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'बैंडिट क्वीन' के विरोध में पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो गई, बोले- "नंगी लड़की लेकर आए हैं, इसलिए हिट हो रही"

शेखर कपूर ने बताया कि 'बैंडिट क्वीन' में गैंग रेप वाला सीन शूट करते हुए वो इतने विचलित हो गए थे कि वो सेट पर ही उल्टियां करने लगे.

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17 मार्च 2026 (अपडेटेड: 18 मार्च 2026, 10:31 AM IST)
Bandit queen, Shekhar kapur,
'बैंडिट क्वीन' फूलन देवी के जीवन पर आधारित फिल्म है. ये साल 1994 में रिलीज़ हुई थी.
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Bandit Queen. Shekhar Kapur की वो फिल्म जो समाज के उस बदबूदार सच को उघाड़ती है, जिसका भान तो सबको रहा. मगर या तो लोग उससे मुंह फेरे रहे या फिर बरसों से चली आ रही व्यवस्था बताकर उस पर दंभी हुंकारें भरते रहे. एक ऐसी क्रूर व्यवस्था जिसकी दाढ़ में असंख्य मानवीय संवेदनाओं का ख़ून लगा है. कुएं, नलके, रास्ते और मंदिर ही नहीं, इंसान माने जाने का अधिकार तक जाति नाम की इस तुच्छ व्यवस्था के आधार पर बंटा हुआ था. शेखर कपूर ने अपनी फिल्म में बस इसी को रेखांकित किया. मगर सच सुनने का कलेजा हमेशा से विरल रहा है. लोग इससे असहज हो जाते हैं. और फिर ये फांस गले में अटक जाती है. कुछ ऐसा ही ‘बैंडिट क्वीन’ के साथ भी हुआ. 

शेखर ने इस फिल्म के लिए जो कुछ भी रचा, वो सब बिना काट-छांट तो भारतीय दर्शकों के लिए ग्राह्य था ही नहीं. मगर तमाम तब्दीलियों के बावजूद भी, भारत में ये फिल्म कड़वा घूंट ही बनी रही. तिस पर विडंबना ये, कि जिस फिल्म को स्वीकार्यता तक बमुश्किल मिली, उसे तीन नेशनल अवॉर्ड दिए गए. इस पर बैन भी लगा और दबे स्वर में वाहवाही भी हुई. वहीं विरोध खुलकर हुआ, और पुरज़ोर हुआ. और विरोधियों में सिर्फ समाज के कथित ठेकेदार नहीं थे, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी शामिल थे. 

पिछले दिनों जब शेखर कपूर The Lallantop के ख़ास कार्यक्रम Guest In the Newsroom में आए, तब उन्होंने बताया कि ये फिल्म उन्होंने क्यों बनाई. क्यों उन्होंने ये जोखम लिया? और क्या हुआ कि इस फिल्म ने उनके हाथों में हथकड़ी तक लगवा दी. सबसे पहले उन्होंने इस फिल्म के बीज पर बात की. शेखर ने कहा,

"मुझे एहसास हुआ कि बैंडिट क्वीन पुरुषार्थ की मेरी अपनी अनुभूति के विरुद्ध एक विचार था. इसमें जो रेप सीन था, उसने लोगों को नाराज़ कर दिया. असल में वो मेरी ओर से मुझ ही को एक चेतावनी थी, कि शेखर तुम समझ लो कि मैस्क्युलैनिटी चीज़ क्या है. और इसके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं. डायरेक्टर के तौर पर मैं ही रेपिस्ट था इस फिल्म का. मैंने खुद को ही मैस्क्युलैनिटी का फ़लसफ़ा सिखाया इस फिल्म से. मुझ पर होना चाहिए उस बलात्कार का इल्ज़ाम. हम मर्दों के सिर है ये गुनाह."

rape scene
‘बैंडिट क्वीन’ का वो दृश्य जिसमें ठाकुर श्रीराम (गोविंद नामदेव) फूलन (सीमा बिस्वास) को सरेआम नंगा करता है, और उसके  बाल खींच कर, उसे घसीटता है.

यूं तो सैंकड़ों भारतीय फिल्मों में रेप सीन दिखाए गए हैं. लेकिन शेखर कपूर ने ‘बैंडिट क्वीन’ में जिस तरह एक महिला के साथ ज़्यादती को महसूस कराया, उसे देख घृणा होती है. जैसे देह पर असंख्य कीड़े रेंगने लगते हैं. वो सीन‌‌… वो गैंग रेप वाला सीन. उसे शूट करते हुए शेखर ख़ुद असहज हो गए थे. उल्टियां कर रहे थे. ये सीन कैसे शूट हुआ, इसके बारे में शेखर कहते हैं,

“पहले तो मैंने सोचा था कि मैं ख़ुद को एक कमरे में बंद कर लेता हूं. वहां बैठकर मैं सोचता रहा, लिखता रहा. ऐसे शुरू करूंगा. वैसे शुरू करूंगा. फिर मैंने अशोक मेहता को बताया कि मैं ये सीन ऐसे शूट करूंगा. मगर ये सीन मेरी कल्पनाओं के मुताबिक शूट नहीं हुआ. जैसा मैं सोच रहा था. तो जब शूटिंग चल रही थी, मेरे दिमाग में चल रहा था कि उसे यानी फूलन को क्या कुछ सहना पड़ रहा है. मैं उसकी पीड़ा को अपने अंदर महसूस कर रहा था. और सोचते-सोचते अचानक मेरी तबीयत बिगड़ गई. वो सीन जिसमें लोग कमरे का दरवाज़ा खोल रहे हैं. अंदर जा रहे हैं. बाहर आ रहे हैं. दरवाज़ा खुलता है, बंद होता है. फिर खुलता है, बंद होता है. उफ्फ़... मैंने अशोक मेहता से कहा कि यार आज रहने दे. कल शूट करूंगा. मगर उसने ज़ोर दिया, कि आज ही शूट करो. मैं इस सीन का पूरा श्रेय नहीं ले सकता. रेणु सलूजा जो हमारी फिल्म की एडिटर थी, उसने सारे शॉट्स जिस तरह जोड़े, वो मार्मिक था. उसने इस सीन को वैसा बनाया जैसा मैं दिखाना चाहता था.”

bandit queen
डकैत बनने के बाद फूलन अपने उसी गांव लौटती है, जहां उसने नारकीय पीड़ाएं सहीं. बंदूक की नोंक पर वो उन सवर्णों की पगड़ी उतरवाती है, जिन्होंने उसके साथ पशुवत व्यवहार किया था. 

‘बैंडिट क्वीन’ इंडियन सिनेमा की कल्ट फिल्मों में शामिल हुई. मगर इस पर बैन भी लगा. क्यों लगा? इसका जवाब देते हुए पहला शब्द जो शेखर ने कहा वो था,

“सेंसर बोर्ड. उन्होंने बैन लगाया. फिर हमने अपील की, तो उन्होंने कहा कि ये-ये चीज़ें आप निकाल दो. हमने कहा ठीक है. अनसेंसर्ड फिल्म तो भारत में रिलीज़ ही नहीं हुई. हमने सेंसर बोर्ड की शर्तें मान लीं. फिल्म रिलीज़ हुई तो हाई कोर्ट में किसी ने केस कर दिया. उस सीन पर जिसमें सबकी पगड़ी निकाली जाती है फिल्म में. कहा कि ये फिल्म तो ठाकुरों के खिलाफ़  है. हाई कोर्ट ने इसे बैन कर दिया. फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. रिलीज़ करो फिल्म को. तब तक तो लोगों ने फिल्म VCR पर देख‍ ली थी. फिर फिल्म इंडस्ट्री इसके खिलाफ़ हो गई. लोगों ने कहा नंगी लड़की लेकर आए हैं, इसलिए हिट हो रही है. तो मैंने डिस्ट्रिब्यूटर से कहा, कि एक काम करो. वुमन ओनली शोज़ रखो. जैसे ही हमने ये किया, सिनेमाघरों के बाहर औरतों की बेतहाशा भीड़ लगने लगी. फिर इस पर बैन लगा. और फिर इसे दोबारा लाने के लिए बहुत देर हो चुकी थी.”

# बैंडिट क्वीन ने शेखर के हाथों में हथकड़ी लगवा दी 

shekhar handcuffed
जब ‘बैंडिट क्वीन’ को नेशनल अवॉर्ड मिले, तब शेखर कपूर मंच पर हथकड़ी लगा कर पहुंचे और मंच से यूं अपने बंधे हाथ दिखाकर, बिना कुछ कहे चले आए. 

इस फिल्म को तीन नेशनल अवॉर्ड मिले. बेस्ट कॉस्ट्यूम डिज़ाइन, बेस्ट फीचर फिल्म और बेस्ट एक्ट्रेस. मगर इस फिल्म ने शेखर के हाथों में हथकड़ी लगवा दी. कैसे? जवाब में शेखर कपूर ने कहा,

“अरे यार...मुझे उन लोगों ने कहा कि सर हम आपको अवॉर्ड देने वाले हैं. मगर आप कुछ बोलना नहीं. कुछ भी पॉलिटिकल मत कहना. नेशनल टेलीविजन पर आएगा शो. मैंने कहा मैं कुछ नहीं बोलूंगा. तो मैंने कुछ नहीं बोला. ऐसे चला गया. हथकड़ी लगाकर. और हथकड़ी दिखा दी. आ गया वापस. मैंने एक शब्द नहीं कहा. फिर भी जो कहना था, सब कहा.”

1945 में जन्मे शेखर कपूर हिंदी सिनेमा के सुनहरे हस्ताक्षर हैं. उनकी फिल्मों में वाहवाही की हवस नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की भूख महसूस होती है. अपने सृजन से वो ऐसे फिल्मकार जान पड़ते हैं, जिन्हें अपने क्राफ्ट पर किसी का वैलिडेशन नहीं चाहिए. वो बस कहानी को पूरी ईमानदारी से कहने में यक़ीन रखते हैं. शेखर कपूर ने अपनी शुरुआती पढ़ाई दिल्ली से की. फिर इकोनॉमिक्स में ग्रैजुएशन किया और इंग्लैंड जाकर चार्टर्ड अकाउंटेंट बने. लेकिन वो हमेशा से कुछ रचना चाहते थे. कुछ ऐसा जो मौलिक हो. कहानियां कहना चाहते थे. और उनकी यही क्षुधा उन्हें सिनेमा की तरफ़ ले आई. साल 1983 में उन्होंने ‘मासूम’ बनाई. भारतीय सिनेमा को मोगैम्बो जैसा अमिट खलनायक दिया. उनकी फिल्में कम हैं, मगर वो कम किसी लिहाज़ से नहीं हैं. उनकी ‘एलिज़ाबेथ’ (1998) को ऑस्कर के 7 नॉमिनेशंस मिले. एक कैटेगरी में इसने ऑस्कर जीता भी. उनका हर काम आलातरीन रहा. मगर ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) ने उन्हें अमर कर दिया.

वीडियो: शेखर कपूर ने बताया कि सुशांत सिंह राजपूत की परेशानी का कारण क्या था?

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