फिल्म रिव्यू- पेद्दी
राम चरण और जाह्नवी कपूर की नई फिल्म 'पेद्दी' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

फिल्म- पेद्दी
डायरेक्टर- बुची बाबू साना
एक्टर्स- राम चरण, जाह्नवी कपूर, बोमन ईरानी, दिव्येंदु, जगपति बाबू, शिव राजकुमार, रवि किशन
रेटिंग- 2.5 स्टार्स
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फर्ज़ करिए एक महिला अपने कमरे में है. बत्ती गुल है. एक आदमी आता है और उसे चूमकर भाग जाता है. ये राम चरण की नई फिल्म 'पेद्दी' का एक सीन है. और 'वो आदमी' खुद राम चरण हैं. इस सीन का बिल्ड-अप अपने आप में इतना फूहड़ है कि आप उसके नॉर्मलाइजेशन से घबरा जाते हैं. सनद रहे कि 'पेद्दी' एक स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म है. इसमें पेद्दी नाम का लड़का अपनी और अपने लोगों की पहचान के लिए लड़ रहा है. क्योंकि उसकी कम्युनिटी आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझ रही है. मजदूरों का एक जत्था आंध्र प्रदेश के गन्ने के खेतों में काम करते हैं. नाक में नीचे की ओर एक बाली पहनते हैं. अपने परिवार समेत वो पास की एक पहाड़ी पर रहते हैं. जहां तक पहुंचने का कोई ज़रिया नहीं है. कोई ट्रांसपोर्टेशन नहीं. जहां ट्रेन से आधे घंटे में पहुंचा जा सकता है, वहां पहुंचने में इन लोगों को दिनभर का वक्त लगता है. ट्रेन वहां से गुज़रती है. मगर रुकती नहीं. तिस पर उस गांव का कोई नाम नहीं है. न ही वहां रहने वाले लोगों के पास कोई डेमोक्रेटिक राइट्स हैं. क्योंकि वो गांव भारत के नक्शे पर है ही नहीं. इस गांव का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति सुरी 32 सालों से इसके लिए लड़ रहा है. नेताओं-मंत्रालयों के चक्कर काटकर आज तक नहीं थका. मगर नेताओं को इस गांव से कोई लेना-देना नहीं है. क्योंकि इन लोगों के पास वोटिंग राइट्स ही नहीं हैं.
'पेद्दी' की बुनियाद इतनी मजबूत है. मगर इमारत बनी है बालू से. जो कभी अपने बूते खड़ी ही नहीं हो पाती. कब ढह जाए, इसका डर हमेशा लगा रहता है. क्योंकि कहानी उलझी है महिलाओं के सेक्शुअलाइजेशन में. पेद्दी, अचियम्मा नाम की लड़की को पहली बार देखता है. कैमरा बताता है कि वो उसकी छाती, पीठ और कमर पर ही ताकता रहता है. बाद में पेद्दी खुद भी कहता है कि वो अचियम्मा को उसके चेहरे से नहीं, उसकी बॉडी से पहचानता है. पहचानने से याद आया. अचियम्मा एक ऊंची जाति के पावरफुल नेता की बिटिया है. वो अपने पिता के लिए स्ट्रैटेजी बना रही है. कैंपेनिंग कर रही है.
अब फिल्म का एक और सीन बताते हैं आपको. एक बार अचियम्मा अपने पिता को सपोर्ट करने के लिए रैली करती है. विरोधी पार्टी के गुर्गों को लगता है कि इससे चुनाव में अचियम्मा के पिता का पक्ष मजबूत हो जाएगा. इसलिए वो लोग उसे स्टेज पर शेम करने की कोशिश करते हैं. ये देखकर पेद्दी नाराज़ हो जाता है. उन लड़कों को पुष्ट मार मारता है. क्योंकि वो एक महिला को उसकी परमिशन के बिना छू रहे थे. बद्तमीज़ी कर रहे थे. कौन हीरो है? कौन विलन है? यहां वो लकीर इतनी धुंधली है कि उसके पीछे छुपा विरोधाभास दिखाई देने लगता है. ज़ाहिर तौर पर तार्किकता इस फिल्म का मजबूत पक्ष नहीं है.
मगर दिलचस्प बात है कि इतनी घटिया शुरुआत के बावजूद ये उतनी बुरी फिल्म नहीं है. मैं ये पुख्ते तौर पर कह सकता हूं क्योंकि मैंने राम चरण की पिछली फिल्म 'गेम चेंजर' देखी है. 'पेद्दी' हमेशा से वही कहानी बनना चाहती थी, जिसकी जड़ में जातिवाद और काफी हद तक क्षेत्रवाद है. मगर आपके पास एक ऐसी ऑडियंस है, जिसे थिएटर्स तक लाकर ढंग की चीज़ दिखाने के लिए जाह्नवी कपूर और श्रुति हासन की बलि चढ़ानी पड़ती है.
फर्स्ट हाफ में अपनी भद्द पिटवाने के बाद 'पेद्दी' सेकंड हाफ में वो फिल्म बन पाती है, जो ये बनना चाहती थी. पेद्दी गुड़ बनाने की फैक्ट्री में काम करता है. मगर तगड़ा क्रिकेटर है. थोड़े एक्स्ट्रा पैसे कमाने के लिए वो क्रिकेट खेलता है. जैसे 'भाग मिल्खा भाग' में मिल्खा का किरदार इसलिए दौड़ना शुरू करता है क्योंकि उसका कोच बताता है कि दौड़ने वालों को दूध मिलेगा. मगर बीतते समय के साथ उन्हें अपने मक़सद का एहसास होता है. कमोबेश वही यात्रा पेद्दी भी तय करता है. उसे समझ आता है कि अपने गांव और लोगों को जो पहचान वो दिलाना चाहता है उसमें क्रिकेट टीम के 11 या 21 लोग उसकी मदद नहीं करेंगे. क्योंकि उन्होंने अब तक उनका रास्ता रोक रखा है.
इसलिए वो क्रिकेट छोड़कर अखाड़े में उतरता है. पहलवानी करने. मगर समस्या ये है कि वो जिस काम में हाथ डालता, उसमें वो बेस्ट हो जाता है. अगर आप किसी ऐसे आदमी की कहानी दिखाना चाहते हैं कि जो नीचे से उठकर ऊपर आता है. तो उसमें कुछ इंसानी गुण होने चाहिए. पेद्दी सुपरहीरो है. तेलुगु सिनेमा में हीरो वर्शिपिंग वाला कॉन्सेप्ट राम चरण का अच्छा-खासा कैरेक्टर आर्क खा जाता है. आप उस आदमी से कभी रिलेट ही नहीं कर पाते. उल्टे सेल्फ डाउट में चले जाते हैं. राम चरण की परफॉरमेंस को फिल्म की सबसे मजबूत बातों में से एक माना जा सकता है. एक मेनस्ट्रीम फिल्म में एक सुपरस्टार से जो उम्मीद की जाती है, वो लेवल का परफॉरमेंस देते हैं. डांस और एक्शन सीक्वेंस में उनकी उनकी मेहनत आपको हैरान करती है.
ओवर द टॉप होना इस फिल्म की दूसरी सबसे बड़ी खामी है. सेक्शुअलाइजेशन अब भी टॉप पर है. ख़ैर, फिल्म के आखिर में एक सीक्वेंस है. जहां पेद्दी वो बात कह रहा है, जो कहने के लिए वो यहां तक आया था. इस दौरान वो पोडियम पर सबसे पहले अपनी ऊंगली से अंगूठी निकालकर अपनी नाक में बाली की तरह पहनता है. जो कि उसकी कम्युनिटी की पहचान का हिस्सा है. ये फिल्म का सबसे सुंदर दृश्य है, जो आपको पहली बार कुछ फील करवाती है. यहां जो बातें वो कहता है, वो बड़े सधे हुए तरीके से लिखी हुई हैं. फिल्म का एक हिस्सा दिल्ली में शूट किया गया है. चूंकी ये फिल्म 90 के दशक में सेट है. इसलिए फिल्म में जो दिल्ली दिखती है, वो ऑथेंटिक लगती है. फिल्म को टेक्निकल डिपार्टमेंट्स का काम जबरदस्त है. जिस तरह से तीन पहलवानों वाले सीक्वेंस शूट किए हैं, वो कमाल लगता है. और अगर आप थोड़ा सा समय लेकर सोचें या किसी से डिस्कस करें, तो आपको उसके पीछे की मेहनत समझ आती है.
'पेद्दी' एक अच्छी फिल्म होने के बहुत करीब पहुंचती है. मगर इसकी खामियों का पलड़ा इतना भारी है कि इसे अच्छी फिल्म कहकर डिफेंड नहीं किया जा सकता. अगर हम हीरो को भगवान दिखाना थोड़ा कम कर दें, महिलाओं को इंसान समझना शुरू कर दें, और डायरेक्टर को अपने तरीके से अपनी बात कहने का अधिकार दे दें, तो हमारे सिनेमा में आमूलचूल बदलाव आ सकता है. 'पेद्दी' इन तीनों ही मामलों में पिद्दी साबित होती है.
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