संडे इज फन डे. एक टाइम में होता था. पर अब नहीं, अब तो कई लोगों के लिए संडे इजवर्किंग डे होता है. हजार टेंशन खोपड़ी में होती हैं. इतनी की लोग आपके बाल का रंगदेखकर आपकी उम्र का अंदाजा लगाने लगते हैं. ऐसे लोगों की वीक डेज में छुट्टी होतीहै तो दोस्त यार नहीं होते, जिनके साथ आप संडे का माहौल बनाकर छुटपन की यादों कोफिर से ताजा कर सकें. इसलिए हम जरा यहां अतीत वाले संडे में झांकने की कोशिश कर रहेहैं.भोरहरी वाला क्रिकेट मैचभले ही स्कूल के लिए जगने में हम आना-कानी करते थे. लेकिन संडे के दिन दूसरेमोहल्ले के चिंटू गैंग से मैच खेलना होता था, तो आंखें भोरहरी के चार बजे ही खुलजाती. और फिर मोटे चक्के वाली रेंजर साइकिल के करियर में बैट दबा कर निकल लेतेदो-दो हाथ करने.Source : Reutersखास कपड़े और स्पेशल खानाहफ्ते के 6 दिन कैसे भी कपड़े क्यों न पहने. संडे का ड्रेस स्पेशल होता था. मम्मीअलमारी से बाहर जाने वाले कपड़े पहनने को देती थी. खाना भी स्पेशल होता था. पूड़ी,आलू-चने की सब्जी और हलवा या खीर. पेट से ज्यादा खाने के बाद भी सीरियल के बीच मेंऐड के वक्त कटोरी खीर या सब्जी से भर लाते थे. और फिर मजे से खाते थे.Symbolic Image, Source : Reutersरामायण और महाभारतये होता था इंटरटेंमेंट पैकेज. 9 बजे गली में एक बच्चा नहीं दिखता था. सारे टीवी सेजो चिपके पड़े होते थे. 9 से 10 का वक्त ऐसा होता था कि न तो कोई यार-दोस्त घर परबुलाने आते थे. अगर गलती से कोई मिलने आ गया तो उसको भी पकड़ कर घर में बिठा लेतेथे. और जबतक खत्म नहीं होता, चिपके रहते थे टीवी से. सूसू तक नहीं जाते थे.Source : Reutersकैरमबोर्ड और लूडोइसे मत भूलो यार. बेस्ट इंडोर गेम्स के अवॉर्ड से सम्मानित है. रामायण और महाभारतका एंटरटेंमेंट डोज लेने के बाद मन कमरे की खूंटी पर टंगे कैरमबोर्ड या फिर अल्मारीपर रखे लूडो के लिए ललचता था. भाई बहनों के सात पार्टी बना लेते और खेलते. और अगरभाई-बहन तैयार नहीं होते तो धर लाते पड़ोसियों के बालकों को. दो-तीन घंटे शिद्दत सेखेल में जुटे रहते. बीच-बीच में मम्मी का कमेंट भी आ जाता, होमवर्क कब करोगे. करोगेभी या नहीं. कल डायरी में हम नहीं लिखेंगे की बच्चा मेरा बीमार था. इसलिए होमवर्कनहीं किया.तीन घंटे का पावर नैपसुबह से चल रही मौज-मस्ती पर विराम तब लगता था, जब खुद की मम्मी और पड़ोसियों कीभी, आ कर अपने-अपने बच्चों को लंच कराने के लिए ले जाती थी. लंच काल होता था. उसकेबहाने खेल चौपट. सब चले जाते और फिर लंच कर के मम्मी तीन घंटे का पावर नैप दिलातीथी. कुछ भी कर लो ये पावर नैप तो मिलना ही मिलना होता था. बच नहीं सकते थे आप.छुटपन में हम इससे बहुत भागते थे. मम्मी के सो जाने पर निकल लेते थे खेलने के लिए.और आज यही नैप के लिए हम तरसते हैं.Source : Reutersमोहल्ले में वो पिट्टो और कंचे खेलनापावर नैप से रिचार्ज होने के बाद आंख खुलते ही दिमाग वापस से खेल की तरफ ही होताथा. अंखियों का कीचड़ बिना साफ किए निकल पड़ते थे मोहल्ले में पिट्टो औरकंचे खेलने. दो-चार तो पहले से होते थे. बाकी को घर-घर जा कर इकट्ठा कर लाते थे. औरशाम तक खेलते रहते.Symbolic Imageलेट नाइट मूवी देखनापूरे दिन मस्ती करने के बाद रात को फिर से हम अपने आप को फेवीकॉल लगाकर चिपका लेतेथे टीवी से. क्योंकि होमवर्क की कोई टेंशन नहीं होती थी. सारा होमवर्क क्लासवर्क सबके सब शनिचर को ही निपटा लेते थे. मम्मी-पापा के डांट के बाद भी सुनते नहीं थे. 9से 12 वाली मूवी देख कर ही लुढ़कते थे. और सबसे अच्छी बात संडे की ये होती थी किमम्मी पढ़ने को बोलती भी नहीं थी.--------------------------------------------------------------------------------पापा के जमाने में इन 10 चीजों से बनते थे लल्लनटॉपपापा जब कॉलेज में इश्क़ लड़ाते थे, ये ऐड उस जमाने के हैं