेज़ीदां तौर-तरीके सिखाए गए. इन चीजों का धीरे-धीरे उन पर ऐसा असर पड़ा कि वो खुद ही अपनी भाषा, धर्म और कल्चर से अलग हो गए. वो अंग्रेज़ों की देख-रेख में बड़े हुए और काफी बाद में धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन गए.

#5. मई 1854 में उन्हें इंग्लैंड ले जाया गया. वहां उनकी मुलाकात क्वीन विक्टोरिया से कराई गई. उन्हें महाराज बहुत पसंद आए. क्वीन महाराज को प्यार से ‘दि ब्लैक प्रिंस’ बुलाती थीं. उसी नाम को फिल्म का टाइटल बनाया गया.

#6. क्वीन विक्टोरिया उन्हें अपने सबसे पसंदीदा बेटे की तरह रखती थीं. जिस भी रॉयल पार्टी में महारानी विक्टोरिया जाया करतीं, लोग चाहते कि वो राजकुमार को भी अपने साथ लेकर आएं.


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महाराज दिलीप सिंह की पेंटिंग

#7. करीब दस साल तक दिलीप सिंह रॉयल परिवार के साथ यूरोप घूमे, भव्य जिंदगी देखी और समय बिताया. निजी जिंदगी में वो अंग्रेज़ों की तरह रहते, लेकिन पब्लिक में खुद को इंडियन प्रिंस की तरह प्रेज़ेंट करते.

#8. अपनी मां से अलग होने के 13 साल बाद वो उनसे वापस मिले. तब तक उनकी मां नेपाल में रह रही थीं और दिलीप से मिलवाने के लिए उन्हें कलकत्ता लाया गया था. तब तक अंग्रेज़ दिलीप सिंह को अपने लिए खतरा नहीं मानते थे, लेकिन उनकी मां ने उन्हें उनके खोए हुए राज्य की याद दिलाई. इसके दो साल बाद ही महाराज की मां की मौत हो गई, लेकिन अपना राज्य वापस लेने का ख्याल महाराज के जेहन से नहीं मिटा.

#9. दिलीप सिंह पूरी ज़िंदगी अपनी असल पहचान और अपने राज्य की आजादी के लिए लड़ते रहे. उन्होंने अपनी आखिरी सांसें 1893 में पैरिस में लीं. वो एक सस्ते होटल में मृत पाए गए थे. उनकी आखिरी इच्छा थी कि उनका शरीर वापस इंडिया भेज दिया जाए, लेकिन दंगों के डर की वजह से इस इच्छा को पूरा नहीं किया गया.

#10. उनके शरीर को इंग्लैंड में ही ईसाई रस्मों-रिवाज़ से दफना दिया गया. हालांकि ये माना जाता है कि दिलीप सिंह ने मृत्यु से पहले फिर सिख धर्म अपना लिया था.


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महाराज दुलीप सिंह की कब्र


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