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फिल्म रिव्यू: रागदेश

सुभाष चंद्र बोस की बनाई सेना इंडियन नेशनल आर्मी के सैनिकों पर तिग्मांशु धूलिया की फिल्म.

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28 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 29 जुलाई 2017, 11:14 AM IST)
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फिल्म 'रागदेश' का एक दृश्य
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फिल्म रिव्यू: रागदेश डायरेक्टर: तिग्मांशु धूलिया कास्ट: कुनाल कपूर, अमित साध, मोहित मारवाह



एक समय हुआ करता था, जब हममें से कई लोग फ्रॉक और निक्कर में खेल रहे होते थे, कुछ पैदा नहीं हुए थे और कुछ भ्रूण थे. यानी 80 और 90 के दशक का समय, जब दूरदर्शन ने रविशंकर, कविता कृष्णमूर्ति और भीमसेन जोशी को परमानेंट इंटर्नशिप पर रखा हुआ था. तब 'राग देश' में एक गीत आया था: 'बजे सरगम हर तरफ से, गूंज बनकर देश राग'.

'मिले सुर मेरा तुम्हारा' और 'बजे सरगम' ने देशभक्ति की भसड़ काट रखी थी. पढ़ाई पूरी करते ही अमेरिका जाकर सेटल होने वालों को देश में रोक लेने का और कोई तरीका भी तो नहीं था. फिर देश की इकॉनमी के साथ फिल्म और टीवी की दुनिया में क्रांति आई और ये जिम्मेदारी जेपी दत्ता ने अपने पर्सनल कंधों पर उठाई. फौजी होना क्या होता है, उनका जीवन कितना कठिन हो सकता है, घर, प्रेमिकाओं और पत्नियों से दूर होना कैसा होता है, हमें मालूम पड़ा. युद्ध चीन के खिलाफ हो या पाकिस्तान के, इन फिल्मों के बनने के पहले शायद ही हम मालूम था कि देश क्या होता है, राष्ट्र क्या होता है.


जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर का एक दृश्य
जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर का एक दृश्य

'देश' की एक सामूहिक परिकल्पना गढ़ने में फिल्मों और दूरदर्शन की काफी भूमिका रही है. और इसी कड़ी में अब हमें परदे पर दिखेगी 'राग देश'. लेकिन 'राग देश' अलग है. ये फिल्म उस समय को बयां करने की कोशिश करती है, जब एक देश के तौर पर हमें मालूम ही नहीं था कि भौगोलिक लकीरों के अलावा देश होता है. हम थे तो भारतीय, मगर हम पर शासन अंग्रेजों का था. जिस सिविल सर्विस को आज हम देश के काम आना कहते हैं, वो महज सरकार के काम आना था. आप नियम-कानून के तहत कुछ करते, तो उससे देश नहीं, ब्रिटिश सरकार का फायदा होता और जो देश के लिए कुछ करते, उन्हें गद्दार कहा जाता, क्योंकि वो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ होता.

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प्रेम सहगल, गुरबख्श सिंह ढिल्लों और शाहनवाज़ खान यानी तीन 'गद्दारों' का कोर्ट मार्शल होना है. गद्दार, क्योंकि वो इंडियन नेशनल आर्मी यानी सुभाष चंद्र बोस की बनाई हुई सेना में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे. तो ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गद्दार करार दिया और कुछ सैनिकों को मारने के लिए उन पर गद्दारी का केस चला. ट्रायल के दौरान फिल्म फ्लैशबैक में जाती है और बताती है कि किस तरह INA का निर्माण हुआ. फिर किस तरह सैनिकों का खुद पर से विश्वास उठने लगा. फिर किस तरह सुभाष चंद्र बोस की एंट्री हुई और सैनिकों में एक नया जूनून भर गया. मगर विश्व युद्ध के ख़त्म होते-होते INA पूरी तरह बिखर गई और सुभाष की प्लेन हादसे में मौत हो गई.

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सुभाष और INA को लेकर हमारे देश में जितने दावे और विवाद हुए हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए इस फिल्म की टाइमिंग बढ़िया है. मगर फिल्म देखना निराशाजनक है. खासकर तब, जब आपको मालूम हो कि फिल्म तिग्मांशु धूलिया ने बनाई है. वही तिग्मांशु, जिन्होंने 'हासिल' और 'पान सिंह तोमर' जैसी मजबूत ही नहीं, आपको हर पल बांधे रखने वाली फ़िल्में बनाई हैं. आपका नहीं पता, पर फिल्म के पहले भाग में मुझे खूब नींद आई. इंटरवल का इंतजार करती रही. हालांकि, इंटरवल के बाद मामला कुछ बेहतर लगा.

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जिस बात को फिल्म में एक्सप्लोर करने की कोशिश की गई है, वो भारतीय सैनिकों का अंतरद्वंद है. वो कई सालों तक विश्व युद्ध में लड़ रही ब्रिटिश फ़ौज के लिए लड़े, मगर जब पूरब में ब्रिटिश जापान से हार गए, तो भारतीय सैनिकों को जापान के हवाले कर दिया, प्रिजनर्स ऑफ़ वॉर की तरह. सैनिकों को बड़ा ठगा सा महसूस हुआ. तो सोचा कि अब अपने लिए लड़ेंगे. फिर उन्होंने सेना बनाई. ब्रिटिशर्स की नजरों में ये कोई औपचारिक सेना नहीं, बागियों का एक झुंड था, जिन्हें अंततः कुचल ही दिया गया.

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फिल्म INA और बोस की विचारधारा को बढ़ावा देती है, मगर नाज़ी जर्मनी और हिटलर से बचते हुए. फिल्म ये साबित करने की कोशिश करती है कि INA की ट्रेनिंग भले ही जापान में हुई, मगर उन्होंने न कभी जापान से ऑर्डर लिए, न कभी हिटलर की फासीवादी विचारधारा के प्रति सिम्पथी दिखाई. फिल्म ये भी बताने की कोशिश करती है कि सुभाष चंद्र बोस की दीवानगी खूब थी, क्योंकि गांधी की विचारधारा से इतर बोस का भरोसा था कि ब्रिटिश से लड़ाई जीतने का तरीका अगर कोई है, तो वो युद्ध है. एक युद्ध, जिनमें हम उतने ही हथियारों का इस्तेमाल कर सकें, जितने ब्रिटिश करते हैं.

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गुरबख्श, प्रेम और शाहनवाज़ खान के बीच जिस तरह की खास फौजी केमिस्ट्री दिखाने की कोशिश की गई है, उससे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी पर बनी तमाम फ़िल्में याद आती हैं. मगर 'राग देश' उस तरह का प्रभाव नहीं छोड़ पाती. और जहां तक किरदारों की बात है, तो उनमें गहराई और ठहराव की कमी लगती है. ऐसा लगता है, बस रखने के लिए रख लिए हैं. खासकर नेहरू, जिनके किरदार में कोई दम नहीं दिखा.

कोर्टरूम फिल्मों से हम अपेक्षा रखते हैं कि उनमें ऐसी दलीलें हों कि एक-दो बार उठकर वकील के लिए ताली बजा ही दें. मगर वकील भूलाभाई देसाई का किरदार कोई ऐसा जादू क्रिएट करने में सफल नहीं हुआ. न ही दलीलों ने कोई रोमांच क्रिएट किया. बीच-बीच में कैप्टन प्रेम और लक्ष्मी (स्वामीनाथन) सहगल की लव स्टोरी दिखाई गई, मगर वो भी इतने बिखरे हुए टुकड़ों और बिना किसी बिल्ड-अप के बनाए हुए हैं कि उसमें मजा नहीं आता. युद्ध के बीच पनपते प्रेम को अगर गहराई से दिखाया जाए, तो ये अपने-आप में एक भरपूर फिल्म की स्क्रिप्ट बन सकती है. मगर इसे सतही तरीके से डील किया गया.

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कुल मिलाकर एक बड़े पोटेंशियल वाली फिल्म को गोड़ने में कम ही कसर छोड़ी गई है.




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