ऐसी पांच आवाज़ें, जिनके बिना नवरात्रि फीकी रहती है
ये वैसी आवाज़ें हैं जिन्हें हम पिछले कई साल से सुन रहे हैं. कई और आए, लेकिन इनकी जगह कोई नहीं ले पाया.
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इन गायकों के गाए कुछ गाने तो अमर होने की कगार पर पहुंच गए हैं. अंबे तू है जगदंबे काली, तेरे दरबार में मैया खुशी मिलती है, आते हैं हर साल नवरात्रे माता के जैसे तमाम भजन हैं जो हमें रट गए हैं. लेकिन इनका कोई विकल्प अब भी नहीं है.
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बारिश में गर्म चाय के साथ पकौड़े अच्छे लगते हैं. सर्दियों में गरमागरम हलवा भाता है. गर्मी में ठंडी लस्सी सुकून देती है. ऐसे ही नवरात्रि में माता के भजनों से माहौल बनता है. कुछ आवाज़ें हैं, जो नवरात्रों की पहचान हैं. इन आवाजों के बिना दुर्गा पूजा में जैसे रौनक नहीं लगती. हम आपके लिए छांटकर लाए हैं ऐसी ही पांच आवाज़ें. इनका क्रम भले ही आगे-पीछे है, लेकिन फैन फॉलोइंग में सब एक से बढ़कर एक हैं. एक अकेले को बजाने से बात नहीं बनती. मजा तो सब के साथ आता है.

आप कहीं भी चले जाइए, ये आवाज़ें आपको हर जगह सुनाई देंगी.
निजी जिंदगी में परेशान ही रहे ज्यादा. कई बार दिल टूटा उनका. पहली शादी की सुनाली सेठ से. परिवार से बगावत की. लव मैरिज की, लेकिन सुनाली ने उन्हें तलाक दे दिया. अपने तबलची से शादी कर ली. वो तबलची थे रूप कुमार राठौड़.
फिर जलोटा जी ने अरेंज मैरिज की. वो भी नहीं टिकी. दूसरी पत्नी ने भी उन्हें तलाक दे दिया. अनूप में फिर तीसरी शादी की. मेधा गुजराल से. मेधा पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल की रिश्तेदार थीं. सब कुछ ठीक चल रहा था. मेधा और अनूप का एक बेटा भी हुआ- आर्यमान लेकिन फिर अनहोनी हो गई. बीमारी के कारण मेधा की मौत हो गई. एक बार फिर अनूप अकेले हो गए. इतना दर्द मिला उन्हें जीवन में. शायद इसलिए उनके भजनों में इतनी शक्ति दिखती है. हां, एक भोजपुरी फिल्म भी प्रोड्यूस की थी उन्होंने. मेहरारू कुआंर चाही. यानी, पत्नी कुआंरी ही चाहिए.
भगवान की ही तरह नरेंद्र चंचल भी कण-कण में बसते हैं. आगे भगवान, पीछे नरेंद्र चंचल. इनकी आवाज सुने बिना शायद देवताओं को भी फील नहीं आता होगा.
नरेंद्र चंचल को बचपन से ही भक्ति में बोरा गया था. परिवार भी खूब धार्मिक था. बड़े हुए तो खुद भी भजन और आरती गाने लगे. चंचल जी ने एक किताब भी लिखी- मिडनाइट सिंगर. माने आधी रात का गायक. जगरातों में खूब गाया है. इसलिए ये नाम चुना. हर साल 'हैप्पी न्यू इयर' पर कटरा में प्रोग्राम होता है इनका. उनके कैलेंडर में इसकी परमानेंट एंट्री रहती है हर साल.

इन भजनों का सीजन सालभर रहता है. गली में कोई जगराता हो, सुबह उठकर सुने जाने वाले भजन हों...ये आवाज़ें सदाबहार हो गई हैं.
अनुराधा पौडवाल हिंदी फिल्मों की धोनी हैं. धोनी ने जब टेस्ट से संन्यास लिया तो सब मस्त चल रहा था. जिद थी. ऊपर रहते हुए ही रिटायर होना है. ऐसी ही थीं अनुराधा पौडवाल. करियर के पीक पर पहुंचकर किनारे चली गईं. कहा, बस टी सीरीज के साथ ही काम करेंगी. फिर भक्ति संगीत में वो मुकाम बनाया कि मिसाल ही बन गईं. टी सीरीज वाले गुलशन कुमार के साथ उनकी जोड़ी खूब मशहूर हुई. दोनों ने मिलकर भक्ति संगीत के मार्केट में खूब तहलका मचाया. इतना फोकस मिला अनुराधा को कि क्या किसी हीरोइन को मयस्सर होगा! कैसेट पर उनकी फोटो बनी होती, तो हाथोंहाथ बिक जाती. वो 'टी सीरीज क्वीन' कही जाने लगीं.
80-90 के दशक में उन्होंने एक से एक हिट गाने भी दिए. रोमांटिक नंबर्स. 'जाने जिगर जाने मन, मुझको है तेरी कसम', 'मैं दुनिया भुला दूंगी तेरी चाहत में', 'दिल है कि मानता नहीं', 'तू मेरा जानू है, तू मेरा दिलबर है,' 'बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम.' अलग से पकड़ में आ जाती थी पतली आवाज. कहते हैं माधुरी दीक्षित की 'धक धक गर्ल' इमेज बनाने में अनुराधा का बहुत बड़ा हाथ था. राम लखन, साजन, दिल, तेजाब, बेटा...एक दौर था जब पर्दे पर चेहरा माधुरी का होता और आवाज अनुराधा की होती. असली पहचान लेकिन भक्ति संगीत से ही मिली उनको. उनका नाम भी जुड़ा गुलशन कुमार से लेकिन दोनों ने हमेशा इससे इनकार ही किया. 2017 में उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया. उनकी बेटी कविता और बेटे आदित्य ने भी म्यूजिक में हाथ आजमाने की कोशिश की, लेकिन अब तक कुछ खास नहीं कर पाए हैं.
प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी. तेरे दरबार में मैया खुशी मिलती है. मेरी अंखियों के सामने ही रहना ओ शेरो वाली जगदंबे. आते हैं हर साल नौरात्रे माता के. पंडाल कोई सा भी हो, लक्खा के भजन कॉमन हैं.
बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, जगह कोई भी हो, लक्खा हर जगह सुनाई देंगे. इनकी जागरण पार्टी भी खूब समां बांधती है. इनकी बुलंद आवाज के बिना माता की चौकी नहीं सजती. कई घरों में सुबह की चाय भले मिस हो जाए, लक्खा के भजन मिस नहीं होते. चलते ही चलते हैं.
जहां की डांडिया नाइट में फाल्गुनी सशरीर मौजूद होती हैं, वो मानी जाती है ए-क्लास जगह. बाकी जगहें फीकी. जो उनकी भारी-भरकम फीस नहीं चुका पाते, वो गानों से काम चलाते हैं. 1998 में उनका पहला अलबम आया था. उसका गाना 'मैंने पायल है छनकाई' लोगों के सिर चढ़ गया. लोग इतना चलाते थे, इतना चलाते थे कि कैसेट घिस जाता था. फिर कुछ और भी अलबम आए उनके.

गुजरात में डांडिया के दौरान काफी रौनक रहती है. आयोजक महीनों पहले से डांडिया नाइट्स की तैयारी करते हैं.
सारे गाने कमोबेश एक से ही लगते थे. फाल्गुनी भजन भी खूब गाती हैं. ज्यादातर गुजराती में. गुजरातियों की नवरात्रि फाल्गुनी के बिना पूरी नहीं होती. गुजरात के बाहर भी डांडिया नाइट्स का खूब फैशन है. जहां-जहां डांडिया नाइट होती है, वहां फाल्गुनी के गानों का न होना 'आठवां अजूबा' ही माना जाएगा.
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आप कहीं भी चले जाइए, ये आवाज़ें आपको हर जगह सुनाई देंगी.
अनूप जलोटा
जलोटा साहब यूं ही नहीं 'भजन सम्राट' कहलाते हैं. वो एक तरह से यज्ञ में डलने वाली समिधा (लकड़ी) हैं. इनके बिना अनुष्ठान पूरा नहीं होता. राम-कृष्ण और हनुमान में विशेष आस्था रखते हैं लेकिन बाकी देवताओं के लिए भी भजन गाए. नवरात्रि में ऐसा कोई भी पंडाल नहीं, जो उनके गाए भजनों के बिना बीत जाए.निजी जिंदगी में परेशान ही रहे ज्यादा. कई बार दिल टूटा उनका. पहली शादी की सुनाली सेठ से. परिवार से बगावत की. लव मैरिज की, लेकिन सुनाली ने उन्हें तलाक दे दिया. अपने तबलची से शादी कर ली. वो तबलची थे रूप कुमार राठौड़.
फिर जलोटा जी ने अरेंज मैरिज की. वो भी नहीं टिकी. दूसरी पत्नी ने भी उन्हें तलाक दे दिया. अनूप में फिर तीसरी शादी की. मेधा गुजराल से. मेधा पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल की रिश्तेदार थीं. सब कुछ ठीक चल रहा था. मेधा और अनूप का एक बेटा भी हुआ- आर्यमान लेकिन फिर अनहोनी हो गई. बीमारी के कारण मेधा की मौत हो गई. एक बार फिर अनूप अकेले हो गए. इतना दर्द मिला उन्हें जीवन में. शायद इसलिए उनके भजनों में इतनी शक्ति दिखती है. हां, एक भोजपुरी फिल्म भी प्रोड्यूस की थी उन्होंने. मेहरारू कुआंर चाही. यानी, पत्नी कुआंरी ही चाहिए.
नरेंद्र चंचल
पंजाबी को चहुंओर फैलाने का श्रेय दो लोगों को जाता है. एक तो यश चोपड़ा/करण जौहर की फिल्मों को. दूसरा, नरेंद्र चंचल को. ये पंजाबी भेंटें गाते हैं और क्या खूब गाते हैं. नवरात्रि हो, भजन संध्या हो, जगराता हो, माता की चौकी लगे, नरेंद्र चंचल के भजन हर जगह मौजूद होते हैं. माता रानी के पक्के भक्त.भगवान की ही तरह नरेंद्र चंचल भी कण-कण में बसते हैं. आगे भगवान, पीछे नरेंद्र चंचल. इनकी आवाज सुने बिना शायद देवताओं को भी फील नहीं आता होगा.
नरेंद्र चंचल को बचपन से ही भक्ति में बोरा गया था. परिवार भी खूब धार्मिक था. बड़े हुए तो खुद भी भजन और आरती गाने लगे. चंचल जी ने एक किताब भी लिखी- मिडनाइट सिंगर. माने आधी रात का गायक. जगरातों में खूब गाया है. इसलिए ये नाम चुना. हर साल 'हैप्पी न्यू इयर' पर कटरा में प्रोग्राम होता है इनका. उनके कैलेंडर में इसकी परमानेंट एंट्री रहती है हर साल.

इन भजनों का सीजन सालभर रहता है. गली में कोई जगराता हो, सुबह उठकर सुने जाने वाले भजन हों...ये आवाज़ें सदाबहार हो गई हैं.
अनुराधा पौडवाल
भजन-कीर्तन में जब किसी महिला कंठ की आवाज आती है तो दिमाग में पहला नाम अनुराधा पौडवाल का ही आता है. उनके गानों के बिना पंडाल सूने लगते हैं.अनुराधा पौडवाल हिंदी फिल्मों की धोनी हैं. धोनी ने जब टेस्ट से संन्यास लिया तो सब मस्त चल रहा था. जिद थी. ऊपर रहते हुए ही रिटायर होना है. ऐसी ही थीं अनुराधा पौडवाल. करियर के पीक पर पहुंचकर किनारे चली गईं. कहा, बस टी सीरीज के साथ ही काम करेंगी. फिर भक्ति संगीत में वो मुकाम बनाया कि मिसाल ही बन गईं. टी सीरीज वाले गुलशन कुमार के साथ उनकी जोड़ी खूब मशहूर हुई. दोनों ने मिलकर भक्ति संगीत के मार्केट में खूब तहलका मचाया. इतना फोकस मिला अनुराधा को कि क्या किसी हीरोइन को मयस्सर होगा! कैसेट पर उनकी फोटो बनी होती, तो हाथोंहाथ बिक जाती. वो 'टी सीरीज क्वीन' कही जाने लगीं.
80-90 के दशक में उन्होंने एक से एक हिट गाने भी दिए. रोमांटिक नंबर्स. 'जाने जिगर जाने मन, मुझको है तेरी कसम', 'मैं दुनिया भुला दूंगी तेरी चाहत में', 'दिल है कि मानता नहीं', 'तू मेरा जानू है, तू मेरा दिलबर है,' 'बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम.' अलग से पकड़ में आ जाती थी पतली आवाज. कहते हैं माधुरी दीक्षित की 'धक धक गर्ल' इमेज बनाने में अनुराधा का बहुत बड़ा हाथ था. राम लखन, साजन, दिल, तेजाब, बेटा...एक दौर था जब पर्दे पर चेहरा माधुरी का होता और आवाज अनुराधा की होती. असली पहचान लेकिन भक्ति संगीत से ही मिली उनको. उनका नाम भी जुड़ा गुलशन कुमार से लेकिन दोनों ने हमेशा इससे इनकार ही किया. 2017 में उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया. उनकी बेटी कविता और बेटे आदित्य ने भी म्यूजिक में हाथ आजमाने की कोशिश की, लेकिन अब तक कुछ खास नहीं कर पाए हैं.
लखबीर सिंह लक्खा
बड़े शहरों में लाउडस्पीकर बजाने की टाइमिंग फिक्स होती है. नियम छोटे शहरों में भी होता है, बस उस पर अमल नहीं होता. दुर्गा पूजा में खूब रौनक होती है. नौ दिन सुबह से शाम लाउडस्पीकर बजता है. वहां बजने वाले भजनों-गानों में एक आवाज फिक्स होती है: लखबीर सिंह लक्खा. लोगों को लक्खा का नाम भले न मालूम हो, उनके भजन मुंहजुबानी याद रहते हैं.प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी. तेरे दरबार में मैया खुशी मिलती है. मेरी अंखियों के सामने ही रहना ओ शेरो वाली जगदंबे. आते हैं हर साल नौरात्रे माता के. पंडाल कोई सा भी हो, लक्खा के भजन कॉमन हैं.
बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, जगह कोई भी हो, लक्खा हर जगह सुनाई देंगे. इनकी जागरण पार्टी भी खूब समां बांधती है. इनकी बुलंद आवाज के बिना माता की चौकी नहीं सजती. कई घरों में सुबह की चाय भले मिस हो जाए, लक्खा के भजन मिस नहीं होते. चलते ही चलते हैं.
फाल्गुनी पाठक
गुजरात का राष्ट्रीय खेल है डांडिया. और राष्ट्रीय त्योहार? जाहिर है, नवरात्रि. ऐसे ही फाल्गुनी पाठक गुजरात की नवरात्रि एम्बेसडर हैं. डांडिया क्वीन.जहां की डांडिया नाइट में फाल्गुनी सशरीर मौजूद होती हैं, वो मानी जाती है ए-क्लास जगह. बाकी जगहें फीकी. जो उनकी भारी-भरकम फीस नहीं चुका पाते, वो गानों से काम चलाते हैं. 1998 में उनका पहला अलबम आया था. उसका गाना 'मैंने पायल है छनकाई' लोगों के सिर चढ़ गया. लोग इतना चलाते थे, इतना चलाते थे कि कैसेट घिस जाता था. फिर कुछ और भी अलबम आए उनके.

गुजरात में डांडिया के दौरान काफी रौनक रहती है. आयोजक महीनों पहले से डांडिया नाइट्स की तैयारी करते हैं.
सारे गाने कमोबेश एक से ही लगते थे. फाल्गुनी भजन भी खूब गाती हैं. ज्यादातर गुजराती में. गुजरातियों की नवरात्रि फाल्गुनी के बिना पूरी नहीं होती. गुजरात के बाहर भी डांडिया नाइट्स का खूब फैशन है. जहां-जहां डांडिया नाइट होती है, वहां फाल्गुनी के गानों का न होना 'आठवां अजूबा' ही माना जाएगा.
साबूदाना का सच जानेंगे तो व्रत में खाना छोड़ देंगे
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