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फिल्म रिव्यू: फैन सिर्फ फिल्म नहीं, 'फील' है

फिल्म में न गाने हैं, न रोमैंस. और यही इसकी ख़ास बात है.

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प्रतीक्षा पीपी
15 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 12:32 PM IST)
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फिल्म रिव्यू: फैन कास्ट: शाहरुख खान, वालुशा डिसूजा, श्रिया पिलगांवकर, शायोनी गुप्ता डायरेक्टर: मनीष शर्मा रन टाइम: 2 घंटे 22 मिनट
  फ्राइडे. सुबह के 9 बजे. छुट्टी का दिन. खचाखच भरा हॉल. लोग सीटियों और तालियों से स्वागत करते हैं. स्टार का नहीं, फैन का. गौरव, आर्यन का फैन है. ठीक उसी तरह जैसे फैन होते हैं. आपका स्टार फिल्मों और इंटरव्यू में जैसा दिखता है, उससे कितना अलग है, आप नहीं जानते. आप बस उसे अपने करीब पाते हैं. जैसे वो आपका दोस्त हो. दिमाग में पल रही इस पैरेलल दुनिया में आप अपनी संवेदनाएं उसके हवाले कर चुके होते हैं. आप चाहते हैं कि वो भी अपनी संवेदनाएं आपको बदले में दे. प्यार से गले लगाए और कह दे, हां मैं भी तुमसे प्यार करता हूं. पर असल में ऐसा होता नहीं. अपने जन्मदिन पर जब सुपरस्टार आर्यन अपने घर से फैन्स की ओर देखकर हाथ हिलाता है, हर फैन को लगता है कि इस बार उसका हीरो जो मुस्कुराया था, उसे ही देख के मुस्कुराया था. लेकिन आर्यन के लिए फैन्स भीड़ हैं. मधुमक्खियों की तरह. उसे फर्क नहीं पड़ता कि भीड़ में खड़े लोग कौन हैं. 'फैन' एक कॉमन नाउन है. जातिवाचक संज्ञा. गौरव पहली बार आर्यन से पुलिस स्टेशन में मिलता है. घायल, जमीन पर पड़ा. अपना नाम सुनकर सर उठाता है तो पाता है उसका स्टार खड़ा है. ये सीन एक सिंबल है, गौरव और आर्यन के असल रिश्ते का, अगर असल में कोई रिश्ता है तो. गौरव ने आज तक सर उठा कर उसे बड़े परदे पर देखा होगा. लेकिन गौरव सफ़र तय करेगा, उस सीन तक का, जब वो आर्यन की आंखों में आंखें डाल बात कर रहा होगा. भले ही उसके लिए उसे क्रिमिनल बनना पड़े. ये मुलाकात 'बॉम्बे टॉकीज' के उस सीन जैसी बिल्कुल नहीं है, जिसमें अमिताभ बच्चन अपने फैन से मिलता है, तो उसके मर्तबान से मुरब्बा चख लेता है. 'मेरी लाइफ है, मैं तुम्हें 5 सेकेंड भी क्यों दूं.' ये सच गौरव पचा नहीं सकता. घर में बार-बार लताड़े जाने, दिल्ली से मुंबई आने, सिक्योरिटी या पुलिस से पिटने पर गौरव नहीं टूटता. लेकिन आर्यन की अनदेखी से टूट जाता है. रोता है, देर तक. अपने खून पसीने और उल्टी में सना हुआ. प्यार, प्यार नहीं, जूनून है. और उसका ध्यान अगर प्यार के रूप में नहीं कमा पाया, तो नफरत के रूप में कमा कर रहेगा गौरव. गौरव के पास आम आदमी होने की लक्ज़री है. आर्यन के पास नहीं. इसलिए वो आर्यन बनकर बार-बार क्राइम कर सकता है. उसका करियर ख़त्म कर सकता है. पर स्टार बनकर आर्यन गौरव का कुछ नहीं उखाड़ सकता. सोशल मीडिया पर आर्यन चलता है. जब कानून की एंट्री होती है, तो सबसे पहले स्टार की बदनामी होती है. फैन की क्या बदनामी होगी? उसके पास तो खोने के लिए नाम ही नहीं है. अगर उसे गौरव से लड़ना है, तो आम आदमी बनकर लड़ना होगा. उसके लेवल पर आकर. लेकिन तब तक दिल्ली के इंद्र विहार के छोटे से डीडीए फ्लैट में रहने वाला गौरव चांदना एक आम आदमी की ताकत का सबसे बुरा रूप बन चुका होगा. एक पागल स्टॉकर. गौरव की एक गर्लफ्रेंड-जैसी है. आर्यन की एक पत्नी है. लेकिन गौरव और आर्यन के आपसी रिश्ते में गौरव एक 'फेमिनिन' प्रेमी की तरह है. जैसे सूफी गानों में पुरुष औरत बन जाते हैं. और भगवान पुरुष. गौरव चाहता है कि आर्यन उससे वैसे ही सॉरी कहे जैसे झगड़े के बाद अपनी पत्नी को कहता है. आर्यन को वही दर्द होगा, जो पहली मुलाकात में गौरव को हुआ था. जब वो स्टेज पर खड़ा अपने सामने खाली ऑडिटोरियम देखेगा. खुद को एक उपद्रवी और सेक्शुअल मोलेस्टर की तरह टीवी न्यूज़ पर देखते हुए. और ईगो का ये सर्कल तब पूरा हो जाएगा जब आर्यन स्टेज पर गौरव की मिमिक्री करेगा. जैसे गौरव आर्यन की करता था. और अंत में दोनों की आइडेंटिटी एक दूसरे में ऐसे घुल जाएंगी कि उनमें से किसी एक को मरना ही होगा.
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फिल्म देखने लायक है. शाहरुख रिफ्रेशिंग हैं. इसके पहले वो 'बिल्लू' और 'ओम शांति ओम' में भी एक बड़े स्टार का रोल कर चुके हैं. लेकिन ये वाला स्टार ज्यादा प्रैक्टिकल है. 'स्टार जीवन' के करीब. एक आम अमीर और बिजी आदमी जैसा. उसके पास वक़्त नहीं कि हर किसी को खुश करता फिरे. वो नकली हंसी ओढ़ता है. धीरज नहीं है उसमें. गुस्से में थप्पड़ मार देता है. लोगों से लड़ लेता है. वो घमंडी है. उसका ये घमंड अनुभव से आता है. क्लाइमैक्स मैं आया एक्शन सीन थोड़ा खिंच गया. अब तक सब कुछ रियल लग रहा था. क्लाइमैक्स में लगने लगता है कि जो सामने चल रही है, फिल्म ही है. एक बात और, फिल्म में वो थ्रिल नहीं था, ट्रेलर जिसका वादा करता है. प्लॉट आप आसानी से प्रेडिक्ट कर सकते हैं. फिल्म में लोग शाहरुख़ से कनेक्ट करते हैं. उस तरह नहीं जैसे एक स्टार से करते हैं. बल्कि वैसे, जैसे एक फैन से करते हैं. इसलिए लोग स्क्रीन पर हो रहे क्राइम को देखकर भी तालियां बजाते हैं. 'फिजिकल स्टॉकिंग' और 'इम्परसोनेटिंग' जैसे सीरियस अपराध देखकर भी सीटियां मारते हैं. हालांकि शाहरुख़ ने हर तरह की फिल्में की हैं. पर उनकी पहचान उनके म्यूजिकल रोमैंस की वजह से है. इस फिल्म में न गाने हैं, न रोमैंस. देख आइए. डिफरेंट फिल्म है. क्योंकि सिर्फ फिल्म ही नहीं, 'फैन' होने की 'फील' भी है.

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