फिल्म रिव्यू- इक्कीस
कैसी है परमवीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल की बायोपिक 'इक्कीस', जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

फिल्म- इक्कीस
डायरेक्टर- श्रीराम राघवन
राइटर- श्रीराम राघवन, पूजा लढ़ा सुरती, अरिजीत बिस्वास
एक्टर्स- अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, एकावली खन्ना, विवान शाह, सिकंदर खेर, राहुल देव, अवनी राय
रेटिंग- 3.5 स्टार्स
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श्रीराम राघवन ने 'इक्कीस' नाम की एक फिल्म बनाई है. ये सेकंड लेफ्टीनेंट परमवीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल की बायोपिक है. 1971 की इंडिया-पाकिस्तान युद्ध पर आधारित एक एंटी-वॉर फिल्म. दुनियाभर के कोलाहल के बीच एक ऐसी फिल्म जो शांति की अपील करती है. शांति एक ऐसा कॉन्सेप्ट है, जो सुनने-देखने में बहुत रोचक या आकर्षक नहीं लगता. मगर जब आप 'इक्कीस' देखते हैं, तो आपको एक किस्म का कॉन्ट्राडिक्शन फील होता है. ये फिल्म दो टाइमलाइन्स में घटती है. पहली, 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान. दूसरी, इसके ठीक 30 साल बाद. 2001 में. जब बिग्रेडियर मदन खेत्रपाल अपने कॉलेज रीयूनियन के लिए लाहौर जाते हैं. जैसे ही जंग अपने चरम पर पहुंचती है, ये फिल्म 2001 में चली जाती है. जहां युद्ध की निरर्थकता, उसकी विभीषिका की बात हो रही है. जिसे अंग्रेजी में जक्स्टापोजिशन कहा गया है.
ये अरुण खेत्रपाल की मौत का दोष पाकिस्तान को नहीं, युद्ध को देती है. उनकी वीरगति का सम्मान करती है. मगर उसे सेलीब्रेट नहीं करती. युद्ध होना चाहिए या नहीं, ये भारी सवाल है. इसके कई आयाम है, जिसमें जाना बेजा है. इसलिए अपन सिर्फ फिल्म पर फोकस करते हैं.
यूं तो इस फिल्म के नायक अरुण खेत्रपाल हैं. मगर इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा उन दो लोगों के बीच घटता है, जिन्हें उस जंग ने बेहद गहरे ज़ख्म दिए हैं. रिटायर्ड पाकिस्तान आर्मी ऑफिसर निसार और अरुण के पिता ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल. इनमें से एक आदमी गिल्ट में गला जा रहा है. दूसरे के जेहन में कई सवाल हैं. मगर उसे नहीं पता कि वो सवाल पूछे किससे. एक दिन इन दोनों लोगों की मुलाकात होती है. ये फिल्म उस मुलाकात का बाय-प्रोडक्ट है.
जब हर तरफ जंग के लिए ललकारने, बदले की भूख से बेहाल, खून से सनी फिल्में बन रही हैं. उसी दौरान 'इक्कीस' आती है. जिसमें बॉर्डर पर जवान नहीं, इंसान मर रहे हैं. वो उस टीस को क्लोज-अप में देखती है. मरने और मारने वाले, दोनों के पर्सपेक्टिव से. और उससे यही बात निकलकर आती है कि युद्ध में कोई नहीं जीतता. ये रियलिस्टिक नहीं, आइडियलिस्टिक सिनेमा है. जो बतौर माध्यम अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करने के मक़सद से बनी है.
फिल्म में एक सीन है, जब अरुण खेत्रपाल के पिता ब्रिगेडियर खेत्रपाल पाकिस्तान पहुंचते हैं. उनकी खातिरदारी का सारा जिम्मा रिटायर्ड पाकिस्तानी आर्मी ऑफिसर निसार उठाता है. वो उन्हें अपने घर रुकवाता है. एक रात निसार और ब्रिगेडियर खेत्रपाल के बीच बड़ी सुंदर बातचीत होती है. उसका एक का अंश आप नीचे पढ़िए-
ब्रिगेडियर खेत्रपाल- किससे पूछूंगा कि वो उस दिन पीछे क्यों नहीं हटा?
निसार- हम फौजी हैं सर. हम सिर्फ ऑर्डर्स फॉलो करते हैं.
ब्रिगेडियर खेत्रपाल- ऑर्डर तो उसे भी मिला था, वो पीछे क्यों नहीं हटा?
निसार- वो दुश्मन को मारना चाहता था सर
ब्रिगेडियर खेत्रपाल- कौन दुश्मन?
ये वही दुश्मन है, जिसके घर में बैठकर खेत्रपाल ये सवाल पूछ रहे हैं. जो कथित दुश्मन है, उसके जेहन में एक बात है. जो वो पिछले 30 सालों करना चाहता है. मगर अब उसे सेकंड थॉट्स आ रहे हैं. उसे लगता है कि वो जो कहना चाहता है, क्या 80 साल का ये आदमी वो बर्दाश्त कर पाएगा. कौन सा आदमी अपने दुश्मन के बारे में ये सोचता है? ये बड़ा संजीदगी और खूबसूरती से रचा हुआ सीन है. जिसमें सवाल ही जवाब है.
फिल्म में मेरा सबसे फेवरेट सीन वो है, जब निसार ब्रिगेडियर को लेकर सरगोधा में उनका पैतृक घर दिखाने ले जा रहा है. ISI वालों ने उस कार को बग कर दिया है. और अब उनका पीछा कर रहे हैं. निसार और खेत्रपाल के बीच जो बातचीत हो रही है, उसमें लंबे पॉजेज हैं. क्योंकि दोनों के पास ही एक दूसरे के सवालों के जवाब नहीं हैं. या वो एक ऐसी बात कर रहे हैं, जिसमें सवाल-जवाब का स्कोप नहीं है. इसलिए यात्रा के दौरान दोनों की अधिकतर बातचीत चुप्पियां में होती है. इससे आजिज़ आकर उनका पीछा करने वाला ISI अफसर अपने साथी से पूछता है-
"हेडक्वॉर्टर्स में ये खामोशी भी सुनते होंगे या फास्ट फॉरवर्ड कर देते होंगे!"
जबकि इस बातचीत का सबसे अहम हिस्सा वो खामोशी ही है. फिल्म की कास्टिंग एक और मास्टरस्ट्रोक है. अगस्त्य नंदा ने 'आर्चीज' में बेहद निराश किया था. मगर ये फिल्म उन्हें खुद को रिडीम करने का परफेक्ट मौका देती है. क्योंकि इस एक्टर और कैरेक्टर में कई समानताएं हैं. अरुण और अगस्त्य, दोनों ही अपनी फील्ड में बिल्कुल नए थे. दोनों को खुद को साबित करना था. दोनों की फैमिली उसी पेशे से बिलॉन्ग करती थी. इसलिए अगस्त्य यहां जो करते हैं, वो बहुत रियल और जेन्यूइन लगता है. इसमें वो ओवरबोर्ड नहीं जाते. सींसियर लगते हैं. धर्मेंद्र के इमोशनल सीन्स वाकई का आपका गला रुंधा देते हैं. मगर उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस बहुत प्योर और सिनेमैटिक लगती है. जयदीप अहलावत ने फिल्म में निसार का रोल किया है. उस आदमी को खुद को रोके रखना था. जयदीप ने उस रोल को आत्मसात किया. फिल्म के आखिरी हिस्से में उनकी और धर्मेंद्र की जुगलबंदी फिल्म के मेजर हाइटलाइट्स में गिनी जानी चाहिए. विवान शाह का रोल बेहद छोटा है. मगर वो कहानी में ऐसे फिट हो जाते हैं कि आपको कहीं भी उनकी कमी या ज्यादती महसूस नहीं होती.
'इक्कीस' सुंदर सिनेमा है. पॉलिटिकल येट पर्सनल. जिसे अपनी ज़िम्मेदारी मालूम है. जो सिर्फ एंटरटेन नहीं करना चाहती. ये फिल्म चाहती है कि आप सिनेमाघर से बेहतर इंसान बनकर बाहर निकलें.
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