‘पैरासाइट’ के डायरेक्टर बोंग जून हो ने जब बेस्ट फॉरेन फ़िल्म का गोल्डन ग्लोबअवार्ड रिसीव किया था, तब कहा था, ‘जब आप इस एक इंच लंबे सबटाइटल्स के बैरियर कोपार कर लेंगे, तब आप कई और बेहतरीन फिल्मों से रूबरू होंगे.’बोंग जून हो और 'पैरासाइट' की पूरी टीम.इस बयान ने सालों से चली आ रही बहस को फिर ज़िंदा कर दिया था. डबिंग या सब-टाइटल्स.एक वर्ग है जो कहता है कि दूसरी भाषा की फ़िल्म को बेहतर ढंग से समझने और एन्जॉयकरने के लिए अपनी भाषा में डबिंग ज़रूरी है. वहीं दूसरा तबका कहता है कि फ़िल्म काअसली मज़ा उसकी ओरिजनल भाषा में आता है. भले वो भाषा हमें समझ ना आए, तो भीसबटाइटल्स की मदद से फ़िल्म को समझा जा सकता है.अपनी बात करें तो हमारा वोट भी सबटाइटल पार्टी को जाएगा. फ़िल्म के एक्टर्स का पूरापोटाश उनकी असली आवाज़ सुन कर ही तय किया जा सकता है. एक्टिंग का एक भारी हिस्सावॉइस मॉड्यूलेशन होता है, जो कि उस एक्टर की कलाकारी के स्तर को दर्शाता है. लेकिनजब किसी वॉइस एक्टर की आवाज़ उसके साथ सिंक की जाती है तो अक्सर एंड रिज़ल्ट खराबनिकलता है. खास कर तब, जब आप उस एक्टर की असली आवाज़ से वाकिफ़ हों. जैसे बचपन मेंमैंने WWE में ड्वेन 'द रॉक' जॉनसन को खूब देखा और सुना. ड्वेन रेसलिंग जगत मेंअपने माइक स्किल्स के लिए विख्यात हैं. फिर एक दिन यूटीवी एक्शन पर ‘द रनडाउन’फ़िल्म में ड्वेन की डब्ड आवाज़ सुनी और उसी दिन से डबिंग कल्चर से भरोसा उठ सा गया.दूसरा हमारे इंडिया में तो पूरी स्क्रिप्ट ही बदल जाती है डबिंग स्टूडियो में.इसलिए फिल्में ओरिजनल भाषा में देखें सबटाइटल्स के साथ, शुरुआत में थोड़ा अटपटा लगसकता है लेकिन जल्द ही आप फ़िल्म के फलो में रम जाएंगे. बाकी तो योर लाइफ, योररूल्स. #पैरासाइट सिनेमा हमारे यहां फिल्मों में एंड में सब ठीक हो जाता है. हैप्पीएंडिंग. विलेन मर जाता है. भूत मिट जाता है. बिछड़े प्रेमी मिल जाते हैं. लेकिन साउथकोरियन फिल्म मेकर्स इस कांसेप्ट में ज़्यादा यकीन नहीं रखते हैं. बेहतरीन एक्शन,हॉरर, थ्रिलर, सस्पेंस फिल्मों के शौकीन लोगों के लिए साउथ कोरियन सिनेमा कारुन काखज़ाना है. यहां कई फिल्ममेकर्स दो जॉनर्स को मिक्स करके फ़िल्म बनाते हैं. कई साउथकोरियन फिल्में ऐसी हैं, जो आपके दिमाग को चकरघिन्नी बना देंगी. आपको एक पल लगेगादिलवाले दुल्हनिया टाइप सीन चल रहा है, अगले पल फ़िल्म साइंस फिक्शन लगेगी और उससेअगले पल कॉमेडी. 'पैरासाइट' के अलावा भी कई बेहतरीन फिल्में इस इंडस्ट्री में बनाईगई हैं, जिनकी इंडियन फिल्ममेकर्स ने खूब कॉपी भी की है. आज आपको ऐसी ही कुछ साउथकोरियन फिल्मों की इंडियन कॉपी के बारे में बताते हैं. #रॉक ऑन - द हैप्पी लाइफ़#रॉक ऑन - द हैप्पी लाइफ़2008 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म का म्यूज़िक और थीम उस वक़्त के हिसाब से अलग था. फ़िल्ममें फरहान अख्तर मेन लीड थे. और वो 'कसम से' सीरियल वाली एक्ट्रेस प्राची देसाईअपना बॉलीवुड डेब्यू कर रहीं थीं. इस म्यूज़िक बैंड की कहानी को क्रिटिक्स ने खूबसराहा. फरहान ,पूरब कोहली और अर्जुन रामपाल की परफॉरमेंस के साथ-साथ फ़िल्म केडायरेक्टर अभिषेक कपूर ने भी खूब तारीफें बटोरी. इस फ़िल्म का कांसेप्ट 2007 मेंरिलीज़ हुई कोरियन फ़िल्म 'द हैपी लाइफ' से बहुत मिलता है. इस फ़िल्म के डायरेक्टर थेली जून इक जो कोरियन सिनेमा में बड़ा नाम है. ये भी एक बैंड की कहानी है, जो टूटताहै और फिर जुड़ता है. हालांकि 'रॉक ऑन' हूबहू कॉपी नहीं थी. अभिषेक कपूर ने कईएलिमेंट नए डाले थे. लेकिन अगर आप 'द हैप्पी लाइफ़' देखेंगे तो आपको अंदाज़ा होगा कि'रॉक ऑन' का आइडिया कहां से आया होगा. #बर्फी - लवर्स कॉन्सर्ट#बर्फी - लवर्स कॉन्सर्ट2012 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'बर्फी' में रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा की खूब वाहवाहीहुई. कश्यप के बाद कोई ये दूसरा अनुराग नाम का व्यक्ति था, जिसके डायरेक्शन की खूबतारीफ़ हो रही थी. प्रमोशन्स के दौरान अनुराग बासु ने बताया था कि फ़िल्म के कुछसीन्स चार्ली चैपलीन की साइलेंट फिल्मों से प्रेरित थे. लेकिन अनुराग ने ये नहींबताया कि फ़िल्म के कई सीन्स अलग-अलग हॉलीवुड और कोरियन फिल्मों से भी बहुत ज़्यादाप्रेरित थे. जिसमें कोरियन फ़िल्म 'लवर्स कॉन्सर्ट', हॉलीवुड फिल्म 'द एडवेंचरर','बैनी एंड जून' जैसी कई फिल्में शामिल हैं. #मर्डर 2 - चेज़र#मर्डर 2 - चेज़रसाल 2011. फ़िल्म 'मर्डर 2'. टिपिकल भट्ट कैम्प फ़िल्म से कुछ अलग फ़िल्म. प्रशांतनारायण, इमरान हाशमी की दमदार परफॉरमेंस और स्टोरी के दम पर फ़िल्म खूब सफल हुई.क्रिटिक्स और जनता ने फ़िल्म को खूब सराहा. लेकिन मोहित सूरी की सराहना का आधाक्रेडिट 2008 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'द चेज़र' को जाता है. जिसकी स्टोरीलाइन को मोहितसूरी ने अंटा लिया. 'द चेज़र' ने साउथ कोरियन सिनेमा इंडस्ट्री में थ्रिलर जॉनर कोनए मायने दिए थे. फ़िल्म के डायरेक्टर नान होंग जिन की ये पहली फ़िल्म थी. 'मर्डर 2'देख जब लोगों ने महेश भट्ट से इस बारे में सवाल पूछा था, तो तब उन्होंने इस बात कोसिरे से नकार दिया और फ़िल्म के आइडिया के पीछे निठारी हत्याकांड घटना को बताया.लेकिन भट्ट साहब ये पब्लिक है, ये सब जानती है. #रॉकी हैंडसम- द मैन फ्रॉम नोवेयर#रॉकी हैंडसम- द मैन फ्रॉम नो वेयरजॉन अब्राहम स्टारर 'रॉकी हैंडसम'. फ़िल्म के डायरेक्टर थे लेट निशिकांत कामत. जॉनअब्राहम की फ़िल्म में एक्टिंग वैसी ही थी, जैसी हर फिल्म में होती है. लेकिन तारीफ़बनती है फ़िल्म के फाइट सीन्स की. मतलब भाईसाहब जो फाइट सीन्स की कोरियोग्राफी है,कमाल है. ये फ़िल्म 'ऑफिशियल' एडाप्टेशन है 2010 में रिलीज़ हुई कोरियन फ़िल्म 'द मैनफ्रॉम नोवेयर' की. ये फ़िल्म उस साल कोरिया की सबसे बड़ी फिल्म थी. #आवारापन - अ बिटरस्वीट लाइफ#आवारापन - आ बिटर स्वीट लाइफ2007 में रिलीज़ हुई 'आवारापन' के गानों का जो क्रेज़ था, वो शब्दों में बताया नहींजा सकता. मेरी ट्यूशन में लड़के पढ़ाई के नोट्स कम एक दूसरे से ब्लूटूथ से 'तो फिरआओ' और 'माहिया' गाने ज़्यादा मांगते थे. इस फ़िल्म ने इमरान हाशमी और मोहित सूरी केकरियर को मज़बूत करने में अहम रोल निभाया. लेकिन मोहित सूरी ने ये पूरी फिल्म हीकोरियन फ़िल्म से टाप रखी थी. 'आवारापन' 2005 में रिलीज़ हुई कोरियन फ़िल्म 'अ बिटरस्वीट लाइफ' की कॉपी थी. लेकिन मोहित सूरी इस फैक्ट से साफ़ इनकार करते रहते हैं.अगर आप दोनों फिल्में देखेंगे तो मिल्क-वॉटर साफ़ हो जाएगा. #एक विलन - आय सॉ दडेविल#एक विलन - आय सॉ द डेविल2014 में रिलीज़ हुई 'एक विलन' ने ट्रेलर से ही माहौल बना दिया था. फ़िल्म का बेस्टपार्ट थे रितेश देशमुख, जिन्होंने पहली बार नेगेटिव रोल निभाया और बखूबी निभाया.सिद्धार्थ-श्रद्धा की लव स्टोरी और रितेश की परफॉरमेंस ने खूब वाह-वाही बटोरी. मुझेयाद है उस वक़्त महेश भट्ट ने ट्वीट किया था कि 'मोहित अब बड़ा हो गया है'. वैसेमोहित बड़े तो हो गए हैं लेकिन बड़े होने के साथ उनकी कोरियन फिल्मों को टापने की आदतनहीं छूटी है. क्योंकि 'एक विलन' भी 2010 में रिलीज़ हुई कोरियन फ़िल्म 'आय सॉ दडेविल' की कॉपी है. इस फ़िल्म के डायरेक्टर थे किम जी वून. फ़िल्म में कुछ सीन इतनेहिंसक थे कि कोरियन सेंसर बोर्ड ने 7 सीन कट कर इस फ़िल्म को रिलीज़ किया था. #प्रेमरतन धन पायो - मास्क्रेड#प्रेम रत्न धन पायो - मैस्क्रेडअपनी फिल्मों में संस्कारों के थोक सप्लायर सूरज बडजात्या ने भी कोरियन फिल्मों सेआइडिया टापने में संकोच नहीं किया. 2015 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'प्रेम रतन धन पायो'का प्लॉट सूरज जी ने 2012 में रिलीज़ हुई कोरियन फ़िल्म 'मास्क्रेड' से उठाया था. बसइस कोरियन फ़िल्म में ओवर एक्टिंग की थोड़ी कमी थी, जो 'प्रेम रतन धन पायो' में सलमानभाई ने पूरी की थी. #भारत - ओड टू माय फादर#भारत - ओड टू माय फादर2019 में रिलीज़ हुई 'भारत'. अली अब्बास ज़फ़र और सलमान खान की डायरेक्टर-एक्टर जोड़ीकी एक और फ़िल्म. लेकिन भाई की ये फ़िल्म भी 2014 में रिलीज़ हुई साउथ कोरियन फ़िल्म'ओड टू माय फादर' पर बेस्ड थी. इस फ़िल्म की तरह 'भारत' में सलमान भाई के कैरेक्टरकी 8 साल से 70 साल तक की जर्नी है. जिसमें हमारे सल्लू भाई की बॉडी लैंग्वेज 70साल में भी 40 साल वाली थी. मतलब भाई कुछ टिप्स साथ मे एक्टिंग कर रहे सुनील ग्रोवरसे ही ले लेते तो अच्छा होता. #ज़िंदा - ओल्ड बॉय#ज़िंदा - ओल्ड बॉय'ज़िंदा' में लीड रोल में थे जॉन अब्राहम और संजय दत्त. डायरेक्टर थे संजय गुप्ता.फ़िल्म बॉक्स-ऑफिस पर भी ठीक-ठाक चल गई और क्रिटिक्स ने भी संजय दत्त और जॉन कीतारीफें की. लेकिन कई क्रिटिक्स ने फ़िल्म के सीन्स को कोरियन फ़िल्म 'ओल्ड बॉय' कीकॉपी बताया. 2005 में 'ओल्ड बॉय' की प्रोडक्शन कंपनी शो ईस्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंसकर के भी ये बताया था कि उन्हें शक है कि 'ज़िंदा' फ़िल्म के कई सीन 'ओल्ड बॉय' कीकॉपी हैं. 'ओल्ड बॉय' 2003 में रिलीज़ हुई कमाल की थ्रिलर फिल्म है, जो कि जापानीनॉवल 'ओल्ड बॉय' पर बेस्ड थी. ये फ़िल्म तीन कोरियन फिल्मों की सीरीज़ 'द वेंजेन्सट्राइलॉजी' का दूसरा पार्ट थी. इसका पहला पार्ट 'सिम्पैथी फ़ॉर मिस्टर वेंजेन्स'2002 में और अंतिम पार्ट 'लेडी वेंजेन्स' 2005 में रिलीज़ हुआ. हालांकि तीनो फिल्मोंकी स्टोरीलाइन काफ़ी अलग थी लेकिन देश-विदेश के समीक्षकों ने तीनों फिल्मों का थीमएक जैसा पाया था. #जज़्बा - सेवन डेज़#जज़्बा - सेविन डेज़2015 में रिलीज़ हुई ऐश्वर्या राय की कमबैक फ़िल्म 'जज़्बा'. ऐश्वर्या के साथ थेइरफ़ान. फ़िल्म को डायरेक्ट किया था संजय गुप्ता ने. लेकिन 'ज़िंदा' की कॉन्ट्रोवर्सीसे सीख लेते हुए इस बार संजय ने कोरियन फ़िल्म को कॉपी करने की बजाय राइट्स खरीदरीमेक किया था. 'जज़्बा' बेस्ड थी 2007 में रिलीज़ हुई साउथ कोरियन फ़िल्म 'सेवन डेज़'पर. जो कि उस साल कोरिया की सबसे बड़ी फिल्मों में एक थी. #कोरियन प्राइड प्रस्तुतलिस्ट में कुछ फिल्ममेकर्स ने राइट्स खरीद कर इंडियन ऑडियंस के लिए रीमेक बनाया.लेकिन कुछ ने सीधे-सीधे कोरियन सिनेमा आर्टिस्ट्स की क्रिएटिविटी को अपने नाम सेबेच दिया. ऐसी कलाकारी हमारी इंडस्ट्री में कोई नयी बात नहीं है. फ़िल्म के सीन हों,म्यूज़िक की धुन हो, यहां तक कि फ़िल्म के पोस्टरतक भी हमारे यहां के मेकर्स बिना किसी क्रेडिट के थोड़ा सा एडिट कर अपने नाम से बेचकरोड़ों कमा लेते हैं. खैर, कोरियन सिनेमा मेकर्स के लिए ये गर्व का विषय होनाचाहिए. विश्व की इतनी बड़ी इंडियन सिनेमा इंडस्ट्री उनके प्रोडक्ट और क्राफ्ट कीमुरीद है. विश्व भर में उनके सिनेमा का बोलबाला है. ऐसे में हमारे फ़िल्म मेकर्स केलिए अनुराग कश्यप की फिल्म का एक डायलॉग प्रस्तुत है,'तेरा खून कब खौलेगा रे फैज़ल'.--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी दी लल्लनटॉप में इंटर्नशिप कर रहे शुभम ने लिखी है--------------------------------------------------------------------------------विडियो:बिग बॉस-14 में जीत से एक क़दम दूर रह गए राहुल वैद्य के साथ 16 साल पहले भीयही हुआ था!