कास्टिंग काउच से रणवीर सिंह के 'धुरंधर' बनने की असली कहानी
2008 के आसपास रणवीर को चार फिल्में बतौर लीड मिलीं. पर रणवीर ने सब मना कर दीं.

इस बच्चे को जानते हैं? बहुत बड़ा स्टार बन गया है आजकल. भाई की फिलम ने हफ्ते भर में 1000 करोड़ टाप दिए हैं. कौन है? सही जवाब है. देख रहे होंगे ना स्क्रीन पर. रणवीर सिंह. धुरंधर से धुआं उठाने वाले रणवीर की आखिर कहानी क्या है? फिल्मों का रंग उन पर कैसे चढ़ा? फिल्मों में एंट्री का क्या किस्सा है? सब बताएंगे, थोड़ा सा नजदीक आइए. तो चलिए साब सुनाते हैं कहानी छोटू रणवीर से उनके बॉलीवुड डेब्यू तक की.

रणवीर बड़े फिल्मी बच्चे थे. जब उनके हमउम्र खेल रहे होते, ये फिल्में देखते. हमेशा से एक्टर बनना था. 'शहंशाह', 'तूफान', 'अजूबा', और 'लखन' बनना था. कोई गाल खींचकर पूछता : क्या बनोगे? वो कहते ये भी कोई पूछने की बात है, मैं हीरो बनूंगा. छोटे और "मोटे" से लड़के की बात को सब मज़ाक समझकर हवा में उड़ा देते. लेकिन उनकी दादी चांद बर्क, जो खुद एक एक्ट्रेस थीं, उन्हें इनकरेज करती. अमिताभ बच्चन की फैन दादी रणवीर को उनकी फिल्में दिखाती. और कहती : तुझे बड़ा होकर अमिताभ बच्चन बनना है. रणवीर स्कूल गए. प्लेज किए. ड्रामा किए. फिर स्कूल में एक दिन एडवर्टीजमेंट्स लिखने का कॉम्पटीशन हुआ. रणवीर ने न सिर्फ पार्टिसिपेट किया, बल्कि जीत भी गए. ऐड्स लिखने में मज़ा आने लगा. पता चला ऐसे भी लोग होते हैं, जिन्हें एडवर्टीजमेंट्स लिखने के पैसे मिलते हैं. सो आगे चलकर कुछ दिन के लिए इसे ही प्रोफेशन बना लिया. कॉपीराइटर की जॉब की.
पिता जगजीत सिंह भवनानी, जो बड़े बिजनेसमैन थे, चाहते थे कि उनका बेटा अमेरिका पढ़ने जाए. सो रणवीर गए भी. एडवरटाइजिंग की पढ़ाई करनी थी. पर जब इंडियाना यूनिवर्सिटी पहुंचे, तो सिर्फ एक सीट खाली थी और वो थी एक्टिंग की. मजबूरी में उसी कोर्स में एडमिशन लेना पड़ा. जब पहले दिन कुछ करके दिखाने को कहा गया है, तो अमेरिकन बच्चों के सामने बच्चन की 'दीवार' का एक मोनोलॉग पेश कर दिया : उफ़ तुम्हारे उसूल, तुम्हारे आदर्श... किस काम के हैं, तुम्हारे उसूल... किसी को कुछ समझ नहीं आया, पर सबने तालियां भरपूर बजाईं. अमेरिका में खूब सारा थिएटर किया. वहां से मन में हीरो बनने का सपना लिए मुंबई लौटे. उस वक़्त तक पिता की आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं रही थी. लेकिन रणवीर को हीरो तो बनाना था. पैसे चाहिए थे. इसलिए अपना बड़ा घर बेचकर छोटे घर में शिफ्ट होना पड़ा. कार बेचनी पड़ी. अब देखिए साहब वक़्त कैसी करवट लेता है. जिन फिल्मों में काम करवाने के लिए रणवीर के पिता को कार बेचनी पड़ी. आज उनका बेटा खुद उन फिल्मों का प्रोड्यूसर है और उसके पैसों से न जाने कितने लोगों ने अपने लिए कारें खरीद ली होंगी.
खैर छोड़िए, मतलब मैं ही छोड़ता हूं, अपनी कमेंट्री जो चालू कर दी. कहानी पर लौटते हैं. रणवीर ने अपना एक अच्छा-सा पोर्टफोलियो बनाया. चूंकि इंडस्ट्री में पहले से थोड़ी-बहुत जान-पहचान थी. प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स से मिलने लगे. इसी दौरान उनके साथ कास्टिंग काउच होते-होते बचा. रणवीर के एक स्ट्रगलर दोस्त ने ऐसे व्यक्ति का पता दिया, जो उन्हें काम दिला सकता था. रणवीर ने कॉल किया. उसने अंधेरी(मुंबई) मिलने बुलाया. वो गए. अंदर घुसते ही, दीवार पर अजीब तरह की पेंटिंग्स दिखीं. लिखा था : You will not win, If you don't give in. रणवीर को थोड़ा अजीब लगा. लेकिन उन्होंने इग्नोर किया. वो उस शख्स से मिले. अपना अच्छा-सा पोर्टफोलियो दिया, लेकिन उसने किनारे रख दिया. और अजीब तरह की बातें शुरू कर दीं. रणवीर असहज हो रहे थे. अंत में उस शख्स ने कहा, "बेटा हम कुछ करेंगे नहीं, बस तुम टच करने दो." रणवीर एकदम से सकपका गए. फिर वो शख्स बोला, "अच्छा ठीक है, नो टचिंग, सिर्फ दिखा दो मुझे." रणवीर ने घोर असहमति जताई और वहां से चले आए.
ये चैप्टर क्लोज हुआ. अपने दोस्त शाद अली से मिले. वो उस वक़्त तक अमिताभ बच्चन के साथ 'झूम बराबर झूम' बना चुके थे. अलग-अलग तरह के एडवरटीमेंट्स डायरेक्ट कर रहे थे. रणवीर ने गुज़ारिश की कि उन्हें अपना असिस्टेंट बना लें. शाद ने बना भी लिया. इसी दौरान शाद को 'बंटी और बबली' मिल गई. रणवीर ने बतौर असिस्टेंट इस फिल्म में भी काम किया. क्राउड कंट्रोल से लेकर कास्टिंग तक सब की. शायद 'धुरंधर' के सेट पर उनका यही असिस्टेंट डायरेक्टर बाहर आ जाता था, और वो क्राउड मैनेज करने लगते थे. रणवीर करीब डेढ़ साल शाद अली के असिस्टेंट रहे. एक दिन खुद को शीशे में देखा, काम कर-करके बुरा हाल था. नींद पूरी नहीं हुई थी. आंखें सूजी हुई थीं. उन्हें रियलाइज हुआ कि ये क्या हाल बना लिया है अपना! ऐसे तो मैं इसी में खप जाऊंगा. रणवीर ने फौरन असिस्टेंट डायरेक्टर की जॉब छोड़ी. आखिर हीरो जो बनना था.
डेढ़-दो साल से एक्टिंग एकदम छूटी हुई थी. इसलिए दोबारा से ट्रेनिंग लेने के बारे में सोचा. वेस्टर्न ड्रामा तो अमेरिका में सीखा ही था. ख्याल आया, अब थोड़ा देसी ड्रामा भी किया जाए. शाद अली के सुझाव पर नमित कपूर के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया. एक्टिंग सीखी. और ऐसा कमाल किया, कि उनके गुरु उन्हें अपना विवेकानंद कहने लगे. हालांकि अमेरिकन स्टाइल ऑफ एक्टिंग सीखकर आए लड़के को, वहां चीज़ें कुछ ज़्यादा ही लाउड और फ़िल्मी लग रही थीं. रणवीर कहते हैं, "मैंने शाद को फोन करके कहा कि मुझे जो कुछ अच्छा आता है, वो एक्टिंग भी खराब हो जाएगी." लिहाजा जल्द ही रणवीर ने ये एक्टिंग स्कूल छोड़ दिया.
इसके बाद पृथ्वी थियेटर में काम किया. मकरंद देशपांडे से सीखा. हालांकि शुरू में मकरंद, रणवीर की ऊर्जा से घबराते थे. वो उन्हें अवॉइड करते. रणवीर कहते हैं, "वो तो मुझे देखकर भाग ही जाते थे." धीरे-धीरे बैक स्टेज काम करके रणवीर ने अपनी जगह बनाई. पेंटिंग की. कारपेंटर बने. झाड़ू लगाया. पृथ्वी थिएटर में वो सब किया, जिसने उन्हें असल ज़िंदगी से रूबरू कराया. आखिरकार किसी नाटक में एक छोटा-सा रोल मिला. एक लाइन का डायलॉग होता. वो स्टेज पर जाकर दस-पंद्रह लाइन इंप्रोवाइज करके बोल देते. इसके बाद उन्हें नाटकों में और रोल मिलने लगे. ऐसे ही दुरुस्त दिशा में, लेकिन सुस्त रफ्तार में उनकी गाड़ी आगे बढ़ रही थी.
थिएटर करने के साथ ही वो ऑडीशन भी देते. सेलेक्ट भी होते. 2008 के आसपास तो चार फिल्में बतौर लीड मिलीं. पर रणवीर ने मना कर दीं. दरअसल वो ऑडिशन देते ज़रूर थे, पर सिर्फ खुद को टेस्ट करने के लिए. जब उन्हें रोल मिल जाता, वो इनकार कर देते. लोग उन्हें पागल कहते, कि जैसी थाली के लिए लोग तरसते हैं, रणवीर सामने आई हुई थाली को किनारे कर देते थे. उनको लगरहा था कि स्टार्ट ऐसा हो कि दुनिया देखे. 23-24 साल के लड़के के लिए ये बहुत बड़ा रिस्क था. अगर इतनी फिल्में मना करने के बाद उन्हें कोई बड़ा काम न मिलता! पर उस लड़के को खुद की प्रतिभा पर भरोसा था.सो उसने रिस्क लिया. और फिर वो दिन भी आया, जिसका उसे सालों से इंतज़ार था.
रणवीर की इंडस्ट्री में जान-पहचान तो अच्छी थी ही. वक़्त-बे-वक़्त इसका उन्हें फायदा भी मिला. उनके एक दोस्त थे अली अब्बास जफर, जिन्होंने आगे चलकर 'सुल्तान' बनाई. वो उस समय YRF में बतौर असिस्टेंट काम कर रहे थे. उन्हीं के जरिए रणवीर ने YRF में अपना पोर्टफोलियो पहुंचा दिया. YRF के वाइस प्रेसिडेंट को भी रणवीर जानते थे, उनको भी अपना पोर्टफोलियो दिया. अपनी एक और दोस्त सानु शर्मा, जो यशराज के लिए कास्टिंग करती थीं, उसने भी अपनी सिफारिश लगवाई. वो सबसे एक ही बात कहते, "मुझे बस ऑडिशन का मौका दिला दो, बाक़ी मैं देख लूंगा." पर कोई खास उम्मीद वहां से रणवीर थी नहीं. क्योंकि YRF तब तक सिर्फ बड़े स्टार्स के साथ ही फिल्में बनाता था. लेकिन जहां उम्मीद नहीं होती, शायद रास्ता वहीं से निकलता है.
रणवीर डेट पर थे. सानू शर्मा कॉल पर कॉल किए जा रही थीं. सात मिस्ड कॉल थीं. रणवीर इग्नोर कर रहे थे. फिर टेक्स्ट मैसेज आया. उसमें लिखा था आदित्य चोपड़ा. रणवीर उछल पड़े. उन्होंने झट से सानू को फोन मिलाया. पता चला, YRF को एक नए चेहरे की तलाश है. रणवीर से YRF के इन-हाउस कास्टिंग डिवीजन में ऑडिशन देने को कहा गया. वो कहते हैं, "मुझे पता था, मैं जो मौका ढूंढ़ रहा था, वो यही है." रणवीर ने जाकर ऑडिशन दिया, और उन्हें फिल्म मिली 'बैंड बाजा बारात'.
फिल्म चली. रणवीर रातोंरात स्टार बन गए. कमाल ये है कि जिस YRF ने उन्हें स्टार बनाया. उसके साथ 'बैंड बाजा बारात' के बाद उन्होंने चार और फिल्में कीं और चारों फ्लॉप रहीं. दोनों का लास्ट कोलैब था 'बेफिक्रे'. इसे खुद आदित्य चोपड़ा ने डायरेक्ट किया. फिल्म बुरी तरह पिट गई. इसके बाद YRF ने रणवीर के साथ कोई पिक्चर नहीं की. उल्टे 'धुरंधर' से रणवीर ने यशराज की सबसे बड़ी फ्रेंचाइज की कमर तोड़ दी. YRF स्पाय यूनिवर्स की फिल्मों की ट्रोलिंग से सोशल मीडिया पटा पड़ा है. 'धुरंधर' मील का पत्थर है. अब स्पाय फिल्मों को ऐसे काउंट किया जाएगा, प्री धुरंधर स्पाय फिल्में और पोस्ट धुरंधर स्पाय फिल्में.
खैर, ये कहानी यहीं खत्म करते हैं. बाकी की कहानी फिर कभी. बताइएगा कमेंट बॉक्स में कैसी लगी ये कहानी. और कोई किस्सा किसी का किस्सा सुनने की फरमाइश हो, वो भी बताइएगा. अभी चलते हैं. शुक्रिया.
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