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फिल्म रिव्यू- सरफिरा

Sarfira, Akshay Kumar ब्रांड ऑफ सिनेमा है. एक साउथ इंडियन फिल्म की रीमेक है. बायोपिक है. हेराइज़्म से लबरेज़ कहानी. मगर उनकी पिछली फिल्मों से अलग और बेहतर. कैसे? पढ़िए.

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अक्षय कुमार की 'सरफिरा', कैप्टन गोपीनाथ की किताब 'सिंप्ली फ्लाय' पर आधारित है.
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11 जुलाई 2024 (Updated: 12 जुलाई 2024, 13:34 IST)
Updated: 12 जुलाई 2024 13:34 IST
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फिल्म- सरफिरा 
डायरेक्टर- सुधा कोंगारा
एक्टर्स- अक्षय कुमार, राधिका मदान, परेश रावल, सीमा बिस्वास
रेटिंग- 2.5 स्टार 

***

अक्षय कुमार की पिछली कुछ फिल्में नहीं चली हैं. क्योंकि वो अच्छी फिल्में नहीं थीं. न ही वो अच्छी फिल्में होने के लिए बनाई गई थीं. वो प्रोजेक्ट्स थीं, जिन्हें रेवेन्यू बटोरने के मक़सद से बनाया जा रहा था. हालांकि ऐसा नहीं है कि कोई भी फिल्ममेकर बुरी फिल्म बनाना चाहता है. कई वजहें होती हैं, जो एक फिल्म को अच्छी या बुरी बनाती हैं. इसमें नीयत सबसे अव्वल है. ख़ैर, अब अक्षय की नई फिल्म आई है, जिसका नाम है 'सरफिरा'. ये तमिल फिल्म 'सोरारई पोटरु' की हिंदी रीमेक है. जो कि कैप्टन गोपीनाथ की किताब 'सिंप्ली फ्लाय' पर आधारित थी. ये किताब कैप्टन गोपीनाथ की लो कॉस्ट एयरलाइन 'एयर डेक्कन' बनाने के पीछे की कहानी बतलाती है.

'सरफिरा' की कहानी महाराष्ट्र के एक गांव में शुरू होती है. यहां वीर म्हात्रे नाम का एक लड़का रहता है. जो कि अपने गांव में ट्रेन को रुकवाने के लिए प्रदर्शन कर रहा है. उसे क्रांति विरासत में मिली है. पिता के कई साल के संघर्षों के बाद उसके गांव में बिजली आई थी. बस दोनों लोगों की विचाधारा और प्रोटेस्ट करने का तरीका अलग है. पिता कलम से लड़ते थे, बेटा भुजबल से लड़ रहा है. वीर के साथ एक निजी त्रासदी हो जाती है. जिसके बाद वो एक कम खर्चे वाली एयरलाइन शुरू करने को अपनी ज़िद बना लेता है. ताकि निचले और मध्यम वर्ग वाले लोग भी हवाई जहाज़ में यात्रा कर सकें. अब उसका ये सपना कैसे पूरा होता है, कौन लोग इसमें उसकी मदद करते हैं और उसके सपने के पूरे होने में क्या बाधाएं आती हैं, ये आपको फिल्म में दिखाया जाता है. 

'सरफिरा' अक्षय कुमार ब्रांड ऑफ सिनेमा है. ये एक साउथ इंडियन फिल्म की रीमेक है. बायोपिक है. हेराइज़्म से लबरेज़ कहानी. जिसमें हीरो तमाम जद्दोजहद के बाद अपना मिशन पूरा कर ही लेता है. मगर 'सरफिरा' उनकी पिछली फिल्मों से अलग है. बेहतर है. अच्छी फिल्ममेकिंग और सिनेमैटिक टूल्स के सही इस्तेमाल का बढ़िया उदाहरण है. जब भी कोई डायरेक्टर अपनी फिल्म के रीमेक को खुद डायरेक्ट करते हैं, नतीजे बेहतर होते हैं. 'सरफिरा' को 'सोरारई पोटरु' बनाने वाली सुधा कोंगारा ने ही डायरेक्ट किया है. हालांकि 'सरफिरा' के बारे में ये नहीं कहा जा सकता है कि ये ओरिजिनल फिल्म से एक कदम आगे जाती है. या उसमें जो कमियां थीं, उससे निजात पाने की कोशिश करती है. ये सिर्फ अक्षय कुमार के स्टैंडर्ड और ट्रैक रिकॉर्ड के लिहाज से बेहतर फिल्म साबित होती है.

'सरफिरा' कई मौकों पर तीखी राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणी करने की कोशिश करती है. मसलन फिल्म में एक मौके पर वीर म्हात्रे का किरदार कहता है कि वो लो कॉस्ट एयरलाइन इसलिए बनाना चाहता है क्योंकि वो भारत में फैले क्लास सिस्टम की कमर तोड़ना चाहता है. क्योंकि अमीर लोग नहीं चाहते कि गरीब या मिडल क्लास वाले लोग उनके बगल में बैठें. उसकी एयरलाइन उन लोगों को ये मौका देगी. जबकि वीर के लिए एयलाइन बनाने की वजह सोशल से ज़्यादा पर्सनल है. बाद में एयरलाइन टायकून परेश गोस्वामी के साथ उसको ईगो क्लैश होता है. ये भी उसकी एयरलाइन खड़ी करने की अहम वजह बनती है. ये मौकापरस्ती जैसा लगता है.

'सरफिरा' देखते वक्त एक से ज़्यादा मौकों पर आपका गला रुंधेगा. आंख भरेगी. ये चीज़ इस फिल्म के पक्ष में सबसे मजबूती से काम करती है. आपको लगता है कि इस फिल्म ने आपको इतना भावुक कर दिया कि आप रोने पर मजबूर हो गए. मगर ये इमोशन नाम के सिनेमैटिक टूल का अधिकतम इस्तेमाल करती है. जानबूझकर वही चीज़ें करना, जिससे दर्शक जज़्बाती हो जाएं, ये इमोशनल ब्लैकमेलिंग जैसा लगता है. फिल्म में कई ऐसे सीन्स हैं, जिन्हें अंडरप्ले करना ज़्यादा प्रभावशाली लगता. जो शायद लंबे समय तक याद रहता. मगर फिल्म उन सीन्स को बड़े लाउड तरीके से पेश करती है. लॉन्ग टर्म इम्पैक्ट से ज़्यादा फौरी भाव पैदा करने की कोशिश करती है. ये चीज़ें 'सरफिरा' को औसत और बेहतर फिल्म के दायरे में जकड़े रखती हैं.

फिल्म में एक्टर्स की परफॉरमेंस इकलौती चीज़ है, जो शायद आपको ईमानदार लगती है. अक्षय ने वीर म्हात्रे के किरदार में सबकुछ झोंकने की कोशिश की है. वो अपने काम में एक्ट्रा एफर्ट डालते हैं. मानों उनके बारे में जो कुछ भी कहा या लिखा गया, उन सबको जवाब देना चाहते हों. खुद को फिर से साबित करना चाहते हों. इस फिल्म में वो अपने भीतर के एक्टर और स्टार में से एक्टर को चुनते हैं. और वो चीज़ काम करती है. मगर असल फायरब्रांड काम है राधिका मदान का. उन्होंने वीर की पत्नी रानी का रोल किया है. जो रानी बेकरी चलाती है. अपनी शर्तों पर अपनी ज़िंदगी जीती है. उन्हीं शर्तों पर शादी करती है. इस तरह के रोल्स में हमने उन्हें पहले भी देखा है. मगर इस फिल्म में वो अपना काम एंजॉय करती दिखती हैं. परेश रावल ने एयरलाइन टायकून परेश गोस्वामी का रोल किया है. परेश किसी भी हालत में वीर को सफल होते नहीं देखना चाहता. वो पूरी शिद्दत से उसका काम बिगाड़ना चाहता है. और कई मौकों पर सफल भी होता है. परेश और अक्षय के कॉम्बिनेशन सीन्स फिल्म में जान डालते हैं. 

'सरफिरा' को देखने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि आप क्लीन स्लेट के साथ सिनेमाघरों में जाएं. अगर 'सोरारई पोटरु' के साथ तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए 'सरफिरा' देखने जा रहे हैं, तो मत जाइए. क्योंकि उससे सिनेमा देखने का पूरा मक़सद ही खराब हो जाता है. न ही एक्टर की निजी विचारधाराओं के आधार पर उसकी फिल्म को जज कर अपनी राय कायम करें. 'सरफिरा' को खालिस सिनेमा की कसौटी पर कसें. 

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