15 साल की ड्रग्स बेचने वाली सुंदर लड़की से इश्क की कहानी
ये दुनिया है. डिवाइंस की दुनिया. जो क्लब में जाकर नाचती है. पर नाचने वाले की राह नहीं भूलती.

एक लड़की है. बहुत सुंदर. वो अखबारों के चिकने पन्ने वाले ऐड सी सुंदर नहीं. खड़े भरे खेत के गेंहू सी. आदिम गंध लिए. भूख और तृप्ति के दो तार जोड़ती.
पर कविता के झोल में मत आइए. लड़की इस बात पर जरा भी खर्च नहीं होती. उसके अंदर अलग ही साइंस चल रही है. वो गरीब है. मुस्लिम है. मगर मस्जिद नहीं जाती. जब जाती है, तो अकेले जाती है. जाती है, लेकिन प्रार्थना नहीं करती. मौलवी की बेटी को टेरने जाती है. ये बेटी बहुत मोटी है. बहुत मस्त है. लड़की की दोस्त है. दोनों की टोली है. स्कूल में हुड़दंग करते हैं. टीचर की शामत समझिए.
माफ कीजिएगा. उसे फ्लैट नहीं कह सकते. झुग्गी दुरुस्त शब्द होगा. या फिर मलिन बस्ती इस्तेमाल करते हैं. इससे गंध भी आ जाती है हवा में.
तो लड़की वही करती है, जो कोई भी मन करवाएगा. उस बड़ी लड़की सा होने की कोशिश. उसके गैंग में शामिल होना ही अब इक मकसद बचा है. उसके लिए कुछ करके दिखाना होगा.
हो गया ये भी. आ गई लड़की. बदलने लगी जिंदगी. मगर इसी ट्रैक पर नहीं. एक पैरलल भी चल रहा है. लव वाला.
लड़की दोस्त संग मॉल में जाती है. बुर्के के नीचे जूस के टेट्रा पैक चुराने. फिर मॉल के बगल में बनी एसी वाली सुरंगों में उसे छिपाने. छिपकर पीने. इसी दौरान उसे एक गार्ड दिखता है. थप्पड़ मार-मार नाचता. लड़की नच जाती है. रच जाती है. उसके तन में. लड़के को पता है. लड़के को इश्क है. अब लड़की को डाउट है. इश्क पर नहीं. खुद के इसके लायक होने पर.
आखिर में वही दोराहा. एक रास्ता चुनो. बुनो. गुनो.
सुनो. ये अंत नहीं सुना सकता मैं तुम्हें. खुद ही खोजना होगा.
ये दुनिया है.
लोकेशन फ्रांस के पैरिस के एक उपशहर की है. कलाकार भी ज्यादातर वहीं के हैं. मगर फिल्म सबटाइटल्स के साथ है. अंग्रेजी के. जो जल्द समझ आती है किसी और विदेशी भाषा के बजाय. शुक्रिया उस कारोबारी का, जिसने जहांगीर का फोड़ा ठीक किया और फिर जिसकी औलादों ने पूरे मुल्क को 150 साल मवाद दी. अंग्रेज. अंग्रेजी वाली.
भटकने की मनाही है. बात दुनिया की. इस किरदार को निभाया है ओलाया अमामरा ने. नई हैं अभी. इतनी कि जितनी पहली ओस होती है. बरगद के रोएंदार नए पत्ते पर. इतनी कि आप डेस्कटॉप पर उनकी तस्वीर लगा लें. और फिर जब कोई मेल, कोई कॉल, कोई मीटिंग बोझिल होने लगे, तो इसे खिड़की बना कहीं और निकल जाएं.
पर शकल में अपना क्या हुनर. तो बात एक्टिंग की, जो बहुत ही ज्यादा निर्दोष है. और इसी पोडियम पर उनके साथ उनकी सहेली का रोल निभाने वाली डेबोरा लुकुमुएना हैं. VLC के दौर में इस लड़की को, इसकी अलमस्ती को देखना, दिल्ली के दौर में अल्मोड़े की हवा चुराने जैसा है.
उदा बेन्यामिना
फिल्म की डायरेक्टर भी उसी लीग की हैं. मिक्स्ड ऑरिजिन वाली बेलौस महिला. उदा बेन्यामिना. उन्हें इस फिल्म के लिए कान फिल्म फेस्टिवल में कैमरा डी ओर प्राइज मिल चुका है.
चुस्त एडिटिंग. बढ़िया स्क्रीनप्ले. फिल्म जिंदगी की तरह गति पाती है. कभी तेज. बहुत तेज. धक-धक. कि जैसे बाहर ही आ जाएगा हड्डी-पसली पारकर. कभी सुस्त. इतनी कि अजगर भी शरमा जाए. ज्यों कोई कविता बुनी जा रही हो.
इसे देखिए. 'डिवाइंस'. खोजकर. क्योंकि इसके आखिर में एक बेहद जरूरी बात है. जिसे होमो-सैपिएंस भूलते जा रहे हैं.
एक गुफा में, भीमबैठका सी. जिसे लिखे जाने की जरूरत है. फिर मशाल ले वहां बार-बार जाने की जरूरत है.
https://www.youtube.com/watch?v=VT4YtWdK01Mजरूरत है. दुनिया को. दुनिया की.

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