फिल्म रिव्यू- सरदार उधम
सरदार उधम सिंह ने कहा था- 'टेल पीपल आई वॉज़ अ रिवॉल्यूशनरी'. शूजीत ने उस बात को बिना किसी लाग-लपेट के लोगों को तक पहुंचा दिया है.
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फिल्म 'सरदार उधम' के एक सीन में विकी कौशल.
'सरदार उधम' नाम की ये फिल्म सिर्फ क्रांतिकारी को ट्रिब्यूट नहीं देती. बल्कि उसकी अनसुनी कहानी को दुनिया के सामने लाकर रखती है. ये फिल्म सरदार उधम सिंह के कैरेक्टर को स्टडी करती है. वो क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है? कैसे कर रहा है? इसे करने से क्या होगा? इस तरह के तमाम सवालों के जवाब आपको ये फिल्म देती है. और वो जवाब आपके भीतर के इंसान को झकझोरकर रख देते हैं.
जालियांवाला बाग हत्याकांड से पहले रॉलैट एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन करते अमृतसर के लोग.
ये फिल्म तीन लोगों के कमिटमेंट की मिसाल है. सबसे पहले बात उस आदमी की, जिसकी कहानी को हमें दिखाई जा रही है. सरदार उधम सिंह. उधम सिंह जब 20 साल के थे, तब जालियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था. जिसमें हज़ारों लोगों की जानें गईं और न जाने कितने घायल हो गए. जो लोग उस घटना के वक्त जालियांवाला बाग में थे, उनके सिर्फ शरीर पर जख्म हुआ. मगर उधम सिंह भीतर से जख्मी हो गए. इस घटना ने उस इंसान में इतना कोयला भर दिया कि वो अगले 21 सालों तक बदले की आग में जलता रहा. उधम को ज़ाहिर तौर पर लोगों की मौत का बुरा लगा था. मगर उससे भी ज़्यादा बुरा उसे ये लगा था कि उसके देश में कोई बाहरवाला आया और उसने लोगों से बोलने की, प्रोटेस्ट करने की बुनियादी आज़ादी छीन ली. जो लोग उसके खिलाफ गए उन्हें गोलियों से भून दिया गया. सरदार उधम सिंह अपने कॉज़ को लेकर इतने कमिटेड थे कि उन्होंने माइकल ओ ड्वेयर को मारने के लिए 21 साल तक इंतज़ार किया.
इंडिया से लंदन जाने के बाद ड्वेयर को मारने की तैयारी की बात कहते सरदार उधम सिंह.
दूसरे शख्स हैं शूजीत सरकार. शूजीत एक बार अमृतसर गए हुए थे. वहां वो जालियांवाला बाग वगैरह घूमने गए. वहां के लोगों से कहानियां सुनीं. इसके बाद उन्होंने तय किया कि वो सरदार उधम सिंह की कहानी पर फिल्म बनाएंगे. अपना ये सपना लेकर वो दिल्ली से मुंबई आ गए. मगर परिस्थियां बहुत ठीक नहीं थीं. अपनी मनपसंद फिल्म बनाने की छूट नहीं थी. रिसोर्सेज़ नहीं थे. ऐसे में शूजीत ने अपने इस सपने को 20 साल तक पाला. उसकी सींचाई-निराई-गुणाई करते रहे. 7 फीचर लेंग्थ फिल्में बनाने के बाद उन्होंने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला. 'सरदार उधम' को देखते हुए लगता है कि शूजीत सरकार को जितना समय इस कहानी तक पहुंचने में लगा वो सार्थक हो गया. शायद वक्त ने उन्हें वो समझ बख्शी. क्राफ्ट पर इतना कमांड दिया. सरदार उधम सिंह के जीवन को और करीब से देखने और समझने का मौका दिया. इसके बाद जो फिल्म बनी, वो शूजीत के विज़न को लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रही. सरदार उधम सिंह ने कहा था- टेल पीपल आई वॉज़ अ रिवॉल्यूशनरी. शूजीत ने उस बात को बिना किसी लाग-लपेट के लोगों को तक पहुंचा दिया है.
माइकल ओ ड्वेयर. वो अंग्रेज ऑफिसर जिसने जनरल डायर को जालियांवाला बाग में प्रोटेस्ट करते हज़ारों लोगों के ऊपर गोली चलाने का ऑर्डर दिया.
इस कड़ी में तीसरे शख्स हैं विकी कौशल. विकी ने फिल्म में सरदार उधम सिंह का किरदार निभाया है. विकी ने सरदार उधम सिंह जैसे दिखने के लिए मेहनत नहीं की है. वो उनके जैसे सोचने और मसहूस करने में खर्च हुए हैं. किसी एक्टर को किसी कैरेक्टर में तब्दील करने के लिए आपको और क्या चाहिए. फिल्म के फाइनल एक्ट में एक सीन है, जहां उधम माइकल ओ ड्वेयर की मौत मामले की जांच कर रहे इंस्पेक्टर जॉन स्वेन को अपनी कहानी सुना रहा है. इस सीन में वो कहता है- वो इस बात को बिल्कुल ठंडे तरीके से कहता है. मानों ऐसा कुछ याद रहा हो, जिसे वो भूल जाना चाहता है. जब आप कोई फिल्म देख रहे होते हैं, तो आपका एक्टर से नहीं, उसके निभाए किरदार से एक कनेक्शन बनना ज़रूरी है. उस एक्टर की वही ज़िम्मेदारी है कि जो वो महसूस कर रहा है, वो आप तक बिना मिलावट के पहुंचे और उस पर आपको यकीन हो. विकी कौशल ने ये करके दिखा दिया है.
फिल्म के क्लाइमैक्स का एक सीन. इस सीन को देखकर आपको समझ नहीं आएगा कि रिएक्ट कैसे करें.
'सरदार उधम' एक ऐसी बायोग्राफिकल फिल्म है, जो इस जॉनर को अपनी समकालीन फिल्मों से बहुत आगे लेकर चली जाती है. इस फिल्म में जो कुछ भी घट रहा है, वो इतने रॉ और ऑरगैनिक तरीके से हो रहा है कि उसकी ऑथेंटिसिटी पर शक होने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमें बायोपिक्स के नाम पर मसालेदार सिनेमा देखने की आदत हो गई है. डायलॉगबाज़ी न हो, तो देशभक्ति वाली फील नहीं आती. रियल हीरो के वेश में रील हीरो, जब तक कुछ गुंडों को पीट न दे, कलेजे को ठंडक नहीं मिलती.
'सरदार उधम' पौने 3 घंटे लंबी फिल्म है. इसे देखने के दौरान आपके पेशेंस की परीक्षा होती है. मगर अपने आखिरी हिस्से में ये फिल्म सारा हिसाब चुकता कर देती है. उस बोन चिलिंग क्लाइमेक्स सीक्वेंस को आप अपने जहन से बाहर नहीं कर सकते. मगर वो इतना भयावह है कि आप उसे याद भी नहीं रखना चाहते. शूजीत सरकार एक ऐसे फिल्ममेकर हैं, जिनकी फिल्में आपके भीतर बदलाव की गुंजाइश पैदा करती हैं.
जालियांवाला बाग हत्याकांड से पहले रॉलैट एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन करते अमृतसर के लोग.
ये फिल्म तीन लोगों के कमिटमेंट की मिसाल है. सबसे पहले बात उस आदमी की, जिसकी कहानी को हमें दिखाई जा रही है. सरदार उधम सिंह. उधम सिंह जब 20 साल के थे, तब जालियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था. जिसमें हज़ारों लोगों की जानें गईं और न जाने कितने घायल हो गए. जो लोग उस घटना के वक्त जालियांवाला बाग में थे, उनके सिर्फ शरीर पर जख्म हुआ. मगर उधम सिंह भीतर से जख्मी हो गए. इस घटना ने उस इंसान में इतना कोयला भर दिया कि वो अगले 21 सालों तक बदले की आग में जलता रहा. उधम को ज़ाहिर तौर पर लोगों की मौत का बुरा लगा था. मगर उससे भी ज़्यादा बुरा उसे ये लगा था कि उसके देश में कोई बाहरवाला आया और उसने लोगों से बोलने की, प्रोटेस्ट करने की बुनियादी आज़ादी छीन ली. जो लोग उसके खिलाफ गए उन्हें गोलियों से भून दिया गया. सरदार उधम सिंह अपने कॉज़ को लेकर इतने कमिटेड थे कि उन्होंने माइकल ओ ड्वेयर को मारने के लिए 21 साल तक इंतज़ार किया.
इंडिया से लंदन जाने के बाद ड्वेयर को मारने की तैयारी की बात कहते सरदार उधम सिंह.
दूसरे शख्स हैं शूजीत सरकार. शूजीत एक बार अमृतसर गए हुए थे. वहां वो जालियांवाला बाग वगैरह घूमने गए. वहां के लोगों से कहानियां सुनीं. इसके बाद उन्होंने तय किया कि वो सरदार उधम सिंह की कहानी पर फिल्म बनाएंगे. अपना ये सपना लेकर वो दिल्ली से मुंबई आ गए. मगर परिस्थियां बहुत ठीक नहीं थीं. अपनी मनपसंद फिल्म बनाने की छूट नहीं थी. रिसोर्सेज़ नहीं थे. ऐसे में शूजीत ने अपने इस सपने को 20 साल तक पाला. उसकी सींचाई-निराई-गुणाई करते रहे. 7 फीचर लेंग्थ फिल्में बनाने के बाद उन्होंने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला. 'सरदार उधम' को देखते हुए लगता है कि शूजीत सरकार को जितना समय इस कहानी तक पहुंचने में लगा वो सार्थक हो गया. शायद वक्त ने उन्हें वो समझ बख्शी. क्राफ्ट पर इतना कमांड दिया. सरदार उधम सिंह के जीवन को और करीब से देखने और समझने का मौका दिया. इसके बाद जो फिल्म बनी, वो शूजीत के विज़न को लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रही. सरदार उधम सिंह ने कहा था- टेल पीपल आई वॉज़ अ रिवॉल्यूशनरी. शूजीत ने उस बात को बिना किसी लाग-लपेट के लोगों को तक पहुंचा दिया है.
माइकल ओ ड्वेयर. वो अंग्रेज ऑफिसर जिसने जनरल डायर को जालियांवाला बाग में प्रोटेस्ट करते हज़ारों लोगों के ऊपर गोली चलाने का ऑर्डर दिया.
इस कड़ी में तीसरे शख्स हैं विकी कौशल. विकी ने फिल्म में सरदार उधम सिंह का किरदार निभाया है. विकी ने सरदार उधम सिंह जैसे दिखने के लिए मेहनत नहीं की है. वो उनके जैसे सोचने और मसहूस करने में खर्च हुए हैं. किसी एक्टर को किसी कैरेक्टर में तब्दील करने के लिए आपको और क्या चाहिए. फिल्म के फाइनल एक्ट में एक सीन है, जहां उधम माइकल ओ ड्वेयर की मौत मामले की जांच कर रहे इंस्पेक्टर जॉन स्वेन को अपनी कहानी सुना रहा है. इस सीन में वो कहता है- वो इस बात को बिल्कुल ठंडे तरीके से कहता है. मानों ऐसा कुछ याद रहा हो, जिसे वो भूल जाना चाहता है. जब आप कोई फिल्म देख रहे होते हैं, तो आपका एक्टर से नहीं, उसके निभाए किरदार से एक कनेक्शन बनना ज़रूरी है. उस एक्टर की वही ज़िम्मेदारी है कि जो वो महसूस कर रहा है, वो आप तक बिना मिलावट के पहुंचे और उस पर आपको यकीन हो. विकी कौशल ने ये करके दिखा दिया है.
फिल्म के क्लाइमैक्स का एक सीन. इस सीन को देखकर आपको समझ नहीं आएगा कि रिएक्ट कैसे करें.
'सरदार उधम' एक ऐसी बायोग्राफिकल फिल्म है, जो इस जॉनर को अपनी समकालीन फिल्मों से बहुत आगे लेकर चली जाती है. इस फिल्म में जो कुछ भी घट रहा है, वो इतने रॉ और ऑरगैनिक तरीके से हो रहा है कि उसकी ऑथेंटिसिटी पर शक होने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमें बायोपिक्स के नाम पर मसालेदार सिनेमा देखने की आदत हो गई है. डायलॉगबाज़ी न हो, तो देशभक्ति वाली फील नहीं आती. रियल हीरो के वेश में रील हीरो, जब तक कुछ गुंडों को पीट न दे, कलेजे को ठंडक नहीं मिलती.
'सरदार उधम' पौने 3 घंटे लंबी फिल्म है. इसे देखने के दौरान आपके पेशेंस की परीक्षा होती है. मगर अपने आखिरी हिस्से में ये फिल्म सारा हिसाब चुकता कर देती है. उस बोन चिलिंग क्लाइमेक्स सीक्वेंस को आप अपने जहन से बाहर नहीं कर सकते. मगर वो इतना भयावह है कि आप उसे याद भी नहीं रखना चाहते. शूजीत सरकार एक ऐसे फिल्ममेकर हैं, जिनकी फिल्में आपके भीतर बदलाव की गुंजाइश पैदा करती हैं.
'सरदार उधम' को एमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम किया जा सकता है.

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