फ़िल्म रिव्यू : सिमरन
दो नेशनल अवॉर्ड विनर्स की एक फ़िल्म.
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फोटो - thelallantop
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एक आदमी बीमार पड़ा. उसकी पत्नी ने उसकी खूब सेवा की. कुछ दिनों के लिए दफ़्तर छोड़ दिया. घर पर रही. पति की देखभाल करती रही. डॉक्टर को दिखा ही रही थी. कुछ खास फ़ायदा नहीं हुआ. डॉक्टर बदला. नए डॉक्टर के पास ले गई. नए डॉक्टर ने बताया शरीर में आयरन की कमी है. पति को पालक वगैरह खिलाओ. पत्नी ने गांठ बांध ली. क्या बांध ली? गांठ! अब पति को हर वक़्त पालक मिलने लगा. कच्ची पालक, उबली पालक, पालक का सूप, पालक की दाल. पालक का जो कुछ भी बनता था, पति कोही खाने को मिल रहा था. पति की तबीयत ठीक होने लगी. लेकिन उसको इस बात की दिक्कत भी होने लगी कि उसे कुछ भी और खाने को नहीं मिल रहा था. उसकी पत्नी का बस चलता तो वो रोटी में भी पालक डलवा देती.
एक दिन पति को कुछ बेहतर महसूस हुआ तो उसने अपने दोस्त को कॉल किया. बाहर टहल के आने का प्लान बन गया. घर से निकलते वक़्त उसने अपनी पत्नी से कहा, "आज प्लीज़ मटन बना के रखना. बहुत हो गया पालक."
पति तीन घंटे बाद आया. मालूम पड़ा इतना बेहतर महसूस होने लगा था कि बियर पीने चला गया. वापस आया तो फ़ुल टाइट था. खाना बाहर नहीं खाया. सोचा घर पर खायेगा. मेज पर बैठा. ढक्कन खोला तो मटन की जगह पालक मिला. तुरंत बीवी को आवाज़ लगाई. बीवी ऑफिस का काम करने में लगी हुई थी. वो जल्दी से आई. उसे देखते ही पति ने उसकी ओर देखा, फिर डोंगे में रखे पालक को देखा और फिर पत्नी को देखते हुए बोला, "अबे अब क्या पिछवाड़े से जब सरिया निकल आएगी तब मानेगी क्या?"
कंगना रनौत वही पत्नी हैं जिन्होंने पालक खिलाना नहीं छोड़ा है. पति ने मटन की चाह में ढक्कन खोला और आज फिर उसे पालक ही मिला.
फ़िल्म बनाने वाले हंसल मेहता ने 'अलीगढ़' और 'शाहिद' बनाई है. उनके 'टेस्ट' के हिसाब से ये एक बहुत ही अलग फ़िल्म है. लेकिन कंगना ने फिर से वही काम किया है जो वो क्वीन में कर चुकी हैं. जो थोड़ा बहुत उन्होंने 'तनु वेड्स मनु' में किया. वो रोल जो वो पिछले कितने ही वक़्त से करती आई हैं. हंसल को ज़ाहिर है कि इस रोल के लिए कंगना सबसे सही लगी होंगी लेकिन फ़िल्म करना या न करना कंगना के ही हाथ में रहा होगा. खैर, अब तो फ़िल्म आ गई है.
महीने भर के अन्दर आई फ़िल्मों में देखा जाए तो टाइप कास्ट हो चुके ऐक्टर्स की भीड़ दिख रही है. भूमि पेडनेकर, आयुष्मान खुराना और कंगना रनौत.
इस फ़िल्म को भरपूर पब्लिसिटी मिल गई है. कंगना के ट्रैक रिकॉर्ड के हिसाब से आगे वाली फ़िल्मों को भी मिलती रहेगी. उन्होंने 'बोले चूड़ियां, बोले कंगना...' गाने को नया आयाम दिया है.
फ़िल्म देखी जाए. मगर कुछ नयेपन की उम्मीद न पाली जाए. निराश होंगे. ये फ़िल्म ऐसी है कि आप मोबाइल में आंखें गड़ाए पूरी फ़िल्म सिर्फ़ सुनते रहें तो चलेगा. और जो लोग हंसल मेहता से वापस अलीगढ़ जैसा कुछ बनाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं, वो वापस अलीगढ़ ही देख लें. वो हर बार कुछ नया कर रहे हैं और इसके लिए उन्हें बधाई दी जानी चाहिए. बाकी कंगना पालक खिला रही हैं. न जाने मटन कब पकेगा.
पी.एस.: मुझको महिला विरोधी मत साबित कर देना मितरों!
फ़िल्म बनाने वाले हंसल मेहता ने 'अलीगढ़' और 'शाहिद' बनाई है. उनके 'टेस्ट' के हिसाब से ये एक बहुत ही अलग फ़िल्म है. लेकिन कंगना ने फिर से वही काम किया है जो वो क्वीन में कर चुकी हैं. जो थोड़ा बहुत उन्होंने 'तनु वेड्स मनु' में किया. वो रोल जो वो पिछले कितने ही वक़्त से करती आई हैं. हंसल को ज़ाहिर है कि इस रोल के लिए कंगना सबसे सही लगी होंगी लेकिन फ़िल्म करना या न करना कंगना के ही हाथ में रहा होगा. खैर, अब तो फ़िल्म आ गई है.
फ़िल्म के ट्रेलर में एक डायलॉग है. "मुझे चोरी करने और जुआं खेलने की लत है." असल में ये डायलॉग ही ग़लत है. सिमरन/प्रफुल्ल को कोई लत नहीं थी. वो उसकी मजबूरी थी. इस लत को क्लेप्टोमेनिया (kleptomania) कहते हैं. लेकिन जब आपको एक कार में बिठाकर, आपकी कनपटी पर बन्दूक सटा दी जाए और आपसे कहा जाए कि 10 दिन में 50 हज़ार डॉलर लाकर दो और उसके लिए आप चोरी करने लगें, तो ये क्लेप्टोमेनिया के खांचे में नहीं बैठता.
एक गुजराती तलाकशुदा लड़की जो अमरीका में रहती है, घर खरीदने के जुगाड़ में लगी हुई है. इंडिपेंडेंट हो जाना चाहती है. मां-बाप के साथ उसे अब और नहीं रहना. कमाती है. लेकिन कम. लोड नहीं लेती. रिलेशनशिप्स आते जाते रहते हैं. लोन के लिए अप्लाई कर रखा है. सब कुछ ठीक होने जैसा लग रहा था. बस बाप शादी के लिए ताने मारता रहता है जो नए घर में बंद हो जाने वाले थे. लेकिन फिर सब कुछ गड़बड़ हो जाता है. पैसे निपट जाते हैं. लोन मना हो जाता है. और उधारी की टोपी सर पर चढ़ जाती है. यहीं सेजराती प्रफुल्ल बन जाती है सिमरन. आगेकी कहानी फ़िल्म की कहानी है.
महीने भर के अन्दर आई फ़िल्मों में देखा जाए तो टाइप कास्ट हो चुके ऐक्टर्स की भीड़ दिख रही है. भूमि पेडनेकर, आयुष्मान खुराना और कंगना रनौत.
इस फ़िल्म को भरपूर पब्लिसिटी मिल गई है. कंगना के ट्रैक रिकॉर्ड के हिसाब से आगे वाली फ़िल्मों को भी मिलती रहेगी. उन्होंने 'बोले चूड़ियां, बोले कंगना...' गाने को नया आयाम दिया है.
फ़िल्म देखी जाए. मगर कुछ नयेपन की उम्मीद न पाली जाए. निराश होंगे. ये फ़िल्म ऐसी है कि आप मोबाइल में आंखें गड़ाए पूरी फ़िल्म सिर्फ़ सुनते रहें तो चलेगा. और जो लोग हंसल मेहता से वापस अलीगढ़ जैसा कुछ बनाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं, वो वापस अलीगढ़ ही देख लें. वो हर बार कुछ नया कर रहे हैं और इसके लिए उन्हें बधाई दी जानी चाहिए. बाकी कंगना पालक खिला रही हैं. न जाने मटन कब पकेगा.
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