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फिल्म रिव्यू- कल्कि 2898 AD

Kalki 2898 AD साई-फाई, फ्यूचरिस्टिक और मायथोलॉजिकल सिनेमा बनाने की ओर भारत का मजबूत कदम है. फिल्म का थर्ड एक्ट इसे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक बना देता है.

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अमिताभ बच्चन ने पूरी फिल्म में प्रभास को ओवरशैडो कर दिया है. ये बात सुनने में अजीब लग रही है. इसीलिए आपको ये फिल्म देखनी चाहिए.
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27 जून 2024 (Updated: 27 जून 2024, 16:04 IST)
Updated: 27 जून 2024 16:04 IST
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फिल्म- कल्कि 2898 AD
डायरेक्टर- नाग अश्विन
एक्टर्स- अमिताभ बच्चन, कमल हासन, प्रभास, दीपिका पादुकोण, दिशा पाटनी, अना बेन 
रेटिंग- *** (3 स्टार)

***

Kalki 2898 AD देखने के बाद मैंने आधे घंटे तक सोचा कि इसका रिव्यू कैसे शुरू किया जाए. तकरीबन इतना ही समय मेकर्स ने प्रभास के इंट्रोडक्ट्री सीन में लिया है. वो सीक्वेंस खत्म ही नहीं होता है. न कॉमिक पंच लैंड हो रहे हैं, न लिटरल पंचेज़. बावजूद इसके वो सीन खिंचता चला जा रहा है. हालांकि इसमें कोई दोराय नहीं है कि नाग अश्विन ने एक यूनिक फिल्म बनाने की कोशिश की है. जैसा भारतीय सिनेमा में कभी कुछ नहीं बना. उन्होंने विज़ुअल्स के मामले में अपने विज़न से कोई समझौता नहीं किया है. वो चीज़ स्क्रीन पर नज़र आती है. मगर फिल्म की राइटिंग, उसकी विज़ुअल स्टोरीटेलिंग वाली ब्रिलियंस को मैच नहीं कर पाती. इसलिए इतनी महत्वकांक्षी फिल्म होने के बावजूद 'कल्कि 2898 AD' औसत से थोड़ी बेहतर फिल्म बनकर रह जाती है. जो कि बड़े अफसोस की बात है. बावजूद इसके 'कल्कि', 'बाहुबली' के बाद प्रभास की सबसे बेहतर फिल्म साबित होती है. क्यों और कैसे, उसके लिए नीचे चलिए.  

'कल्कि' की शुरुआत होती है महाभारत से जहां अश्वत्थामा को शाप मिलता है कि तब तक धरती पर जीवित रहेंगे, जब तक कृष्ण खुद आकर उन्हें मोक्ष नहीं देते. उसके बाद कहानी 6000 साल आगे पहुंच जाती है यानी 2898 AD में. पूरा देश रेगिस्तान बन चुका है. मानव सभ्यता काशी तक महदूद रह गई है. इस पूरी दुनिया को चलाता है सुप्रीम यास्किन और उसकी नकाबपोश सेना. काशी में उसकी एक तिकोनी बिल्डिंग है, जिसका नाम है कॉम्प्लेक्स. यहां पर फर्टाइल महिलाओं को एक खास वजह से कैद करके रखा जाता है. जो भी यास्किन की मदद करता है, उसे कुछ यूनिट मिलते हैं. जो भी 1 मिलियन यूनिट पूरा कर लेगा, उसे पूरी सुख-सुविधा से रहने के लिए कॉम्प्लेक्स में भेज दिया जाएगा. यहीं सीन में आता है भैरवा. वो बाउंटी हंटर है. उसका एक ही मक़सद है- कॉम्प्लेक्स में पहुंचना. एक अचानक कुछ ऐसा होता है कि कॉम्प्लेक्स से एक प्रेग्नेंट महिला फरार हो जाती है. उसको ढूंढने के दौरान यास्किन की सेना, भैरवा और अश्वत्थामा आपस में टकराते हैं. मैंने इस कहानी अपने हिसाब काफी सिम्प्लिफाई करके बताया है. आपको फिल्म देखते हुए ये कहानी याद भी नहीं रहेगी. क्योंकि मामला काफी फैला हुआ है.

जब आप 'कल्कि' देखेंगे, तो आपको 'मैड मैक्स: फ्यूरी रोड', 'स्टार वॉर्स', 'ड्यून' और मार्वल फिल्मों की याद आएगी. मगर इन फिल्मों से जैसे इमोशन आपको 'कल्कि' में नहीं मिलेंगे. आप किसी भी मौके पर फिल्म से कनेक्टेड महसूस नहीं करेंगे. ये इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी है. आप कोई फिल्म बनाने का निर्णय इसलिए लेते हैं क्योंकि आपके पास एक ऐसी कहानी, जो आप दुनियाभर को सुनाना चाहते हैं. मगर इस फिल्म का ये मक़सद कभी नहीं लगता. 'कल्कि' सिर्फ विज़ुअल्स के सहारे खुद को बेचने की कोशिश करती है. जो कि एक दर्शक होने के नाते मेरे लिए नाकाफी है. आखिर में ये फिल्म खुद को रीडीम करने की मजबूत कोशिश करती है. और ऑलमोस्ट सफल हो जाती है.  

फिल्म का फर्स्ट हाफ बिल्ड-अप यानी कहानी की सेटिंग में जाता है. अगर इंटरवल ब्लॉक को छोड़ दें, तो इस डेढ़ घंटे में कोई भी सीन आपके भीतर खीझ और निराशा के अलावा कोई भाव पैदा नहीं कर पाता. एक के बाद एक ऐसी चीज़ें घटित हो रही हैं, जिनका मेन प्लॉट से कोई लेना-देना नहीं है. कहीं कॉमेडी चल रही है, जिस पर बिल्कुल हंसी नहीं आती. कहीं प्रेम कहानी चल रही है, जो आगे कहीं नहीं दिखती. बेमतलब के कैमियोज़ हो रहे हैं, जो कहानी में रत्तीभर का वैल्यू ऐडिशन नहीं कर रहे. ऐसा लगता है कि मेकर्स भी दर्शकों की तरह इंटरवल का इंतज़ार कर रहे हैं. क्योंकि असली फिल्म उसके बाद शुरू होती है.

'कल्कि' इंटरवल के बाद अपनी कमर कसती है. थोड़ी गंभीर होती है. कहानी खुलनी शुरू होती है. भैरवा और अश्वत्थामा के बीच एक फाइट सीक्वेंस है, जो फिल्म से आपकी उम्मीदें बढ़ाता है. फिल्म में अमिताभ बच्चन ने अश्वत्थामा का रोल किया है. हमने अमिताभ को उनके एंग्री यंग मैन वाले दौर में नहीं देखा. मगर इस फिल्म में उनकी जो कमाल स्क्रीन प्रेज़ेंस है, वो बताती है कि 70-80 के दशक में वो उनकी फिल्में टिकट खिड़की पर क्यों तांडव मचाती थीं. भले इस फिल्म को लोग प्रभास के नाम पर देखने आएं. मगर 'कल्कि' के असली हीरो बच्चन हैं. अमिताभ ने इस पूरी फिल्म में प्रभास को ओवरशैडो करके रखा है. जो कि सुनने में यकीन से परे लगता है. इसीलिए आपको सिनेमाघरों में जाकर ये फिल्म देखनी चाहिए.

'कल्कि' आखिर के 40-45 मिनट में अपने पूरे रंग में आती. तब आपको समझ आता है कि नाग अश्विन असल में क्या करने की कोशिश कर रहे थे. भयानक लेवल की विज़ुअल स्टोरीटेलिंग. शानदार VFX. और जबरदस्त एक्शन. पहली बार आप अपनी कुर्सियों से चिपके फिल्म में पूरी तरह इनवेस्टेड होते हैं. प्रॉपर थिएटर एक्सपीरियंस. यही सीन कम्युनिटी व्यूइंग जैसे कॉन्सेप्ट के बारे में आपकी राय को और पुख्ता करती है. सिर्फ यही एक सीन 'कल्कि' को भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक बना देती है.

प्रभास ने फिल्म में भैरवा का रोल किया है. जिसकी एक सतही और अधपकी सी बैकस्टोरी है. प्रभास एक बार फिर बताते हैं कि वो अच्छे एक्टर नहीं हैं. मगर एलीवेशन सीन्स में उनके स्टारडम का कोई सानी नहीं है. वो फिल्म के क्लामैक्स में फॉर्म में आते हैं और तोड़फोड़ मचा देते हैं. उसके अलावा वो फिल्म के अधिकतर हिस्सों में स्लीपवॉकिंग करते पाए जाते हैं. अमिताभ के साथ जो उनका एक्शन सीक्वेंस है, उसमें उनका काम अच्छा लगता है. दीपिका ने फिल्म में सुमती नाम की उस लड़की का रोल किया है, तो कॉम्प्लेक्स से फरार हो जाती है. वो इस फिल्म का सबसे ज़रूरी किरदार है. मगर दीपिका के पास परफॉर्म करने का कोई स्कोप नहीं है. वो कमोबेश हर सीन में सिर्फ दुखी नज़र आती हैं. कमल हासन ने सुप्रीम यास्किन का कैरेक्टर प्ले किया है. मगर वो इस फिल्म में बमुश्किल दो-तीन सीन्स में नज़र आते हैं. उनका किरदार 'कल्कि' के अगले पार्ट में फुल-फ्लेज्ड रोल में नज़र आएगा. इस वादे के साथ ये फिल्म खत्म होती है. 

'कल्कि' में देशभर की इंडस्ट्री के कई एक्टर्स और फिल्ममेकर्स ने गेस्ट रोल्स किए हैं. मगर उनमें से कोई भी कैमियो ऐसा नहीं है, जो कथानक से लिहाज से बेहद ज़रूरी है. कुछ कैमियोज़ तो ऐसे हैं, जिनकी फिल्म में ज़रूरत ही नहीं थी. और कुछ कैमियो ऐसे हैं, जो रोल कोई दूसरा एक्टर भी करता, तो उससे फिल्म पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. बेसिकली एक्टर्स का कैमियो फिल्म में कुछ नया या अलग नहीं जोड़ता है. न ही दर्शकों को एक्साइट कर पाता है. राजामौली और प्रभास के बीच एक सीन है, जिसमें 'बाहुबली' से जुड़ा इन्साइड जोक सुनने को मिलता है. वो फनी लगता है.

शेष, 'कल्कि 2898 AD' साई-फाई, फ्यूचरिस्टिक और मायथोलॉजिकल सिनेमा बनाने की ओर भारत का मजबूत कदम है. जब इस फिल्म का पहला पोस्टर रिलीज़ हुआ था, VFX वर्क को लेकर बड़ा हंगामा हुआ. डायरेक्टर नाग अश्विन ने लोगों की बातें सुनीं. उस हिसाब से फिल्म में ज़रूरी सुधार किए. ऐसे में हम उम्मीद करेंगे कि उन्हें इस फिल्म को लेकर जो भी फीडबैक मिल रहे हैं, वो उस पर काम करेंगे. और इस फ्रैंचाइज़ के अगले हिस्सों में इससे बेहतर फिल्में देंगे. मगर 'कल्कि' की खूबियों और खामियों को जानने-समझने के लिए आपको ये फिल्म खुद सिनेमाघरों में जाकर देखनी चाहिए. क्योंकि ये फिल्म चाहे जो हो, थिएट्रिकल एक्सपीरियंस तो है ही. 
 

वीडियो: Kalki 2898 AD का अश्वत्थामा जो कभी भी नहीं मरेगा

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