कश्मीर के बांदीपुरा में 11 अक्टूबर को सेना और आतंकवादियों के बीच एनकाउंटर हुआ,जिसमें एयरफोर्स के दो गरुड़ कमांडो- सार्जेंट के. मिलिंद किशोर और कारपोरल नीलेशकुमार नयन शहीद हो गए. उन्हें चंडीगढ़ में श्रद्धांजलि दी गई. ऐसा पहली बार हुआ, जबकिसी टेरेरिस्ट एनकाउंटर में गरुड़ कमांडोज़ शहीद हुए हों. ये जानकर हमें गरुड़कमांडोज़ के बारे में क्यूरॉसिटी हुई. जानना ज़रूरी है कि आखिर ये कौन हैं, कहां सेआते हैं, कहां तैनात किए जाते हैं, कैसे तैयार किए जाते हैं.बांदीपुरा एनकाउंटर में शहीद हुए गरुड़ कमांडो के. मिलिंद किशोर (बाएं) और नीलेशकुमार नयन (दाएं)पहले से मौजूद इन्फर्मेशन के अलावा जब हमने एयर मार्शल पीएस अहलूवालिया और एयरफोर्सके विंग कमांडर अनुपम बनर्जी से बात की, तो हमें काफी-कुछ पता चला. हमें जो पताचला, वो हम आपके लिए भी ले आए. गरुड़ कमांडोज़ इंडियन एयरफोर्स की स्पेशल यूनिट है.एयर मार्शल पीएस अहलूवालिया#1. साल 2001 में जम्मू-कश्मीर के एयरफोर्स के दो बड़े बेस पर आतंकी हमला हुआ था.ऐसे हालात में हथियारबंद फोर्सेस के पहुंचने में वक्त लगता है. अब उस समय एयरफोर्सस्टैबलिशमेंट की सुरक्षा कौन करे, तो एयरफोर्स को ऐसी फोर्स की ज़रूरत महसूस हुई,जो हमले, बचाव और क्रिटिकल हालात में दुश्मन को तुरंत जवाब दे सके. ऐसे कमांडो, जोआर्मी की तरह काम कर सकें और आतंकियों से लड़ सकें. तो अक्टूबर 2002 में इस प्लानपर काम शुरू हो गया और 2004 तक फोर्स बन गई. पहले इसका नाम 'टाइगर फोर्स' रखा गयाथा, जिसे बाद में 'गरुड़ फोर्स' कर दिया गया. हिंदू मान्यताओं में गरुड़ भगवानविष्णु के वाहन बताए गए हैं.गरुड़ से याद आया: भगवान विष्णु के वाहन के लिए ऐसे हुआ था गरुड़ का रिक्रूटमेंटगरुड़#2. सितंबर 2003 में जब भारत सरकार ने इस फोर्स की मंजूरी दी, तो सबसे पहले 100वॉलंटियर्स को ट्रेनिंग दी गई, जिनमें से 62 आखिर में चुने गए. जैसे आर्मी के पासपैरा कमांडोज़ होते हैं, नेवी के पास मारकोज़ होते हैं, उसी तरह अब एयरफोर्स के पासगरुड़ कमांडोज़ होने लगे. ये डायरेक्ट एक्शन ले सकते हैं, हवाई हमला कर सकते हैं,स्पेशल ऑपरेशन चला सकते हैं, ज़मीनी लड़ाई लड़ सकते हैं, विद्रोह संभाल सकते हैं,सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन भी कर सकते हैं. ये वॉर-टाइम और पीस-टाइम, दोनों वक्त मेंकाम आते हैं.मारकोज़#3. गरुड़ कमांडोज़ की तादाद सीक्रेट है, लेकिन अनुमान लगाया जाता है कि पठानकोटहमले से पहले इनकी संख्या 1080 थी, जो हमले के बाद बढ़ाकर 1780 कर दी गई है. लेकिनइनका सेलेक्शन ऐसे नहीं होता है कि एयरफोर्स या दूसरी जगहों से वॉलंटियर बुला लिएगए. पहले बैच में एयरफोर्स के वो वॉलंटियर थे, जिन्हें आंध्र प्रदेश वाली एकेडमीमें ट्रेंड किया गया था. उसके बाद से बाकायदा विज्ञापन आता है और सीधी भर्ती होतीहै. चुने गए कमांडे पूरे करियर भर गरुड़ में ही रहते हैं. वैसे इन्हें एयरफोर्स कासारा ले-आउट पता होता है.इंडियन एयरफोर्स की कैप#4. भर्ती के बाद नंबर आता है ट्रेनिंग का, जो बहुत रगड़कर होती है. इनकी ट्रेनिंगएक से लेकर तीन साल तक चलती है, जो इंडियन स्पेशल फोर्सेस में सबसे ज्यादा वक्त कीट्रेनिंग है. मुश्किल भी उतनी, जितनी 'मारकोज' और 'पैरा कमांडोज़' की होती है.अलग-अलग फेज़ में देख की कई ट्रेनिंग एकेडमी में में इनकी ट्रेनिंग होती है. जैसेपैराशूट ट्रेनिंग स्कूल, नेवी का डाइविंग स्कूल और आर्मी का जंगल वारफेयर स्कूल.नेशनल सिक्यॉरिटी गार्ड्स (NSG) के साथ भी ट्रेनिंग होती है, जिन्हें ताज होटल परहमले के वक्त याद किया गया था.गरुड़#5. ट्रेनिंग में शरीर को फौलाद बना दिया जाता है. दौड़ना, चढ़ना, कूदना, रेंगना,एक्सरसाइज और न जाने क्या-क्या सिखाते हैं. ऐसा पोढ़ा कर देते हैं कि हाइजैकसिचुएशन हो, जंगल में लड़ना हो या पानी-हवा में. लड़के हर जगह लड़ लेंगे. पिस्टल,असॉल्ट रायफल, कार्बाइन और क्लाश्निकोव रायफल जैसे ढेर सारे हथियार चलाने कीट्रेनिंग दी जाती है. बस यूं समझ लीजिए कि ट्रेनिंग इतनी तगड़ी होती है कि आधे सेज्यादा लड़के कुछ ही महीने में वापस भाग जाते हैं. जो बचते हैं, वो गोली से लेकर बमऔर माइन्स तक, सब हैंडल कर लेते हैं.गरुड़#6. एयर मार्शल अहलूवालिया एक बात ज़ोर देकर बताते हैं कि फिज़िकल से ज्यादा फोकसतो मेंटल ट्रेनिंग पर होता है. कहते हैं कि स्टैमिना होना ज़रूरी है, लेकिनऐटीट्यूट उससे भी ज़रूरी है. आतंकवादियों के साथ डील करना आना चाहिए. किसी बिल्डिंगमें लोग फंसे हों, तो उन्हें निकालना आना चाहिए. इमोशनली या दिमाग से कमज़ोर पड़नेका तो ऑप्शन ही नहीं होता है. बाकी हथियार चलाना तो एकेडमी में सिखा ही दिया जाताहै.पठानकोट एयरबेस, जिस पर हमला हुआ था#7. 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमले के बाद से इन कमांडोज़ को आतंकी हमले की असलसिचुएशन से फैमिलियर कराने के लिए अलग-अलग जगहों पर आर्मी के साथ अटैच किया गया. उसहमले से निपटने में भी इनकी मदद ली गई थी. एंटी-टेरेरिज़्म ऑपरेशन करेंगे, तो खुदही समझ जाएंगे कि आतंकियों से कैसे निपटना है. कुछ जगहों पर इन्हें CRPF के साथ भीतैनात किया गया है. गरुड़ कमांडोज़ में ऑफिसर्स और नॉन-ऑफिसर्स, दोनों होते हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:पहले एयरफोर्स मार्शल अर्जन सिंह के 4 किस्से, जो शरीर में खून की गर्मी बढ़ा देंगेये 8 टॉर्चर पाकिस्तान से रिहा हुए सैनिक चंदू बाबूलाल ने भी तो सहे होंगे!13 अक्टूबर भारतीय सेना के सिर पर लगा ऐसा दाग है, जो आज तक नहीं मिटातो इस खुन्नस में पाकिस्तान ने दी जाधव को मौत की सजा!