अकेले नहीं हैं लालू के बेटे, इन नेता-पुत्रों में भी सियासत कब्ज़ाने के लिए खूब भसड़ हुई है
पढ़िए, हमारे यहां तो वैसे भी दूसरों के आंगन में झांकने की पुरानी परंपरा रही है.

लालू यादव. उनके दो बेटे. बड़ा तेज प्रताप और छोटा तेजस्वी. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू ने अपने दोनों बेटों को जनता के हवाले कर दिया. फिर जब लालू को चारा घोटाले में जेल हुई, तो पार्टी इन दोनों लड़कों के हवाले हो गई. अब इनके बीच तल्खी की खबरें आ रही हैं. जून के दूसरे सप्ताह में दोनों के बीच खूब उठा-पटक हुई.

तेज प्रताप और तेजस्वी
9 जून को तेज प्रताप का एक वीडियो आया, जिसमें वो राजेंद्र पासवान को पार्टी में सम्मानजनक पद देने की मांग कर रहे हैं. साथ में शिकायत कर रहे हैं कि पार्टी में उनकी सुनी नहीं जा रही है. इसी दिन तेज प्रताप ने एक ट्वीट भी किया, जिसमें लिखा था, 'मेरा सोचना है कि मैं अर्जुन को हस्तिनापुर की गद्दी पर बिठाऊं और खुद द्वारका चला जाऊं. अब कुछेक 'चुगलों' को कष्ट है कि कहीं मैं किंग-मेकर न कहलाऊं.'

तेज प्रताप का ट्वीट
फिर 10 जून को तेजस्वी ने बयान दिया कि दोनों भाइयों के बीच सब कुछ ठीक है और कोई झगड़ा नहीं है. तेजस्वी ने इस बात से इनकार किया कि पार्टी में तेज प्रताप की बातों को नज़रअंदाज किया जा रहा है. 11 जून को लालू के जन्मदिन पर दोनों भाई साथ नज़र आए और मां राबड़ी देवी ने कहा कि न तो पार्टी में कोई झगड़ा है और न परिवार में. सब कुछ ठीक है.

लालू के जन्मदिन पर राबड़ी के साथ दोनों बेटे
वैसे अंदरखाने की खबर रखने वाले बताते हैं कि ये सारा झगड़ा पार्टी अध्यक्ष को लेकर है. तेज प्रताप को मौजूदा अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे से तकलीफ है कि वो मनमाने तरीके से पार्टी चला रहे हैं. पूर्वे को एक तरफ रख दें, तो तेज प्रताप राजेंद्र पासवान को अगला अध्यक्ष बनाना चाहते हैं, वहीं तेजस्वी शिवचंद्र राम को. अध्यक्ष कौन होगा ये तो पता नहीं, लेकिन राजेंद्र पासवान को पार्टी महासचिव बनाकर तेज प्रताप की नाराज़गी कम कर दी गई है.

महासचिव बनने पर तेज प्रताप के साथ राजेंद्र पासवान
लेकिन ये पहली बार है कि दो भाइयों के बीच हाय-तौबा मची हो. भारत की राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं. आइए, तीन बड़े उदाहरणों पर बात करते हैं:
1. ओम प्रकाश चौटाला और रंजीत सिंह
1987 में लोकदल के नेतृत्व में बने गठबंधन को तगड़ी जीत दिलाकर दूसरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने देवीलाल को अपने दोनों बेटों से जूझना पड़ा था. उस चुनाव में देवीलाल के खेमे को 90 में से 85 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस 5 सीटों पर सिमट गई थी. उस समय देवीलाल 74 साल के थे. उनके बड़े बेटे ओम प्रकाश चौटाला 52 और छोटे बेटे रंजीत 43 साल के थे, जो दोनों पिता की राजनीतिक विरासत पर दावा ठोंक रहे थे. अक्टूबर-नवंबर 1988 के दौरान ये विवाद खुलकर सामने आया.
देवी लाल, जिन्हें 'शेर ए हरियाणा' कहा गया
उस दौरान गृहमंत्री संपत सिंह पर हरियाणा पुलिस के 3500 कॉन्स्टेबल की भर्ती में फर्जीवाड़े का आरोप लगा था. देवीलाल इस बात से खफा थे कि संपत ने सभी जिलों और तहसीलों से मेरिट के आधार पर लोगों की भर्ती करने के निर्देश को नहीं माना. बाद में देवीलाल ने ये भी कहा, 'मैंने DG से भी कहा था कि वो इस भर्ती के सिलसिले में संपत की बात न मानें.' इस बवाल के बाद कैबिनेट से निकाले जाने के डर से संपत ने इस्तीफा दे दिया, ताकि वो देवीलाल से जता सकें कि वो उनके लिए ईमानदार हैं. विवाद की वजह से देवीलाल को वेकेंसीज़ दोगुनी करनी पड़ीं.

ओम प्रकाश चौटाला और रंजीत चौटाला (बाएं से दाएं)
हरियाणा में ऐसा नेपोटिज़्म कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन बवाल तब बड़ा हो गया, जब पता चला कि संपत सिंह का फर्जीवाड़ा उजागर करने वाले केवी सिंह रंजीत सिंह के करीबी थे. जबकि इस खुलासे से सबसे ज़्यादा नुकसान संपत सिंह को हुआ, जो चौटाला के करीबी थे. संपत के इस्तीफे से चौटाला गुस्सा हो गए. चौटाला ने 15 अक्टूबर की रात करीब 10 बजे अपने पिता को मुंबई से बुलाया और विद्रोह की धमकी दी. रिपोर्ट्स के मुताबिक चौटाला ने पिता को धमकी दी कि अगर संपत की मुश्किलें कम नहीं हुईं, तो रोज एक मंत्री और विधायक इस्तीफा देना शुरू कर देंगे.

चौटाला के बगलगीर संपत सिंह
देवीलाल इससे इतना आहत हुए कि उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के एक करेस्पॉन्डेंट को बुलाकर ऐलान कर दिया कि अगले दिन वो सीएम पद से इस्तीफा दे देंगे. रंजीत को डर था कि चौटाला इन हालात का फायदा उठाकर खुद को स्थापित कर लेंगे, ऐसे में उनके समर्थक रण सिंह मान ने वीपी सिंह, बीजू पटनायक और जॉर्ज फर्नांडिस को फोन करके कहा कि वो देवीलाल को इस्तीफा न देने के लिए मनाएं. पटनायक और फर्नांडिस ने देवीलाल को फोन किया, लेकिन आखिर वो माने वीपी सिंह के वीटो के बाद, जो खुद उनसे बात करने चंडीगढ़ गए थे. इसके बाद देवीलाल ने संपत सिंह का इस्तीफा गवर्नर को नहीं भेजा.

ओम प्रकाश चौटाला, जो बाद में खुद टीचर भर्ती घोटाले में फंसे
इसके बाद से चौटाला और रंजीत खुलकर एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करने लगे थे. मेहम हिंसा के बाद रंजीत ने चौटाला के खिलाफ खुलकर बगावत कर दी. मार्च 2004 में रंजीत बीजेपी में शामिल हो गए थे. बीजेपी में शामिल होने से पहले वो करीब 10 साल तक कांग्रेस में भी रहे.
2. एमके स्टालिन और एमके अलागिरि
DMK मुखिया करुणानिधि के अपनी दूसरी पत्नी दयालु अम्मल से दो बेटे हुए- बड़े अलागिरि और छोटे स्टालिन. सियासत में आने के बाद से इनके रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे. पार्टी में किसकी चलेगी, इसे लेकर दोनों में हमेशा झगड़ा रहा. यहां भी लालू के परिवार जैसा हाल है कि छोटा बेटा राजनीतिक रूप से ज़्यादा सक्रिय है, जबकि बड़ा वाला पिता, पार्टी और जनता के बीच जगह बनाने को लेकर संघर्ष कर रहा है.

पिता करुणानिधि के साथ दोनों बेटे. बाएं खड़े हैं अलागिरि और दाएं हैं स्टालिन.
इनका झगड़ा 2010 के आसपास सामने आया, जब करुणानिधि ने इंटरनेशनल तमिल मीट आयोजित की. पार्टी में सम्मान न मिलने को वजह बताकर अलागिरि ने इस मीट का बायकॉट किया और उनके समर्थकों ने मीट में नारेबाजी की. फिर 2013 में दोनों भाइयों के बीच बात और खराब हो गई, जब अलागिरि चाहते थे कि DMK केंद्र की सरकार में UPA के साथ बनी रहे, जबकि स्टालिन चाहते थे कि करुणानिधि गठबंधन तोड़ लें.

एमके अलागिरि
एक इंटरव्यू में करुणानिधि ने कहा था, '24 जनवरी 2014 को अलागिरि मेरे पास आया और स्टालिन की शिकायत करने लगा. उसके शब्दों से मुझे बुरा लगा. वो कहने लगा कि स्टालिन तीन महीने में मर जाएगा. कोई पिता अपने बेटे के लिए ऐसे शब्द बर्दाश्त नहीं कर सकता.' इस प्रकरण के बाद अलागिरि को पार्टी से निकाल दिया गया और तब से वो लो-प्रोफाइल में चल रहे हैं.

एमके स्टालिन
अलागिरि को पार्टी से निकालने के बाद भी दोनों भाइयों में रिश्ते ठीक नहीं हुए हैं. दिसंबर 2017 में अलागिरि ने बयान दिया कि स्टालिन के नेतृत्व में DMK स्थानीय चुनाव भी जीत नहीं पाएगी. वहीं फरवरी 2018 में जब अलागिरि से स्टालिन के बेटे उदयनिधि के सियासत में आने पर सवाल पूछा गया, तो अलागिरि ने कहा, 'राजनीति तो गटर है. इसमें कोई भी आ सकता है.' हां, मजे की बात ये है कि करुणानिधि 94 साल के हो गए हैं और स्टालिन अब भी ये कहते हैं कि अगली बार DMK सत्ता में आई, तो CM करुणानिधि बनेंगे.

पिता करुमानिधि के साथ स्टालिन
3. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे
ये दोनों सगे भाई नहीं हैं, चचेरे भाई हैं, लेकिन बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत को लेकर बराबर के साझीदार थे. इस प्रतियोगिता में बाजी मारी बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे ने, जो शिवसेना के मुखिया बना दिए गए. जबकि बाल ठाकरे के छोटे भाई श्रीकांत ठाकरे के बेटे राज ठाकरे को अपनी अलग पार्टी बनानी पड़ी. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना.

राज ठाकरे, बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे (बाएं से दाएं)
उद्धव और राज की अदावत का कोई एक किस्सा नहीं है. दोनों के बीच ये भाव हमेशा से था, क्योंकि बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी का सवाल समय-समय पर उठता रहता था. 2000 के आसपास से उद्धव शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' का काम देख रहे थे और पॉलिटिकल कैंपेन में एक्टिव रहते थे. 2002 में जब उनकी पार्टी ने BMC चुनाव जीता, तो जनवरी 2003 में उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया. उद्धव के शिवसेना के दिग्गज नेता नारायण राणे से भी खटपट रही, जिसका नतीजा ये निकला कि उन्हें पार्टी से बाहर जाना पड़ा.

राज ठाकरे
उद्धव तो पार्टी में हमेशा से थे और लगातार पद भी पा रहे थे. जब राज ठाकरे को लगा कि शिवसेना की कमान उनके हाथ नहीं आनी है, तो 2006 में उन्होंने अपनी पार्टी 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' बना ली. पार्टी के गठन पर उन्होंने बयान दिया था कि उनकी बाल ठाकरे से कोई शत्रुता नहीं है, वो उनके राजनीतिक गुरु थे, हैं और हमेशा रहेंगे.
ये अलग बात है कि राज में बाल ठाकरे की झलक देखने वाले राजनीतिक पंडित हमेशा से राज को ही बाल ठाकरे का असल वारिस मानते आए हैं. फिर वो चाहें 'मार्मिक' के लिए कार्टून बनाना हो, उत्तर भारतीयों और पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध करना हो या अपने विरोधियों को लेकर हमेशा आक्रामक रहना हो. उद्धव का स्वभाव और तौर-तरीके बाल ठाकरे और राज ठाकरे से मिलते-जुलते नहीं हैं. पर दोनों भाइयों की कलह नई पार्टी बनने के बाद भी खत्म नहीं हुई. अक्टूबर 2011 में ये खबर भी आई थी कि राज का हिस्सा काटने के लिए उद्धव ठाकरे ने बाल ठाकरे की लिखी वसीयत से छेड़छाड़ की थी. हां, बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार में दोनों भाई कंधा जोड़े नज़र आए थे.

बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार में राज और बाल ठाकरे
वैसे ऐसा नहीं है कि भारतीय राजनीति ने हमेशा भाइयों के झगड़े के उदाहरण ही पेश किए हैं. हमारे सामने विद्या चरण शुक्ला और श्यामा चरण शुक्ला का भी उदाहरण है. आइए, इनके बारे में भी जान लेते हैं:
1. विद्या चरण शुक्ला और श्यामा चरण शुक्ला
मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ला के सात बच्चे हुए. इनमें से राजनीति में जिन दो ने नाम कमाया, वो हैं विद्या चरण शुक्ला और श्यामा चरण शुक्ला. किसी परिवार में राजनीतिक विरासत को कैसे संभाला जाए, ये दोनों भाई इसके शानदार उदाहरण हैं. श्यामा चरण शुक्ला बड़े थे, जो सूबे की सियासत देखते थे और वीसी शुक्ला छोटे थे, जो केंद्र की सियासत देखते थे. ये दोनों रायपुर में पैदा हुए थे और अभी जो इलाका छत्तीसगढ़ में आता है, वहीं इनकी सियासत फली-फूली.

पं. रविशंकर शुक्ला
वीसी शुक्ला ने पहला चुनाव नेहरू के दौर में 1957 में लड़ा था. तब वो 30 साल के भी नहीं थे और चुनाव जीत गए थे. फिर इन्होंने लगातार 9 लोकसभा चुनाव जीते. 1966 में जब इंदिरा पीएम बनीं, तो वीसी कैबिनेट मंत्री बनाए गए. तब से राजीव और पीवी नरसिम्हा राव के दौर तक कई विभाग संभाले. इंदिरा के दौर में सूचना-प्रसारण मंत्री के इनके कार्यकाल का खूब ज़िक्र होता है. फिर वो चाहे AIR पर किशोर कुमार के गाने बैन कराने हों, इमरजेंसी में मीडिया को काबू करना हो या 'किस्सा कुर्सी का' के प्रिंट नष्ट कराने हों.

इंदिरा गांधी के साथ विद्या चरण शुक्ला
हालांकि, इनकी निष्ठा कई बार बदली. राजीव कैबिनेट में मंत्री बनने के बावजूद इन्होंने बगावत कर दी और अरुण नेहरू और वीपी सिंह वाले जन मोर्चा में चले गए. वीपी सिंह के अंडर मंत्री रहे, फिर चंद्रशेखर के खेमे में गए और उनके पीएम रहते मंत्री बने. जनता दल के बाद वो फिर कांग्रेस में लौटे और नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री बने. 2003 में NCP की छत्तीसगढ़ यूनिट में शामिल हुए और 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी जॉइन कर ली. हालांकि, बीजेपी के टिकट पर चुनाव हारे, तो फिर कांग्रेस में आने के लिए हाथ-पैर मारने लगे. आखिरकार 2007 में सोनिया ने इन्हें वापस कांग्रेस में ले लिया.

विद्या चरण शुक्ला
इनकी मौत दुखद रही. 2013 में जब ये कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का हिस्सा थे, तो 25 मई 2013 को बस्तर में हुए माओवादी हमले में इन्हें तीन गोलियां लगीं. छत्तीसगढ़ में इलाज के बाद इन्हें गुड़गांव के मेदांता हॉस्पिटल लाया गया, लेकिन बचाया नहीं जा सका.

श्यामा चरण शुक्ला (तिलक लगाए)
वहीं इनके भाई श्यामा चरण शुक्ला ने मध्य प्रदेश में पिता की विरासत संभाली. वो तीन बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. पहला कार्यकाल मार्च 1969 से जनवरी 1972 तक रहा. दूसरा कार्यकाल दिसंबर 1975 से अप्रैल 1977 तक रहा. तीसरा कार्यकाल दिसंबर 1989 से 1990 तक रहा. 1999 में महासमुंद से ये सांसद भी बने थे. भारतीय सियासत में इन्हें शुक्ला बंधुओं के नाम से जाना जाता है. इनकी जोड़ी से अर्जुन सिंह को खूब दिक्कत होती थी, जिन्हें कांग्रेस ने सीएम बनाकर एमपी भेजा था. स्थानीय सियासत में इनका दखल दशकों तक रहा
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