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फिल्म रिव्यू- ओ रोमियो

विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर की नई फिल्म 'ओ रोमियो' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

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'ओ रोमियो' विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर की एक साथ चौथी फिल्म है.
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श्वेतांक
13 फ़रवरी 2026 (पब्लिश्ड: 09:13 PM IST)
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फिल्म- ओ रोमियो 
डायरेक्टर- विशाल भारद्वाज 
एक्टर्स- शाहिद कपूर, तृप्ति डिमरी, नाना पाटेकर, अविनाश तिवारी, फरीदा जलाल, तमन्ना भाटिया, दिशा पाटनी, अरुणा ईरानी, हुसैन दलाल
रेटिंग- 3 स्टार 

***

सन 1995. बंबई. जलाल नाम का एक डॉन अपने स्टाफ महबूब की हत्या करवा देता है. क्योंकि महबूब उसकी नौकरी छोड़कर गृहस्थी में प्रवेश करना चाहता है. ये बात जब उसकी बेवा अफ्शां को मालूम चलती है, तो वो इस हत्या में शामिल चार लोगों से बदला लेने का ठानती है. इसके लिए वो पहुंचती है जलाल के दुश्मन और गैंगस्टर उस्तरा के पास. पहले तो उस्तरा उसकी इस मांग को मज़ाक बताकर खारिज कर देता है. मगर अंतत: इसके लिए उसे मानना पड़ता है. अब ये लोग कैसे जलाल तक पहुंचकर उसकी हत्या करते हैं, ये आपको फिल्म में देखने को मिलता है.

ये फिल्म हुसैन ज़ैदी की किताब 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई' के एक चैप्टर पर आधारित है. जिसमें हुसैन उस्तरा नाम के गैंगस्टर और सपना दीदी की असल कहानी बताई गई है. मगर फिल्म भरपूर क्रिएटिव और सिनेमैटिक लिबर्टी लेते हुए इस कहानी को अपने तरीके से बताती है. 'गंगूबाई काठियावाड़ी' के बाद हाल के दिनों में ये दूसरा मौका है, जब 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई' के दूसरे चैप्टर से प्रेरित होकर कोई फिल्म बनाई गई है. इस बार ये जहमत उठाया है विशाल भारद्वाज ने. ये उनके करियर की सबसे मासी फिल्म है. जो बेहद कलरफुल है. वॉयलेंट है. और बड़े चटकारे के साथ बनाई गई है. इस फिल्म को देखते हुए लगता है कि विशाल अपने क्राफ्ट के साथ प्रयोग करने के साथ-साथ अपने काम को एंजॉय करना चाहते थे. इसलिए ये गंभीर कहानी पर बनी फन फिल्म है.

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मेरे लिए ये इम्प्रेसिव फिल्म है. क्योंकि विशाल यहां कुछ ऐसा करने की कोशिश करते हैं, जो उन्होंने शायद अब तक नहीं किया था. उन्हें हमेशा सीरियस सिनेमा बनाने वाले एक फिल्मकार के तौर पर देखा जाता था. उनसे कभी सिर्फ ऐसी फिल्म की उम्मीद नहीं की जाती, जिसका मक़सद सिर्फ एंटरटेनमेंट हो. उन्हें उसी खांचे में कैद कर दिया गया. उनसे बार-बार एक की तरह की फिल्म बनाने की उम्मीद की जाने लगी. 'ओ रोमियो' उन्हें उस छवि से आज़ाद करती है. यही इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत है.

अब इस मसले पर आते हैं कि 'ओ रोमियो' फिल्म कैसी है. मेरी राय में ये एक जायकेदार फिल्म है. रियल घटनाओं से प्रेरित मगर वास्तविकता से कोसों दूर. गोलियों और गालियों से लबरेज. मगर ये उसकी खासियत नहीं है. ये रिवेंज ड्रामा की खाल में एक लव स्टोरी है. जो अपनी पोशाक को अपनी पर्सनैलिटी नहीं बनाती. जिस दुनिया में ये कहानी घटती है, उसमें हिंसा के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है. मगर 'ओ रोमियो' हिंसा को रोमैंटिसाइज़ नहीं करती. फिल्म में एक सीन है, जब अफ्शां उस्तरा से बंदूक मांगती है. उस्तरा उसे बंदूक के साथ एक मशविरा भी देता है. वो कहता है- "एक बार वो लकीर पार हो गई, तो अंदर हमेशा के लिए एक हैवान पैदा हो जाता है."

इसलिए वो अफ्शां के बदले को अपना पर्पस बना लेता है. वो नहीं चाहता कि जो मॉनस्टर वो है, अफ्शां भी वैसी हो जाए. मगर इसमें सिर्फ उसकी भलमनसाहत ही नहीं, अफ्शां के प्रति उसका प्रेम भी है. वो एक ऐसी लड़ाई मोल लेता है, जो शायद वो जीत नहीं पाएगा. और ये लड़ाई जलाल के साथ नहीं, उसके खुद के साथ है. वो एक ऐसी लड़की के प्रेम में पड़ गया है, जो उससे कभी प्रेम नहीं कर पाएगी. फिल्म में इसे बड़े पोएटिक ढंग से एक्सप्रेस किया गया. जब अफ्शां को उस्तरा की फीलिंग मालूम चलती है, तो वो कहती है-  “मोहब्बत एक बद्दुआ है, जो मुझे भी लगी है और आपको भी."

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'ओ रोमियो' पर अपने दौर की छाप नज़र आती है. जिस किस्म का खून-खच्चर से भरपूर एक्शन इस फिल्म में है, वो हमने पिछले दिनों कई फिल्मों में देखा है. मगर ये एक्शन सीक्वेंस बड़े स्टाइलिश और स्लीक हैं. मगर उनकी बहुतायत मज़ा कम करती है. दो और ऐसी चीज़ें हैं, जो आपको फिल्म में खलती हैं. और वही 'ओ रोमियो' को फिल्म नहीं बनने देतीं, तो विशाल बनाने निकले थे.

अव्वल, तो फिल्म का विलन जलाल. जो कि वैसे तो दाउस इब्राहिम से प्रेरित है. मगर ये फैन्सी विलन है. स्पेन में रहता है. बुलफाइटिंग करता है. मगर जितनी भारी उसकी भूमिका बनाई गई है, वो उतना खतरनाक साबित नहीं होता. गर्जन ज़्यादा है बरसन कम. प्लस जलाल के रोल में अविनाश तिवारी बहुत आउट ऑफ प्लेस लगते हैं. उस एक्टर में जितनी काबिलियत है, वो उसे बहुत मेनेसिंग बना सकते थे. मगर राइटिंग उन्हें सीमित कर देती है. और वो रेगुलर कैरिकेचरिश विलन बनकर रह जाता है. उसका स्पेन में होना फिल्म का वजन कम करती है.      

दूसरी चीज़ जो मुझे इस फिल्म में खली है, वो ढेर सारे एक्टर्स का जमावड़ा. दिशा पाटनी को दो गानों के अलावा इक्का-दुक्का सीन्स में दिखने का मौका दिया गया है. ये वैसा ही रोल है, जो 'इश्कज़ादे' में गौहर खान ने किया था. मगर कहानी में इसका उतना बड़ा रोल नहीं है. तमन्ना भाटिया ने जलाल की पत्नी राबिया का रोल किया है. जिसे फ्लैशबैक की मदद से जस्टिफाई करने की कोशिश की जाती है. वो फैसला भी सिर के बल खड़ा मालूम पड़ता है.

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नाना पाटेकर और फरीदा जलाल, को उनके पोटास के हिसाब का काम दिया गया ह. 'धक धक करने लगा' पर नाना को नाचते कोई क्यों नहीं देखना चाहेगा. फरीदा जलाल को करियर के इस पड़ाव पर एक ऐसा रोल मिला, जो उन्हें कुछ नया, कुछ फ्रेश करने का मौका देता है. बाकी विशाल भारद्वाज की फिल्म में शाहिद कपूर बिल्कुल ही डिफरेंट बीस्ट होते हैं. 'ओ रोमियो' में भी वो चीज़ रिपीट होती है. तृप्ति डिमरी ने अफ्शां का रोल किया है. इस कैरेक्टर का आर्क छीनकर उस्तरा को दे दिया जाता है. बावजूद इसके तृप्ति का काम सॉलिड है. उनका किरदार वल्नरेबल है. मगर वो बदले को लेकर इतना सीरियस है कि उसे ये भी भान नहीं होता कि जो वो करने निकली है, वो तकरीबन असंभव सा है.

फिल्म में शाहिद और तृप्ति के बीच एक सुंदर सीन है. जब उस्तरा को फाइनली समझ आ जाता है कि अफ्शां उसके प्यार को रेसिप्रोकेट नहीं करेगी, तो वो उसे एक्सेप्ट नहीं कर पाता. पावर पोजिशन का इस्तेमाल करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करता है. मगर कर नहीं पाता. तब उसे अफ्शां कहती है- "आपको मेरा जिस्म नहीं, मेरी रूह चाहिए. जो इस जन्म में तो आपको नहीं मिल सकती." ये सुनने के बाद उस्तरा उस कमरे से बाहर निकल जाता है. लौटकर वापस कमरे में आता है और बिस्तर के बगल में पड़ी अपनी शराब की बोतल उठाकर ले जाता है.

'ओ रोमियो' एंटरटेनिंग फिल्म है. जो आपकी उम्मीद का बोझ अपने कंधे पर नहीं उठाती. उसे जो करना था वो कच्चा-पक्का जैसा भी हो करती है. इस कच्चे में फिल्म की लंबाई भी शामिल है. 

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