फिल्म रिव्यू: फेमस
चंबल पर बनी वो फिल्म जिसमें केके मेनन, जिमी शेरगिल, पंकज त्रिपाठी जैसे कद्दावर एक्टर्स हैं.
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'फेमस' के डायरेक्टर तिग्मांशु धुलिया के असिस्टेंट रह चुके हैं.
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"चंबल की दो चीज़ें खास हैं, एक तेवर और दूसरी बंदूक. चमचमाती बंदूक से निकली गोली पावर देती है. और इस पावर से आदमी बनता 'फेमस'."इस डायलॉग से शुरू होती है फिल्म 'फेमस'. आप जो सोच रहे हैं ये वो Famous नहीं, ये Phamous है. चार लोगों की कहानी में से फिल्म के टाइटल को सिर्फ एक कैरेक्टर रिप्रेजेंट करता है. कड़क सिंह नाम है. प्ले किया है के के मेनन ने. इनको बंदूक से बेइंतेहा मोहब्बत है. ज़ुबान कम और बंदूक ज़्यादा चलाने में विश्वास रखते हैं. सपना है जीवन में टॉपगन बनने का. जैसे मुंबई में भाई होते हैं, दिल्ली में बाप होते हैं, वैसे ही चंबल में 'धाकड़' होते हैं. ये वही हैं. धाकड़ का मतलब फिल्म में कुछ ऐसे समझाया गया है कि फिल्म का टाइटल जस्टिफाई हो जाए.
इनके पहले इलाके के धाकड़ हुआ करते थे शंभू. माने जैकी श्रॉफ. जग्गू दादा ने '102 नॉट आउट' के बाबूलाल वखारिया की तरह अपनी उम्र स्वीकार की है और उसी तरह के किरदार करने लगे हैं. इनकी एक बेटी हुआ करती थी. अब नहीं है. शुरुआत में इरिटेट करने वाले और फिल्म को प्रेडिक्टेबल बनाने वाले नैरेशन को छोड़कर, वो किसी स्पॉयलरवश पूरी फिल्म जेल में रहे हैं. लौटते हैं आखिरी के दस मिनट में और फिल्म के एंड को बेहतर करने में कोई मदद नहीं करते.
दो और कैरेक्टर हैं. एक हैं पंकज त्रिपाठी जिन्हें सेक्स की भयानक वाली भूख है. मतलब नॉर्मल से बहुत ज़्यादा. आधी फिल्म उनके चक्कर में खिंचती है. लेकिन उनका कैरेक्टर बड़े इंट्रेस्टिंग तरीके से लिखा हुआ है. दूसरे हैं जिमी शेरगिल. वो एक ऐसे पति हैं, जो अपनी पत्नी के बुरे अतीत को जानते हुए भी बहुत प्यार करते हैं. ये चारों कैरेक्टर अलग-अलग वजहों से शुरुआत से ही आपस में जुडे़ हैं. सबकी अपनी-अपनी कहानी चल रही है लेकिन इन सबकी लाइफ आपस में लगातार टकराती रहती. इसी टक्कर से पूरी फिल्म घुटनों के बल घिसटती हुई आगे बढ़ती है.
एक और कैरेक्टर है श्रिया सरन का. वो फिल्म जिमी शेरगिल की पत्नी बनी है. फिल्म का बैकग्राउंड है चंबल. भाषा बोली जा रही है बुंदेलखंडी या बीहड़ वाली. अब श्रिया पहले ही साउथ की इंडस्ट्री में काफी काम कर चुकी हैं. बमुश्किल तीन एक हिन्दी फिल्मों में काम किया है. उनकी भाषा में दिक्कत होना ऑब्वियस है, लेकिन ये चीज़ खुले में इसलिए आ जाती है क्योंकि उनके साथी कलाकारों ने वो टोन पकड़ा हुआ है. फिल्म में श्रिया का रोल जरूरी है लेकिन उनके पाले में करने को कुछ नहीं है. 'फेमस' में काम करना उनके लिए एक अलग तरह का एक्सपीरियंस होगा क्योंकि ऐसा कुछ उन्होंने पहले कभी ट्राय नहीं किया है.
फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो आपको चौंका दे. इसकी वजह ये हो सकती है कि ये फिल्म पिछले काफी समय से अटकी हुई है. जब ये बन रही थी तब इरफान की 'पान सिंह तोमर' जैसी फिल्मों के आए कुछ दिन हुए थे. एक जगह फिल्म में 'पान सिंह...' का जिक्र भी आता है. जब पंकज त्रिपाठी बताते हैं कि उसकी शूटिंग चंबल में ही हुई थी, इलाके पांच-छह मोड़ों ने फिल्म में काम भी किया था. उस समय से हमें लगातार उस बैकग्राउंड में बनी फिल्में देखने को मिलती रही हैं. इसीलिए 'फेमस' को देखकर कुछ नया सा नहीं लगता है. एक दिक्कत ये भी है कि आप कभी खुद को फिल्म में घुसे हुए नहीं पाते हैं. ऐसा लगता है कोई अनमने ढंग से कहानी सुना रहा है और आप बाहर खड़े सुन रहे हैं.
अगर एक्टिंग की बात की जाए तो पंकज त्रिपाठी डिस्टिंक्शन से पास हैं. उनके भोजपुरी एक्सेंट लिए बुंदेलखंडी में बात करने के अंदाज से ही मज़ा आ जाता है. उनके ही चक्कर में सारा गड़बड़झाला हो रहा है और वही फिल्म का ग्रे शेड भी मेंटेन किए हुए हैं. काम सबके पास कायदे का है, परफॉर्म सब कर रहे हैं. लेकिन इससे फायदा सीन को होता है, फिल्म को नहीं. डायलॉग्स एकदम ठेठ भाषा में है. चंबल लगने-दिखने का भार लिए. जैसे एक जगह केके मेनन अपने एक क्लाइंट से बात करते हुए कहते हैं :
"चंबल की खून में ना नमक कमी है, ना आयोडिन की."इस फिल्म को डायरेक्ट किया है करण ललित भूटानी ने. करण कई फिल्मों में तिग्मांशु धूलिया को असिस्ट कर चुके हैं. और उनके डायलॉग्स में ये चीज़ दिखती है. इसलिए ऐसा बहुत सारा माल-मसाला फिल्म में आपको मिल जाएगा. फिल्म शुरू होती है चंबल की राजनीति से. सत्ता का गलत इस्तेमाल और क्राइम जैसी चीज़ें दिखाने के बाद फिल्म एक टाइम लैप्स ले लेती है. इस टाइम लैप्स के बाद जिमी शेरगिल 12 साल से 25 साल के हो जाते हैं, लेकिन केके मेनन जैसे उनके बचपन में दिखते थे, अब भी वैसे ही दिखते हैं. कोई बदलाव नहीं. बस थोड़े और रईस हो गए हैं.
फिल्म के साथ ये समस्या पेश आती है कि जैसे ही किसी कैरेक्टर से कनेक्ट करने की कोशिश करते हैं, फिल्म का फोकस अगले किरदार पर शिफ्ट हो जाता है. कुछ सीन बाद आपका सामना फिर से पिछले किरदार से होता है लेकिन आप कनेक्ट करने की कोशिश ही नहीं करते. इसी धर-पकड़ में ये फिल्म चलती रहती है और फिर एकदम प्रेडिक्टेबल तरीके से खत्म जाती है. खत्म होने के पहले पूरी फिल्म में दबे-दबे से लगे जिमी शेरगिल का एक डायलॉग सुनने को मिलता है. अपनी पत्नी को विलेन से बचाने के बाद वो कहते हैं :
"जब तक ख़ुद की सीता का हरण नहीं होता, कोई आदमी राम नहीं बनता."'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का भी एक डायलॉग रीमेक किया गया है. जिमी शेरगिल एक एक्टर को मारते हुए कहते हैं:
"तुमको मारेंगे नहीं, किस्सा बना देंगे."मतलब ऐसे एक-दो और हैं, वो जाके सुन लीजिएगा. फिल्म का म्यूज़िक वाला पार्ट सबसे संतुलित है. ज़्यादा गाने नहीं हैं. जो हैं वो रेगुलर फिल्मों की तरह हैं. जैसे एक रोमैंटिक सॉन्ग है. वो जिमी और उनकी पत्नी के बीच का प्यार समझाने के लिए प्ले होता है. बाकी के कुछ लोकल भाषा के गाने हैं, जो हमारे किरदारों के आसपास शादियों या किसी फंक्शन में बजते हैं. म्यूज़िक और एक्टिंग के अलावा ये फिल्म हर लेवल पर खटकती है. तमाम उठा-पटक के बावजूद चंबल पर बेस्ड ये फिल्म आपको इतना बागी नहीं बना पाती कि आप अपने वीकेंड के तीन अनमोल घंटे इसके लिए जाया करें.
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