'बैंडिट क्वीन' के विरोध में इंडस्ट्री खड़ी हो गई, बोले- "नंगी लड़की लेकर आए हैं, इसलिए हिट हो रही"
शेखर कपूर ने बताया कि 'बैंडिट क्वीन' में गैंग रेप वाला सीन शूट करते हुए वो इतने विचलित हो गए थे कि वो सेट पर ही उल्टियां करने लगे.

Bandit Queen. Shekhar Kapur की वो फिल्म जो समाज के उस बदबूदार सच को उघाड़ती है, जिसका भान तो सबको रहा. मगर या तो लोग उससे मुंह फेरे रहे या फिर बरसों से चली आ रही व्यवस्था बताकर उस पर दंभी हुंकारें भरते रहे. एक ऐसी क्रूर व्यवस्था जिसकी दा़ढ़ में असंख्य मानवीय संवेदनाओं का ख़ून लगा है. कुएं, नलके, रास्ते और मंदिर ही नहीं, इंसान माने जाने का अधिकार तक जाति नाम की इस तुच्छ व्यवस्था के आधार पर बंटे हुए थे. शेखर कपूर ने अपनी फिल्म में बस इसी को रेखांकित किया. मगर सच सुनने का कलेजा हमेशा से विरल रहा है. लोग इससे असहज हो जाते हैं. और फिर ये फांस गले में अटक जाती है. कुछ ऐसा ही ‘बैंडिट क्वीन’ के साथ भी हुआ.
शेखर ने इस फिल्म के लिए जो कुछ भी रचा, वो सब बिना काट-छांट तो भारतीय दर्शकों के लिए था नहीं. मगर तमाम तब्दीलियों के बावजूद भारत में ये फिल्म कड़वा घूंट ही बनी रही. तिस पर विडंबना ये कि जिस फिल्म को स्वीकार्यता तक बमुश्किल मिली, उसे तीन नेशनल अवॉर्ड दिए गए. इस पर बैन भी लगा और दबे स्वर में वाहवाही भी हुई. हालांकि विरोध तो खुलकर हुआ, और पुरज़ोर हुआ. विरोधियों में सिर्फ समाज के कथित ठेकेदार नहीं, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी शामिल थे.
पिछले दिनों जब शेखर कपूर The Lallantop के ख़ास कार्यक्रम Guest In the Newsroom में आए, तब उन्होंने बताया कि ये फिल्म उन्होंने क्यों बनाई. क्यों उन्होंने ये जोखिम लिया? और क्या हुआ कि इस फिल्म ने उनके हाथों में हथकड़ी तक लगवा दी. सबसे पहले उन्होंने इस फिल्म के बीज पर बात की. शेखर ने कहा,
यूं तो सैंकड़ों भारतीय फिल्मों में रेप सीन दिखाए गए हैं. लेकिन शेखर कपूर ने ‘बैंडिट क्वीन’ में जिस तरह एक महिला के साथ ज़्यादती को महसूस कराया, उसे देखकर घृणा होती है. जैसे असंख्य कीड़े देह पर रेंगने लगते हैं. वो सीन, वो गैंग रेप वाला सीन. उसे शूट करते हुए शेखर ख़ुद असहज थे. उल्टियां कर रहे थे. ये सीन कैसे शूट हुआ, इसके बारे में शेखर कहते हैं,
‘बैंडिट क्वीन’ इंडियन सिनेमा की कल्ट फिल्मों में शामिल हुई. मगर इस पर बैन भी लगा. क्यों लगा? इसका जवाब देते हुए पहला शब्द जो शेखर ने कहा वो था,
# बैंडिट क्वीन ने शेखर के हाथों में हथकड़ी लगवा दी
इस फिल्म को तीन नेशनल अवॉर्ड मिले. बेस्ट कॉस्ट्यूम डिज़ाइन, बेस्ट फीचर फिल्म और बेस्ट एक्ट्रेस. मगर इस फिल्म ने शेखर के हाथों में हथकड़ी लगवा दी. कैसे? जवाब में शेखर कपूर ने कहा,
1945 में जन्मे शेखर कपूर ने शुरुआती पढ़ाई दिल्ली से की. फिर इकोनॉमिक्स में ग्रैजुएशन किया और इंग्लैंड जाकर चार्टर्ड अकाउंटेंट बने. लेकिन वो हमेशा से अपना कुछ रचना चाहते थे. कहानियां कहना चाहते थे. साल 1983 में उन्होंने ‘मासूम’ बनाई. उनकी फिल्म ‘एलिज़ाबेथ’ (1998) को ऑस्कर के 7 नॉमिनेशंस मिले. एक कैटेगरी में इसने ऑस्कर जीता भी. उनक हर काम आलातरीन रहा. मगर ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) ने उन्हें अमर कर दिया.
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