The Lallantop
Advertisement

2018 के वो 4 जनांदोलन, जिन्होंने सरकारों की चूलें हिला दीं

ये आंदोलन जनता को गलत के खिलाफ खड़े रहने की ताकत आगे भी देते रहेंगे...

Advertisement
pic
31 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 31 दिसंबर 2018, 06:39 AM IST)
Img The Lallantop
2018 में हमने कुछ बड़े जन संघर्ष देखे. सत्ता के खिलाफ, अत्याचार के खिलाफ. अपने अधिकारों के लिए लोग सरकार से भिड़ गए. कुछ ने सत्ता तक को झुका दिया. अरमेनिया में तो जैसे पूरा मुल्क विपक्ष बन गया. फोटो में अरमेनिया, अमेरिका, निकारागुआ और फ्रांस के प्रोटेस्ट्स की तस्वीरें हैं (फोटो: रॉयटर्स)
Quick AI Highlights
Click here to view more
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां रूई की तरह उड़ जाएंगे हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम मसनद पर बिठाए जाएंगे सब ताज़ उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे
इसके आगे-पीछे फ़ैज़ ने क्या खूब जोड़ा. लिखा, हम देखेंगे. सुनेंगे नहीं, पढ़ेंगे नहीं, देखेंगे. कि ऐसा मंज़र अपनी आंखों से देखने में सुख है. 2018 में हमने भी देखा. दुनिया के कुछ हिस्सों में. आम लोगों को सरकार के खिलाफ अड़ते हुए. अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतरते हुए. ज़्यादतियों के सामने सीना तानकर खड़े होते हुए. इन मास प्रोटेस्ट्स में हम सबके लिए अलग-अलग सबक हैं.
1. नाम- 2018 अरमेनियन रेवॉल्यूशन देश- अरमेनिया क्यों हुआ- सरकार की तानशाही के खिलाफ
अरमेनिया सोवियत संघ का हिस्सा था. 1991 में सोवियत के टूटने के बाद उससे अलग हुआ. 1999 से 2018 तक यहां रिपब्लिकन पार्टी की सत्ता थी. थोड़ी नरम सही, लेकिन थी ये तानाशाही. चुनाव, मीडिया सब पर उसका ही नियंत्रण था. 2008 में राष्ट्रपति बने सेर्ज सार्गसियन. संविधान किसी इंसान को दो ही बार राष्ट्रपति बनने की इजाज़त देता था. सार्गसियन का पहला कार्यकाल 2013 में पूरा हुआ. फिर उन्होंने व्लादीमिर पुतिन की तर्ज़ पर संविधान में ही बदलाव कर दिया. पहले सारी ताकतें राष्ट्रपति के पास थीं. अब प्रधानमंत्री को सबसे ताकतवर बना दिया गया. फिर वो खुद ही प्रधानमंत्री भी बन गए. नए नियम बनाकर अपनी रिपब्लिकन पार्टी को भी फायदा पहुंचाया.
अरमेनिया की आबादी करीब 30 लाख है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इसमें से तकरीबन एक तिहाई लोग गरीब कैटगरी में आते हैं. बेरोजगारी भी काफी है. भ्रष्टाचार, करप्ट पॉलिटिकल व्यवस्था, इन सबसे परेशान लोगों ने मार्च 2018 में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया. लोग सार्गसियन का इस्तीफ़ा मांग रहे थे. ये अहिंसक आंदोलन था. हज़ारों-हज़ार लोग सड़कों पर उतर आए. ये एकदम गांधीवादी आंदोलन जैसा था. सोशल मीडिया ने खूब मदद की लोगों को एकजुट करने में.
दिन के वक़्त लोग सड़कों और गलियों को जाम करते. सार्वजनिक परिवहन रोकने. सरकारी इमारतें ब्लॉक करते. फिर शाम को चौराहों, मैदानों में जमा होते. सब एकदम शांति से. ये गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसा ही मूवमेंट था. इसकी ताकत देखिए कि सार्गसियन को इस्तीफ़ा देना पड़ा. लोग इतने पर नहीं माने. उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी को संसद से बर्खास्त करने की मांग की. कहा, विपक्षी नेता निकोल पशिनयान को प्राइम मिनिस्टर बनाओ. ऐसा हुआ भी. पार्लियामेंट ने निकोल को कार्यकारी PM चुन लिया. फिर दिसंबर में चुनाव कराए गए. ये अरमेनिया के पहले लोकतांत्रिक संसदीय चुनाव थे. निकोल की 'माई स्टेप अलाइंस' को बहुमत मिला. रिपब्लिकन्स, जो इतने बरस से सत्ता में काबिज़ थी, उसे एक भी सीट नहीं मिली.
ये मई 2018 की तस्वीर है. विरोध प्रदर्शनों की वजह से इस्तीफ़ा देना पड़ा. पार्लियामेंट ने निकोल को नया प्रधानमंत्री चुना. ये अरमेनिया का रिपब्लिक स्क्वैयर है. निकोल के समर्थक जमा होकर राजनैतिक बदलाव की खुशी मना रहे हैं (फोटो: रॉयटर्स)
ये मई 2018 की तस्वीर है. विरोध प्रदर्शनों की वजह से सेर्ज सरकिसयन को इस्तीफ़ा देना पड़ा. पार्लियामेंट ने निकोल को नया प्रधानमंत्री चुना. ये अरमेनिया का रिपब्लिक स्क्वैयर है. निकोल के समर्थक जमा होकर राजनैतिक बदलाव की खुशी मना रहे हैं. ये बदलाव लोगों की वजह से ही मुमकिन हो सका (फोटो: रॉयटर्स)

2. नाम- येलो वेस्ट प्रोटेस्ट्स देश- फ्रांस क्यों हुआ- डीज़ल पर बढ़े टैक्स के खिलाफ
फ्रांस में महंगाई ने मिडिल क्लास और लोअर इनकम ग्रुप की नाक में दम किया हुआ था. इसपर जनवरी से डीज़ल पर टैक्स और बढ़ने वाला था. लोग गुस्से में थे. सोशल मीडिया पर लिखते थे. आपस की बातचीत में सरकार पर नाराज़गी जताते थे. ऐसे ही एकाएक 17 नवंबर को ढेर सारे लोग 'येलो वेस्ट' पहने सड़कों पर उतर आए. डीज़ल की महंगाई के खिलाफ. 'येलो वेस्ट' ड्रेस कोड के नाम पर इस प्रोटेस्ट का नाम ही पड़ गया- येलो वेस्ट. प्रोटेस्ट का ये तरीका और भी देशों में फैल गया है. फैल रहा है.

आप पूछेंगे ये नाम क्यों? फ्रांस में एक नियम है. कार चलाने वाले अपनी गाड़ी में पीले रंग की एक जैकेट रखेंगे ही रखेंगे. इस जैकेट की खासियत है कि ये अंधेरे में चमकती है. नियम का मकसद है, मदद की ज़रूरत पड़े तो आदमी ये 'येलो वेस्ट' पहन ले. ताकि उसपर किसी न किसी की नज़र पड़ जाए और उस तक मदद पहुंच जाए. तो 'येलो वेस्ट' पहनकर प्रोटेस्ट करने ये लोग बताना चाहते थे कि वो महंगाई से दब गए हैं. अगर उन्हें मदद नहीं मिली, तो महंगाई उन्हें पूरा ही कुचल देगी. लोगों ने खूब हंगामा मचाया. गाड़ियां फूंकीं. दुकानें जलाईं. फिर हर वीकेंड पर ऐसा ही होने लगा. पहले-पहल सरकार को लगा, डंडे के ज़ोर पर लोग दब जाएंगे. मगर ऐसा हुआ नहीं. सरकार डिफेंसिव मोड में आई.
इस प्रोटेस्ट पर फ्रांस अब भी तहस-नहस हुआ पड़ा है. मगर इतना है कि सरकार को मेसेज साफ़ मिल गया है. पर्यावरण की हिफ़ाजत ज़रूरी है. मगर इसका बोझ आमदनी और जेब के हिसाब से बांटा जाए. वरना लोग साथ नहीं आएंगे, खिलाफ हो जाएंगे. ऐसा होने में नुकसान सबका ही है.
पुलिस पानी की बौछार कर रही है प्रदर्शनकारियों पर. 'येलो वेस्ट' पहने एक प्रदर्शनकारी पानी के ठीक आगे खड़ा है. ये फ्रांस की राजधानी पैरिस की तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)
पुलिस पानी की बौछार कर रही है प्रदर्शनकारियों पर. 'येलो वेस्ट' पहने एक प्रदर्शनकारी हाथ में बैनर थामे पानी के ठीक आगे खड़ा है. ये फ्रांस की राजधानी पैरिस की तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)

3. नाम- मार्च फॉर आर लाइव्ज़ जगह- अमेरिका क्यों हुआ- गन कंट्रोल पर
अमेरिका में मास शूटिंग की परिभाषा कहती है. कि जहां गोलीबारी में चार या उससे ज्यादा लोग मारे जाएं.
शूटर को छोड़कर. इस तरह से अगर 10 दिन का हिसाब लें, तो औसतन इनमें से नौ दिन अमेरिका में कहीं न कहीं मास शूटिंग होती है. अमेरिका की आबादी है करीब साढ़े 31 करोड़. यहां लोगों के पास तकरीबन साढ़े 26 करोड़ बंदूकें हैं. ऐसी मास शूटिंग की घटनाओं में अब तक 1,857 लोगों की मौत हो चुकी है. सात हज़ार के करीब लोग घायल हुए हैं.
अमेरिका कहता है, आतंकवाद पर नो टॉलरेंस. मगर अमेरिका ने आतंकवाद से कहीं ज़्यादा जानें अपने लोगों की बंदूकों से गंवाई हैं. वो भी अपनी ही बंदूकों से. कभी किसी स्कूल में, कभी किसी पब में, कभी मार्केट में. ऐसा बमुश्किल ही कोई हफ़्ता बीतता है, जब अमेरिका में कोई मास शूटिंग की घटना नहीं होती. गन कंट्रोल की बातें बहुत टाइम से चल रही हैं. मगर गन लॉबी इतनी मज़बूत है और वहां के कल्चर में बंदूकों का साथ इतना पुराना है कि गन कंट्रोल मुमकिन हो नहीं पाता. वहां बंदूक रखना ज़रूरत से कहीं ज़्यादा लोगों की आदत बन गया है. मगर 2018 इस लिहाज़ से अलग था कि इस साल एक अलग चीज हुई. फ्लोरिडा के एक हाई स्कूल में मास शूटिंग हुई. 17 जानें गईं. इस शूटिंग के बाद अमेरिका को जैसे करंट छू गया.
24 मार्च, 2018 को अमेरिका में हज़ारों-लाखों लोग बाहर निकले. इनमें ढेर सारे बच्चे शामिल थे. हाथों में बैनर, पोस्टर. ये हुजूम निकला था बंदूकों के दम पर की जाने वाली हिंसा के खिलाफ. खबरों के मुताबिक, हर एक अमेरिकी स्टेट में 800 से ज़्यादा प्रोटेस्ट हुए. बच्चे माइक थामे बोल रहे थे. उनके शब्दों ने, उनकी अपील ने बस अमेरिका के ही लोगों को नहीं रुलाया. बल्कि दुनियाभर के लोगों को भावुक किया. ऐसा नहीं कि इसके बाद गन कंट्रोल पर कुछ बड़ी क्रांति हुई हो. मगर हां, इन प्रोटेस्ट्स से असर तो हुआ. अगर हज़ारों-हज़ार बच्चे किसी आंदोलन की अगुआई करें, तो ये मामूली घटना नहीं हो सकती. और यही वजह है कि ये प्रोटेस्ट्स हमारी लिस्ट में शामिल हैं.
पार्कलैंड, फ्लोरिडा के एक स्कूल में फायरिंग हुई. 17 लोग मारे गए. इसके बाद अमेरिका में जगह-जगह प्रोटेस्ट हुए. इन प्रोटेस्ट्स का लाइमलाइट थे बच्चे (फोटो: रॉयटर्स)
पार्कलैंड, फ्लोरिडा के एक स्कूल में फायरिंग हुई. 17 लोग मारे गए. इसके बाद अमेरिका में जगह-जगह प्रोटेस्ट हुए. इन प्रोटेस्ट्स का लाइमलाइट थे बच्चे (फोटो: रॉयटर्स)

4. नाम- निकारागुअन ऐंटी-गवर्नमेंट प्रोटेस्ट्स जगह- निकारागुआ क्यों हुआ- सरकार की तानाशाही के खिलाफ
सेंट्रल अमेरिका का छोटा सा बेहद गरीब देश है- निकारागुआ. वहां के राष्ट्रपति हैं डेनियल ओरटेगा. उनकी पत्नी रोज़ारियो मुरीलो वाइस प्रेजिडेंट हैं. निकारागुआ में सोमोज़ा परिवार की तानाशाही थी. इसके खिलाफ 1978-79 में यहां सैंडिनिस्टा क्रांति हुई. इसके लीडर्स में से एक थे ओरटेगा. 1985 से 1990 तक उन्होंने सत्ता संभाली. फिर 2007 में दोबारा आए. नियम था कि एक आदमी, दो कार्यकाल. मगर ओरटेगा ने संविधान में मनमुताबिक बदलाव किया. तीसरी बार राष्ट्रपति चुन लिए गए. नवंबर 2016 में लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति बन बैठे. विपक्ष ने कहा -  ये चुनाव नहीं, मज़ाक है.  लोकतंत्र आया. ओरटेगा इसी पार्टी के मुखिया हैं. 1979 से 1990 तक सत्ता में रहे. फिर 2007 में दोबारा राष्ट्रपति बने. सत्ता में आकर तानाशाह बन बैठे. क्या संसद, क्या सुप्रीम कोर्ट, क्या सेना, क्या पुलिस, हर चीज इनके कंट्रोल में है.
जून 2017 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने वॉर्निंग दी थी. कि निकारागुआ की अर्थव्यवस्था इतने बुरे हाल में है कि 2019 तक उसके पास सोशल सिक्यॉरिटी सिस्टम में फंड ही नहीं बचेगा. अगर हालत सुधारनी है, तो सुधार करने होंगे. देश की इकॉनमी बदहाल थी. मगर सुधार करने की जगह राष्ट्रपति ने तुरंत आसानी से पैसा हासिल करने की सोची. इसका सबसे आसान तरीका था जनता की सुविधाएं कतरना और उनपर टैक्स का बोझ बढ़ाना. ये अप्रैल 2018 की बात है. सोशल सिक्यॉरिटी में सुधार के नाम पर टैक्स बढ़ा दिए गए. पेंशन भी घटा दी गई. विरोध शुरू तो हुए इसके खिलाफ. मगर जल्द ही ये सरकार के खिलाफ बगावत में बदल गया. लोगों ने इस मूवमेंट को नाम दिया- यूनाइटेड फॉर फ्रीडम.
हज़ारों-लाखों लोग राष्ट्रपति ओरटेगा का इस्तीफ़ा मांगने सड़कों पर उतर आए. ओरटेगा ने कहा, उनके खिलाफ विरोधियों की साज़िश है. पूरी क्रूरता से विरोध दबाने की कोशिश की. पर विरोध दबा नहीं. सरकारी हिंसा के जवाब में लोग भी हिंसक हो गए. सत्ता ने इनके खिलाफ अंधाधुंध कार्रवाई की. यहां तक कि शांति से प्रदर्शन करने वालों पर भी आतंकवाद का इल्ज़ाम लगा दिया. इंडिपेंडेंट टीवी चैनलों को बंद करवा दिया. कई पत्रकारों पर हमले हुए. खबरों के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों का यौन शोषण किया गया. नंगा करके उनकी परेड निकाली गई. निकारागुआ के मानवाधिकार सेंटर का कहना है कि अप्रैल से अब तक 322 लोग मारे जा चुके हैं हिंसा में. दो दर्ज़न के करीब नाबालिग भी हैं मरने वालों में. 109 के करीब ऐसे लोग हैं मरने वालों में, जिनके सिर या छाती में गोली मारी गई थी. हज़ारों लोग जख़्मी हुए. अनुमान है कि 60,000 से ज़्यादा लोग देश छोड़कर भाग गए हैं. लोग भागे-भागे फिर रहे हैं. छुपकर जी रहे हैं.
ताकत के ज़ोर पर ओरटेगा अभी हावी हुए बैठे हैं. मगर उनपर अंतरराष्ट्रीय दबाव है. अर्थव्यवस्था भी बदहाल है. जानकार कहते हैं, ओरटेगा ऐसे नहीं तो वैसे जाएंगे. मगर जाएंगे जरूर. सवाल है कि जाने से पहले वो कितनों की जान लेंगे? इन प्रदर्शनों में जनता की जीत नहीं हुई है अभी. मगर तानाशाही के खिलाफ उनका संघर्ष, अपने हक़ों के लिए की गई उनकी बगावत को सैल्यूट तो बनता है.
ये अक्टूबर की तस्वीर है. पुलिस एक प्रदर्शनकारी को घसीटते हुए ले जा रही है. सरकार के ज़ुल्म से बचने के लिए हज़ारों लोगों को देश छोड़कर भागना पड़ा है. भागकर कोस्टा रिका में शरण लेने वालों की तादाद सबसे ज़्यादा है (फोटो: रॉयटर्स)
ये अक्टूबर की तस्वीर है. पुलिस एक प्रदर्शनकारी को घसीटते हुए ले जा रही है. सरकार के ज़ुल्म से बचने के लिए हज़ारों लोगों को देश छोड़कर भागना पड़ा है. भागकर कोस्टा रिका में शरण लेने वालों की तादाद सबसे ज़्यादा है (फोटो: रॉयटर्स)

 
सरकार सब ठीक हो जाने का ग़लत दावा कर रही है. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं को देशनिकाला दे दिया गया है. मीडिया संस्थानों को काम नहीं करने दिया जा रहा. सरकार की हद ज़्यादतियों के बावजूद लोगों ने पूरी तरह से हार नहीं मानी है (फोटो: रॉयटर्स)
सरकार सब ठीक हो जाने का ग़लत दावा कर रही है. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं को देशनिकाला दे दिया गया है. मीडिया संस्थानों को काम नहीं करने दिया जा रहा. मगर सरकार की हद ज़्यादतियों के बावजूद लोगों ने पूरी तरह से हार नहीं मानी है (फोटो: रॉयटर्स)



पीएम नरेंद्र मोदी को पुदुच्चेरी के किस BJP कार्यकर्ता के सवाल ने मुश्किल में डाल दिया?

देश का सबसे लंबा रेल पुल जिसे देश के तीना प्रधानमंत्रियों की कोशिशों ने बनवाया

Advertisement

Advertisement

()