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फिल्म रिव्यू- मायासभा

'तुम्बाड' वाले राही अनिल बरवे की नई फिल्म 'मायासभा' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

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'मायासभा' को राही अनिल बरवे ने डायरेक्ट किया है.
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30 जनवरी 2026 (अपडेटेड: 30 जनवरी 2026, 11:47 PM IST)
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फिल्म- मायासभा
डायरेक्टर- राही अनिल बरवे
एक्टर्स- जावेद जाफरी, मो. समद, दीपक दामले, वीणा जामकर
रेटिंग- 3 स्टार 

***

'तुम्बाड' के बाद राही अनिल बरवे की नई फिल्म आई है. नाम है 'मायासभा'. ये फिल्म 'तुम्बाड' की रिलीज़ के अगले 6 महीने में शूट हो गई थी. इसका फर्स्ट कट 4 घंटे लंबा था. जिसे काट-छांटकर पौने दो घंटे का बनाने में पांच साल लग गए. और रिलीज़ होने में 8 साल. इसमें भी 'तुम्बाड' की बड़ी भूमिका रही. वो फिल्म तो बड़ी सराही गई. मगर उसके क्रेडिट को लेकर बड़ा घमासान मचा. राही उस स्टिक के सबसे शॉर्टेस्ट एंड पर रहे. हालांकि उसके बाद भी वो लगातार काम करते रहे. 'रक्तब्रह्मांड' से लेकर 'गुलकंदा टेल्स' जैसे शोज़ बने. मगर स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म्स की पॉलिटिक्स और सेफ्टी कंसर्न के चक्कर में आज तक फंसे हुए हैं. इसकी वजह से उनका आगे का काम प्रभावित हुआ. इससे शायद वो थोड़े कड़वे भी हुए.

अब जो फिल्म बनकर आई है, उससे ये तो तय है कि राही को पता है कि वो क्या कर रहे हैं. फिल्ममेकिंग को लेकर उनकी अप्रोच बेहद फ्रेश है. मगर ये फिल्म उनके पिछले 8-10 सालों के संघर्ष का निचोड़ भी है. जिसमें खट्टे-मीठे, दोनों किस्म के अनुभव शामिल रहे. 'मायासभा' उस तरह की फिल्म नहीं बन पाती, जिस तरह से वो राही के दिमाग में घटी थी. मगर आप इस फिल्म को देखते हुए ये महसूस करेंगे कि ये फिल्म भी 'तुम्बाड' वाले यूनिवर्स में भी घटती है. क्योंकि ये भी कमोबेश उन्हीं थीम्स को एक्सप्लोर करने की कोशिश करती है. जिसमें लालच और ऑब्सेशन, दो चीज़ें आपको सबसे ऊपर दिखेंगी. मगर कुरेदने पर आप पाएंगे कि ये एक पिता और पुत्र, असफल प्रेमी और दंभी व्यक्ति की भी कहानी है. इस विषय के ट्रीटमेंट से आपकी सहमति-असहमति हो सकती है. अगर किसी फिल्म पर विमर्श भी न हो सके, तो काहे का आर्ट फॉर्म!  

ख़ैर, संक्षेप में बताएं तो ये एक बीते दौर के फिल्म प्रोड्यूसर परमेश्वर खन्ना की कहानी है. जो बड़ी फिल्म फैमिली से आता है. मगर वो एक लव ट्रायंगल में फंस गया. जिसकी वजह से उसकी निजी और पेशेवर, दोनों ही ज़िंदगियां प्रभावित हुईं. अब वो एक पुराने टूटे-फूटे मायासभा नाम के सिनेमाघर में अपने बेटे वासु के साथ रहता है. उसको मच्छरों से ऐलर्जी है, इसलिए पूरे थिएटर में धुआं करके रखता है. मानों कुछ छिपा रहा हो. अपनी कहानी के अलावा क्या है उसके पास छिपाने को? 40 किलो सोना. दुनिया वालों को लगता है कि उसने वो सोना उसी सिनेमाघर में कहीं छुपा रखा है. कई लोग उसे ढूंढने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं. मगर कहानी में तब एक नया ट्विस्ट आता है, जब परमेश्वर का बेटा अपने दो दोस्तों को उस थिएटर में पार्टी करने के लिए लेकर आता है.  

परमेश्वर खन्ना और थिएटर एक दूसरे के रूपक हैं. एक दौर में जिनकी खूब पूछ थी. मगर आज वो एक ऐसे वीरान खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, जहां जाने में लोगों को घबराहट और घुटन होती है. क्योंकि वो अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पाए. उनका भूत ही उनका वर्तमान और भविष्य, दोनों है. मगर एक चीज़ अब भी बाकी है, जो लोगों को उन तक खींच लाती है. लोभ. 40 किलो सोने का लोभ. जिसका पता सिर्फ परमेश्वर को मालूम है. परमेश्वर का एक मतलब यहां भगवान से भी है. क्योंकि ये आदमी गॉड सिंड्रोम से जूझ रहा है. उसे लगता है कि उसको सबकुछ मालूम है.  

इस फिल्म को देखते वक्त पाएंगे कि जो आपकी नज़रों से छुपा हुआ है, असल फिल्म वहीं घट रही है. इसमें फ्लैशबैक नाम के सिनेमैटिक टूल का बखूबी इस्तेमाल किया गया है. उसका इस्तेमाल न करके. फिल्म चाहती है कि आप परमेश्वर की कहानी को उसकी पर्सपेक्टिव से देखने के बजाय, अपने दिमाग में खुद क्रिएट करें. ये एक दर्शक के तौर पर आपको चैलेंज करती है.

परमेश्वर समय से पीछे चल रहा है. वो एकाकीपन का भी शिकार है. सिनेमाघर में फैला धुआं उसकी मानसिक अवस्था का भी बयान है. जो कि क्लाउडेड हो चला है. वो एक बुरा पिता है. जिसे अपने बेटे से नफरत करना बहुत प्रिय है. जब भी परमेश्वर नाराज़ होता, तो वासु उससे बचने के लिए हेलमेट पहन लेता है. ताकि उस तक सिर्फ शारीरिक ही नहीं, उसके पिता की मानसिक हिंसा भी न पहुंच सके. वासु का रोल उन्हीं मोहम्मद समाद ने किया है, जो 'तुम्बाड' में विनायक के बेटे पांडुरंग बने थे.

'मायासभा' में जावेद जाफरी ने परमेश्वर खन्ना का रोल किया है. जावेद जाफरी को अच्छे डांसर और कॉमिक एक्टर के तौर पर जाना जाता है. इस फिल्म में उन्हें पहली बार मुकम्मल एक्टर के तौर पर काम करने का मौका मिला है. जो उनके फुल पोटेंशियल को अनलॉक करती है. जावेद ने उस आसक्ति को आत्मसात किया है, जो उनके पात्र से अपेक्षित था. हम उम्मीद करेंगे कि ये फिल्म उन्हें अपना कॉमेडियन वाला खांचा तोड़ने में मदद करे. बेहतर और अलग किस्म का काम करने का मौका दे.

'मायासभा' ऑब्सेसिव फिल्ममेकिंग है. जो बनाना है, वो बनाना है. जो पब्लिक को चाहिए, वो नहीं. जो सबसे पर्सनल है, वो सबसे क्रिएटिव है. 'मायासभा' उस किस्म की फिल्म है, जो आपके नज़रिए को चुनौती देती है. आपको एक नई शैली की फिल्ममेकिंग से परिचित करवाती है. नतीजा चाहे जो भी हो.

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