महावीर एक निराश रेसलर है. वो मेडल लाना चाहता था देश के लिए, नहीं ला पाया. इसलिएवो चाहता था उसको बेटा हो जाए. जो उसका सपना पूरा कर दे. लेकिन उसको बेटियां हुईं.बेटियां प्यारी थीं. पर वो निराश था. क्योंकि अब उसका सपना पूरा नहीं हो सकता था.पर एक दिन उसकी बेटियां दो लड़कों को पीटकर आती हैं. और वो समझ जाता है कि लड़कियांहैं तो क्या, अब ये मेरा सपना पूरा करेंगी. बात कर रही हूं 'दंगल' के ट्रेलर की.फिर हम देखते हैं कि लड़कियों के बाल छोटे हो जाते हैं. वो 'लड़कों वाले' कपड़ों में आजाती हैं. फिर वो मिट्टी में रेसलिंग करती हुई दिखती हैं. और फिर हम लड़कियों केलड़का बनने का पूरा प्रोसेस देखते हैं.बेटियां लस्सी पीती हैं तो मां मूंछें ऐंठने का इशारा करते हुए दिखाती हैं किबेटियां कितनी मर्दाना हैंये पहली बार नहीं है, जब हमने फिल्मों में औरतों को मर्दों की ख्वाहिशें पूरी करतेदेखा है. 'चक दे' में हमने यही देखा. हमने देखा लड़कियां हॉकी खेलती हैं, जीतती हैं.और अंत में फिल्म कोच के नाम हो जाती है. वो कोच जो पूरी लगन से लड़ती, झगड़तीलड़कियों को एकजुट करके रखता है. जो उनके भीतर से उनके राज्य, गांव, कस्बे निकालकरउनके अंदर इंडियन होने की भावना भरता है. असल में जो फिल्म में पूरा होना था, वो उसपुरुष कोच का लक्ष्य था, उन 15 लड़कियों का नहीं. दंगल का ट्रेलर मुझे 'सुल्तान' सेज्यादा 'चक दे' की याद दिलाता है. ये न समझें कि ये फिल्म लड़कियों से जुड़ेकिसी स्टीरियोटाइप को तोड़ने की कोशिश कर रही है. फिल्म में लड़कियां बस लड़कों की कमीपूरी कर रही हैं. लड़कियों की जगह अगर लड़के होते, उन्हें भी यही करना पड़ता. और तब भीइस बात से फर्क न पड़ता कि लड़का कवि या डांसर बनना चाहता है. तब भी लड़के को कुश्तीही लड़नी पड़ती. क्योंकि वो लड़के होते.खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थीजब हम कहते हैं कि झांसी की रानी मर्दों की तरह लड़ती थी, हम औरतों से शारीरिक रूपसे कठोर होने का हक़ छीन लेते हैं. जब हम कहते हैं कि सेरेना विलियम्स के डोलेमर्दों की तरह हैं, हम औरतों से एक्सरसाइज करने और एक चुस्त और फिट बॉडी रखने का हक़छीन लेते हैं. हम तय कर देते हैं कि ये तो पुरुष का एरिया है, औरतें महज उसमेंघुसपैठ कर रही हैं. दंगल फिल्म भी औरतों और पुरुषों की भूमिका को न ही अलग-अलग करतीहै, बल्कि ये भी दिखाती है कि औरत अगर कुश्ती करे तो वो मर्दों के एरिया में घुसपैठकर रही है. ये कमी हमें सुल्तान में नहीं दिखती. लेकिन केवल सुल्तान और आरफा कीशादी तक. आरफा किसी भी लड़की की तरह एक लड़की है. कुश्ती करती है. बल्कि उसे देखकर हीसुल्तान कुश्ती करने के लिए प्रेरित होता है. लेकिन फिर आरफा प्रेगनेंट होती है औरऔरत की भूमिका एक बार फिर बदल जाती है. दंगल में हम देखते हैं, लड़कियों के बाल छोटेहैं. न मेकअप लगाती हैं, न लड़कियों जैसे कपड़े पहनती हैं. मानो अगर वो सूट-सलवार मेंघूमतीं, तो शायद कुश्ती न लड़ पातीं. जब तक लड़की के बाल बड़े होते हैं, वो झुमकेपहनती हैं, हंसकर बात करती हैं, तब तक एक अजीब सा तनाव महसूस होता है. जैसे ये लड़कीदेश का तिरंगा ऊंचा करने के लिए ठीक नहीं है. इसलिए हम लड़की से उसका स्त्रीत्वनिकाल देंगे, उस हद तक, जिस हद तक वो फिल्म देखने वाले पुरुषों को 'एसेक्शुअल' नलगने लगे. जब देखने वाले पुरुषों को औरत छोटे बाल में दिखेगी, तब वो उससे 'इश्क'नहीं करेंगे, उससे सेक्स के बारे में नहीं सोचेंगे. बल्कि उस पर गर्व करेंगे. औरतिरंगा लेकर चलने वाले भारत माता के लाडले को ये लाडली रिप्लेस कर देगी. दंगल फिल्मऔरतों की बात करती है. औरतें इसका जरूरी अंग हैं. पर केंद्र नहीं. हमारी फिल्मोंमें खेल और कुश्ती पुरुषों के नाम थे, उन्हीं के नाम हैं.https://www.youtube.com/watch?v=x_7YlGv9u1gये भी पढ़ें:बॉलीवुड में इस साल कौन सी फिल्म 400 करोड़ कमाएगी?आमिर ख़ान ने इन दो लड़कियों को इंटर्न क्यों रखा है?