फिल्म रिव्यू- पति पत्नी और वो दो
आयुष्मान खुराना, सारा अली खान, वामिका गब्बी और रकुलप्रीत की नई फिल्म 'पति पत्नी और वो दो' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

फिल्म- पति पत्नी और वो दो
डायरेक्टर- मुदस्सर अजीज़
एक्टर्स- आयुष्मान खुराना, सारा अली खान, रकुलप्रीत सिंह, वामिका गब्बी, तिग्मांशु धूलिया, आयशा रज़ा मिश्रा, विजय राज, दीपिका अमीन
रेटिंग- 2 स्टार
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'पति पत्नी और वो दो' में एक सीन है. फिल्म का नायक प्रजापति पांडे प्रयागराज में फॉरेस्ट ऑफिसर है. उसका एक बॉस है. उस पात्र को ऐसे रचा गया है, जिससे आपको चिढ़ और घिन दोनों आती है. वो आदमी अपने मातहतों को परेशान करता है. उनकी पत्नियों पर घटिया टिप्पणियां करता है. उसकी सबसे खास कैरेक्टरस्टिक ये है कि वो हमेशा अपनी उंगली से नाक साफ करता रहता है. जब उससे कोई मिलने आता है, तो उसी गंदे हाथ से वो हाथ मिला लेता है. एक मौके पर उसका चपरासी चाय लेकर आता है. मगर बॉस अपने गंदे हाथों से भी उससे हैंडशेक नहीं करता. क्योंकि वो ट्रांसजेंडर कम्युनिटी से बिलॉन्ग करता है. ये बात उसकी देहभाषा में नज़र आती है. सुंदर बात ये है कि वो आदमी अपनी यौन उन्मुखता को लेकर असहज या अपोलोजेटिक नहीं है. वो जो है सबके सामने है. वो समाज के उस तबके से आता है, जो आर्थिक रूप से संपन्न नहीं है. देश के जिस हिस्से में वो रहता है, वहां उसे अपनी सेक्शुएलिटी की वजह से उपेक्षा का सामना करना पड़ता है. बावजूद इसके वो वही होना चुनता है, जो वो है. ये दोनों किरदार एक-दूसरे से बिल्कुल अलहदा हैं. जो इस फिल्म में जक्सटापोजिशन का काम करते हैं. ये मुझे इस फिल्म की सबसे खूबसूरत बात लगी. मगर ये इस फिल्म की शायद इकलौती चीज़ है, जो मुझे पसंद आई.
कोविड से पहले पब्लिक का सोचने-समझने-हंसने और एंटरटेन होने का तरीका बिल्कुल अलग था. उससे जैसा कि आज है. ये बात जिन्हें समझ आई, वो फल रहे हैं. बाकी फूल रह गए. प्री-कोविड आप आयुष्मान खुराना को एक स्मॉल टाउन सेट-अप में डाल दीजिए. काम हो जाता था. मगर अब आपको एफर्ट्स डालने पड़ते हैं. किसी फिल्म को वैसा बनाने में जो जनता देख और पसंद कर सके. या ऐसी फिल्म बनाने में जैसी आप बनाना चाहते हैं. तीसरा तरीका है अपनी आवाज़ को बाज़ार के हवाले कर देना. 'पति पत्नी और वो दो' तीसरे किस्म की फिल्म है.
हिंदी सिनेमा में सोशल-कॉमेडी नाम की एक लहर उठी थी. जो पैरलेल सिनेमा वाले विषयों को मुख्यधारा में लेकर आई. आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव जैसे एक्टर्स उसके मेजर प्रोपोनेंट रहे. राजकुमार इन सोशियो-कॉमेडी फिल्मों के साथ दूसरे किस्म का प्रयोगधर्मी सिनेमा भी करते रहे. उनकी फिल्मोग्रफी इसकी साक्षात गवाह है. मगर आयुष्मान अब भी उससे बाहर नहीं निकल पा रहे. ये वही आदमी है, जो बदलाव के दौर से गुज़र रही हिंदी सिनेमा का पोस्टर बॉय हुआ करता था. जब आप देखते हो कि एक आदमी हाथ में डब्बी लिए खड़ा स्पर्म डोनेशन की बात कर रहा है. या एक नौजवान लड़का है, जिसके माता-पिता प्रेग्नेंट हैं. और वो इस चीज़ को एक्सेप्ट करने की यात्रा पर निकलता है. वो अपने पैरेंट्स को पेडेस्टल से उताकर एक इंसान के तौर पर देखने की कोशिश कर रहा है. मगर ट्रांजिशन का जो वो फेज था, वो अब पूरा हो चुका है. या किसी दूसरी दिशा में बढ़ चला है. आयुष्मान वहीं खड़े हैं. करियर के इस पड़ाव पर वही चीज़ उनके के लिए अभिषाप बन गई है. जो सिनेमा एक वक्त पर क्रांति का सूचक हुआ करता था, आज वो फॉर्मूला में तब्दील हो गया है. फिल्ममेकिंग की वो विधा भी इस वक्त डाइल्यूशन के कगार पर खड़ी है. आयुष्मान की पिछली फिल्म जिसमें उन्होंने नया करने की कोशिश की थी, वो थी 'द एक्शन हीरो'.
बहरहाल, 'पति पत्नी और वो दो' उसी गली से निकली एक लद्धड़ किस्म की फिल्म है. क्योंकि ये सारी गलतियां करने के बाद सॉरी बोलकर आगे बढ़ जाना चाहती है. क्योंकि कोई क्या ही कर लेगा. ये तो कॉमेडी फिल्म है. आप हर फिल्म से समाज में बदलाव लाने की उम्मीद नहीं कर सकते. सिनेमा सिर्फ समाज का आइना नहीं है. वास्तविकता से एस्केप भी है. अमूमन आपको इस तरह के जस्टिफिकेशन मिलते हैं. और अगर फिल्म ने पैसे कमा लिए, तो फिर आपसे जस्टिफिकेशन की उम्मीद भी नहीं की जाती.
ख़ैर, 'पति पत्नी और वो दो' एक आदमी की कहानी है. नाम है प्रजापति पांडे. प्रयागराज में फॉरेस्ट ऑफिसर हैं. उनकी शादीशुदा ज़िंदगी बढ़िया चल रही थी. पत्नी एक रिपोर्टर हैं. एक दोस्त कम कलीग हैं, जो उनके साथ काम करती हैं. अचानक से उनके जीवन में उनकी कॉलेज फ्रेंड चंचल कुमारी की एंट्री होती है. चंचल बनारस के एक MLA के बेटे से प्रेम करती हैं. उनसे शादी करना चाहती हैं. मगर वो इंटरकास्ट शादी है. इसलिए MLA साहब नहीं मान रहे. क्योंकि वो अपने बेटे को भी राजनीति में ही आगे बढ़ाना चाहते हैं. क्योंकि ये वेल पेइंग फैमिली बिजनेस है. अब आप समझ गए चुके हैं कि पति-पत्नी के अलावा 'वो दो' कौन हैं, और ये कहानी किस ओर जा रही है.
ये फिल्म एंटरटेनमेंट के नाम पर हर वो चीज़ करती है, जो तकरीबन प्रॉब्लमैटिक है. इसमें कास्टिज्म, जेंडर इन-इक्वॉलिटी, धर्म के नाम पर स्टीरियोटाइप करना और डबल मीनिंग जोक्स शामिल है. और ये सब करने के साथ अनफनी बने रहना इसकी सबसे बड़ी यूएसपी है. आयुष्मान खुराना ने इतने यूपी-बिहार वाले किरदार कर लिए हैं कि उनके लिए इस फिल्म में काम करना सबसे आसान था. मगर ये फिल्म उनके करियर के टॉप 3 खराब परफॉरमेंसेज़ में शामिल होगी. इतना ओवर-द-टॉप पोट्रेयल और डायलॉग डिलीवरी उन्होंने शायद इससे पहले कभी नहीं की. रकुलप्रीत शुरुआत में यूपी वाला एक्सेंट पकड़ती हैं, फिर भूल जाती हैं. सारा अली खान की लिमिटेड रेंज वाली राय ये फिल्म और पुख्ता करती है. वामिका गब्बी और तिग्मांशू धूलिया, दो ही लोग इस फिल्म में ऐसे हैं, जिन्हें ये मालूम है कि उन्हें क्या करना है. खासकर फिल्म के क्लाइमैक्स में वामिका जिस तरह से आयुष्मान के किरदार को झिड़कती हैं, वो मुझे परफॉरेमंस के लिहाज से इस फिल्म का सबसे अच्छा और एंटरटेनिंग बिट लगा.
'पति पत्नी और वो दो' एक ऐसी फिल्म है, जिसके पास आवाज़ तो है. मगर ये नहीं मालूम कि कहना क्या है. क्राफ्ट के लिहाज से भी कमजोर फिल्म लगती है. जोक्स लैंड नहीं करते. फिल्म के अधिकतर गाने पुराने गानों के रीमेक्स हैं. इन गानों में आप पाएंगे कि इन्हें एक ही स्टूडियो में ऑलमोस्ट एक ही लोकेशन पर थोड़े-बहुत बदलाव के साथ शूट किया गया है. इसलिए विजुअली रिच नहीं लगती. ओरिजिनैलिटी इसका मुख्य गुण नहीं है. आप 'हैप्पी भाग जाएगी' वाले मुदस्सर अजीज़ को मिस करते हैं. मगर ये बोरिंग फिल्म नहीं है. एक वर्ग विशेष को ये फिल्म पसंद आ सकती है. मगर ये सबके लिए नहीं है.
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